मंगलवार, 6 जनवरी 2009

क्या है सूचना के अधिकार कानून में तीसरा पक्ष

नीरज कुमार
सूचना के अधिकार कानून के नजरिए से देखें तो जो व्यक्ति या आवेदक सूचना मांगता है वह प्रथम पक्षकार माना जाता है और जिस विभाग या लोक प्राधिकारी से सूचना मांगता है वह द्वितीय पक्षकार होता है। इस तरह की सूचनाओं में आमतौर पर किसी प्रकार की परेशानी नहीं होती। लेकिन यदि आवेदक द्वारा मांगी जा रही सूचना आवेदक से सीधे-सीधे सम्बंधित होकर किसी अन्य व्यक्ति से सम्बंधित हो तो यह अन्य व्यक्ति तृतीय पक्ष कहलाता है। तीसरे पक्ष से सम्बंधित व्यक्ति की सूचना को तृतीय पक्ष की सूचना कहा जाता है। सूचना के अधिकार कानून में तृतीय पक्ष की गोपनीयता को संरक्षित करने का प्रावधान है। कानून की धारा 11 में ऐसी सूचनाएं जो किसी पर-व्यक्ति से सम्बंधित होती है, वह सूचना आवेदक को दिए जाने से पूर्व तीसरे पक्षकार से इजाजत लेनी पड़ती है।

ऐसे मामलों में लोक सूचना अधिकारी की जिम्मदारी होती है कि वह आवेदन प्राप्त होने के पांच दिनों के भीतर तीसरे पक्षकार को इस आशय की सूचना देगा तथा अगले 10 दिनों के भीतर सूचना जारी करने की सहमति या असहमति प्राप्त करेगा। लेकिन कानून में यह भी स्पष्ट किया गया है कि ऐसी सूचना जिसको जारी करने में किसी प्रकार का सामाजिक हित सधता हो या तीसरे पक्ष की सूचना को जारी करने से होने वाली संभावित क्षति लोक हित से ज्यादा बड़ी न हो तो उस दशा में मांगी गई सूचना जारी की जा सकती है।

कानून में यह एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी लोक सूचना अधिकारी को है कि वह मांगी गई सूचना तृतीय पक्षकार व लोक हित को अच्छी तरह समझ बूझ कर जारी करे। लेकिन कई मामलों में देखने में आया है कि लोक सूचना अधिकारी व्यक्तिगत स्वार्थ या विभागीय दबाव के चलते तृतीय पक्ष से सम्बंधित धारा 11 का गलत इस्तेमाल सूचनाओं को जारी करने से रोकने में कर रहे हैं। ऐसा होने से इस महत्वपूर्ण एवं लाभकारी कानून का फायदा आम जनता ठीक से नहीं उठा पा रही है। ऐसे समय में सूचना आयुक्तों की जिम्मेदारी काफी बढ़ जाती है कि वह तृतीय पक्ष से सम्बंधित सूचनाओं को जारी करने में लोक हित का विशेष ख्याल रखें जिससे कानून की मूल भावना पारदर्शिता और जवाबदेयता बची रहे। साथ ही गलत तरीके से सूचनाओं को बाधित करने वाले लोक सूचना अधिकारियों पर कानून की धारा के मुताबिक जुर्माना लगाएं एवं उनके खिलाफ अनुशासनात्कम कार्रवाई की भी अनुशंसा करें।

तीसरे पक्ष से सम्बंधित कुछ महत्वपूर्ण फैसले
एक कर दाता द्वारा जमा की गई आयकर रिटर्न की सूचना भी तृतीय पक्ष से सम्बंधित मानी गई है। सूचना आयोग ने एक मामले की सुनवाई के दौरान आयकर रिटर्न की प्रतिलिपि नहीं दिलवाई । आयोग का मानना था कि आयकर रिटर्न से व्यक्ति विशेष की व्यवसायिक गतिविधि का पता चलता है और करदाता द्वारा यह सूचना विभाग को वैश्वासिक संबंधों के तहत दी जाती है, जिसे सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। लेकिन इसी तरह के एक दूसरे मामले में आयोग ने आयकर एसेसमेंट की जानकारी सार्वजनिक करने में कोई आपत्ति नहीं जताई। जबकि आयकर असेसमेंट में आयकर रिटर्न से अधिक व्यक्तिगत एवं व्यवसायिक सूचनाएं निहित होती हैं। इसी से समझा जा सकता है कि कानून तो सूचना दिलाने के लिए प्रतिबद्ध है लेकिन सूचना दी जाए या नहीं इसका सारा दारोमदार सूचना आयुक्त पर ही है।

ऐसे कई मामले भी सामने आए हैं जिसमें सूचना आयुक्तों ने वैश्वासिक संबंध में उपलब्ध कराई गई सूचना लोकहित में उपलब्ध कराने के आदेश दिए हैं। ऐसे ही एक मामले में एक दंपत्ति ने सूचना के अधिकार कानून के तहत एक डॉक्टर के शैक्षणिक प्रमाण पत्रों की प्रतिलिपि मांगी। जिसे मेडिकल संस्थान ने देने से मना कर दिया। संस्थान का यह मानना था कि शैक्षणिक प्रमाण पत्रों की प्रतिलिपियां पर-व्यक्ति की व्यक्तिगत सूचना है जिसे दिए जाने से उसकी निजता का हनन होता है। आयोग में सुनवाई के दौरान दंपत्ति ने यह सूचना लोकहित में जारी करने की दलील दी। उनका कहना था कि शैक्षणिक दस्तावेज जिस डाक्टर के मांगे गए हैं, उसने उनके पुत्र का इलाज किया था और उनके पुत्र की इलाज के दौरान मृत्यु हो गई थी। उन्हें संदेह था कि डाक्टर के दस्तावेज फर्जी हैं। आयोग ने भी इस दलील पर सहमति जताई और सूचना जनहित में जारी करने के आदेश दिए।

5 टिप्‍पणियां:

भागीरथ ने कहा…

teesre paksh ki bahut achchi vyakhya ki hai. ummid hai rti ki aisi hi vyakhyayen aage bhi padne ko milengi.

सूर्यकान्त ने कहा…

आप का आर्टिकिल बहुत सुन्दर है ,क्रपया बताये की प्राइवेट,व्यापारिक समूहों पर भी ये कानून लागू होता है , धन्यवाद(सूर्यकान्त

kamal hindustani ने कहा…

kya m kotak mahindra bank se kisi ke A/C ki jankari le sakta hu.agar ha to pura vivran dene ki kirpya kare.....kamal hindustani Email kamalsharma440@gmail.com

PANKAJ SINGHAI (Rti activisit) ने कहा…

सूचना का अधिकार कानून 2005 ने देश के आम आदमी को खास बनाया ! संसद व विधानसभा मै सदस्यता को छोडकर आज देश का आम आदमी भी किसी सांसद या विधायक से कम नही है!

PANKAJ SINGHAI (Rti activisit) ने कहा…

सूचना का अधिकार कानून 2005 ने देश के आम आदमी को खास बनाया ! संसद व विधानसभा मै सदस्यता को छोडकर आज देश का आम आदमी भी किसी सांसद या विधायक से कम नही है!