मंगलवार, 6 जनवरी 2009

और मैं आरटीओ दलाल से आरटीआई कार्यकर्ता बन गया.....

कानपुर के शंकर सिंह पहले स्थानीय परिवहन कार्यालय (आरटीओ) मे दलाली करते थे लेकिन अब समाज से भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए अपना जीवन समर्पित कर चुके हैं। इसके लिए वे सहारा ले रहे हैं सूचना के अधिकार का। हालांकि इसकी कीमत उन्हें परिवार से बेदखल होकर चुकानी पड़ी है। अक्सर जान से मार देने की धमकियाँ मिलती रहती हैं। इन सब के बावजूद भी उन्हें अब जीने में मजा रहा है। अपने जीवन में आए इस परिवर्तन को उन्होंने अपना पन्ना के साथ साझा किया। प्रस्तुत है उसके मुख्य अंश-

आपकी कहानी बड़ी दिलचस्प है। कैसे आया यह बदलाव?
पहले मैं आरटीओ कार्यालय में होने वाले काम में दलाली खाता था। ओवरलोडिंग ट्रक से वसूली की जाती थी और मैं भी इस भ्रष्टाचार में शामिल था। मुझे जनवरी 2006 में एक कार के फर्जी रजिस्ट्रेशन के मामले में फंसा दिया गया था, जिससे मेरी काफी बेइजती हुई थी। मेरे साथ मारपीट भी की गई। मुझे ये सब बहुत बुरा लगा। सूचना के अधिकार के बारे में पता चलने के बाद मैनें आरटीओ कार्यालय से ही सबसे पहले सवाल पूछे और कार्यालय के सामने सबसे पहले आरटीआई कैंप लगाया। इस प्रकार आरटीओ दलाल से आरटीआई कार्यकर्ता बन गया।

कमाई में पहले और अब की स्थिति में क्या बदलाव आया है? पुराने साथियों और अधिकारियों का रुख कैसा है?
अब मैं बहुत तंगी में जी रहा हूं। मेरे करीब 300 साथी थे। वे कहते हैं कि अधिकारी उनपर रिश्वत लेने के लिए दबाव डालते हैं। उनकी रोजी-रोटी इससे जुड़ी है, वे मजबूरी में रिश्वत ले रहे हैं क्योंकि उन्हें अफसरों का पेट भरना होता है। अफसरों पर कोई फर्क नहीं पड़ा है। अब तो उनकी रिश्वत और भी अधिक हो गई है। 360 रुपये के लाइसेंस फीस में 840 रुपये की रिश्वत ली जाती है।

तमाम परेशानियों के बावजूद अब जिंदगी कैसी लग रही है?
अब जीने में मजा आ रहा है। मैं अपने कामों से काफ़ी संतुष्टि महसूस करता हूं। लेकिन यदि दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई हो तो ज्यादा सुकून मिलेगा।

आपके अंदर आए बदलाव को लेकर परिवार का रुख कैसा रहा?
परिवार में बहुत विरोध हुआ। बातचीत बंद हो गई और मुझे परिवार से अलग होना पड़ा। मुझे अब अपना पुश्तैनी घर छोड़कर किराए के मकान में रहना पड़ रहा है। घर वालों को समझाया तो वे बोले- दुनिया के साथ चलो। गाँधी मत बनो। मेरे अकेले से बदलाव नहीं आएगा

सूचना के अधिकार के इस्तेमाल से क्या धमकियाँ भी मिलीं?
हां। आये-दिन धमकियाँ मिलती रहती हैं। उप जिलाधिकारी से सूचना मांगी तो उन्होनें उल्टा मुझसे ही सवाल पूछने शुरू कर दिए कि बताओ तुम्हारी शर्ट में कितने बटन हैं, तुम्हारी बीबी ने कल कौन सी साड़ी पहनी थी आदि-आदि। डीएम कार्यालय से तो हमें धक्के देकर कमरे से निकाल दिया गया। कस्टम विभाग से सूचना मांगी तो उन्होंने ऑफिस में ही बंद करवा दिया। ये अधिकारी लोग पेनल्टी लगने पर भी नहीं सुधार रहे हैं।

सूचना लेने में क्या अड़चनें आ रही हैं?
जन सूचना अधिकारी जानकारी देने को तैयार ही नहीं हैं। झूठी सूचना दे देते हैं क्योंकि सूचना देने से वे खुद ही फंस जाते हैं। अपीलीय अधिकारी और लोक सूचना अधिकारी की आपस में सांठगांठ होती है। सूचना आयुक्त भी बिकाउ हैं। शासन-प्रशासन दोनों कानून को खत्म करना चाहते हैं।

आगे क्या करने का इरादा है?
हम लोग नरेगा में हो रही धांधली को आरटीआई से उजागर करने की तैयारी कर रहे हैं। किसानों की अनेक समस्याएं हैं। उनके जॉब कार्ड नहीं बनाए जा रहे हैं। खाद्य और आपूर्ति विभाग में भी काम करने का विचार है। 12 किलो की जगह केवल 7 किलो राशन लोगों को दिया जा रहा है।

2 टिप्‍पणियां:

splendid ने कहा…

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बेनामी ने कहा…

shankar singh ji aap bahut bahadur hain. Pleas batain ki aap apne parivar ko kase chalate hai. aur fir kaise bhrust samaj sai lad rahai hai . taki aur bhi aap ka sath dai sakai.
thankyou