मंगलवार, 3 फ़रवरी 2009

क्या कहती है कानून की धारा 8 (१)(क)

एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में राष्ट्रीय सुरक्षा से सम्बंधित मामलों को किसी भी कानून के दायरे से बाहर रखना चाहिए जिसे इसके सार्वजनिक होने से खतरा हो।
वह सूचना जिसे सार्वजनिक किए जाने से देश की संप्रभुता और अखंडता को खतरा पहुंचता हो, उन्हें सूचना के अधिकार कानून के दायरे में होते हुए भी देने से मना किया जा सकता है। अधिनियम की धरा 8 की उप धारा (१)(क) में राज्य की सुरक्षा, रणनीति, वैज्ञानिक या आर्थिक हितों पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाली सूचनाओं को दिए जाने पर निषेध लगाया गया है। ऐसी सूचनाएं जिसके जारी किए जाने से विदेशों से संबंध में बुरा असर पड़ता हो या किसी आपराधिक प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलता हो, उन सूचनाओं को देने से लोक प्राधिकारी मना कर सकता है। यह ऐसी सूचना होती है जिसे दिए जाने से पूर्व व्यापक जनहित का ध्यान रखना पड़ता है।
तमिलनाडु के सी रमेश ने जब सूचना के अधिकार के तहत भूतपूर्व राष्ट्रपति के आर नारायणन और भूतपूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के बीच 28 फरवरी 2002 से 15 मार्च 2002 के बीच हुए पत्र व्यवहार की प्रतिलिपि मांगी तो सूचना यह कहकर देने से मना कर दी गई कि इसे सार्वजनिक किए जाने से देश की एकता और अखंडता को विपरीत असर पड़ सकता है। असल में यह वही समय था जब सारा गुजरात सांप्रदायिक हिंसा की आग में जल रहा था और रमेश यह जानना चाहते थे कि आखिर सरकार ने देश की जनता के हित में क्या कदम उठाए। चार आयुक्तों की फुल बेंच सुनवाई के दौरान यह निर्णय दिया गया कि ऐसी सूचना धरा 8(१)(क) के तहत सार्वजनिक किए जाने से मना की जा सकती है लेकिन चूंकि यह सूचना व्यापक जनहित से जुड़ी हुई है इसलिए यह सूचना सार्वजनिक की जाए।
ऐसी ही सूचना शैलेष गाँधी ने महाराष्ट्र के उद्योग विभाग से जब विवादास्पद डॉओ केमिकल्स एवं उद्योग सचिव के बीच हुए एमओयू की कॉपी मांगी तो उद्योग विभाग ने इसे देने से साफ इंकार कर दिया। विभाग का कहना था कि यह सूचना सार्वजनिक किए जाने से राष्ट्र हित को क्षति पहुंचती है। गौरतलब है डॉओ केमिकल्स का नाम भोपाल गैस त्रासदी के समय से ही विवादों में घिरा रहा है और एक विदेशी प्राईवेट कंपनी एवं राज्य सरकार के बीच हुए व्यावसायिक करार की सूचना सार्वजनिक किए जाने से किस प्रकार राष्ट्र क्षतिग्रस्त हो सकता है, यह एक विमर्श का विषय है।

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