गुरुवार, 11 दिसंबर 2008

एक जिम्मेदार और जवाबदेह पत्रकारिता के लिए

पाणिनी आनंद

सूचना का अधिकार कानून के जरिए किसी जानकारी को हासिल करने पर पहली बात तो यह होती है कि कागजों में लिखी, कही-अनकही सार्वजनिक हो जाती है। इस तरह वो सामने आ जाता है जिसे बताने से या हो अधिकारी बच रहे होते हैं, छिपा रहे होते हैं।

सूचना का अधिकार कानून ने लोकतंत्र के जिस स्तंभ को सबसे मजबूत किया है, वो है चौथा स्तंभ यानि पत्रकारिता का क्षेत्र। हालांकि यह अपने में एक अलग सवाल है कि जिस पत्रकारिता के संदर्भ में हम सूचना का अधिकार की बात कर रहे हैं और जिस पत्रकारिता ने इस कानून को एक मजबूत और स्थापित स्थिति में ला पहुंचाया है, उसी के संचालक संस्थानों की जवाबदेही का दायरा सूचना कानून की पहुंच से बाहर है। और जिस तरह से समाचार माध्यमों की संख्या बढ़ी है, उसमें उद्योगजगत के लोगों का निवेश बढ़ा है और इनके आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक सरोकारों पर कभी-कभी सवाल भी उठे हैं, उसके बाद यह भी लग रहा है कि आने वाले दिनों में मीडिया संस्थानों में सूचना का अधिकार एक अहम बहस बन सकता है।

सूचना का अधिकार अभियान के साथ जुड़े रहने और साथ ही एक पत्रकार के तौर पर अपनी जीविका जुटाते हुए मैंने संचार माध्यमों और सूचना का अधिकार कानून से जुड़े मुद्दों के कई पहलुओं को देखा है। मसलन, कितनी जगह, किन स्थितियों में और किस तरह ही कहानियां सूचना का अधिकार कानून से जुडे़ होते हुए छपकर या टीवी पर आती रही हैं। कभी इनके प्रकाशन को लेकर समाचार माध्यमों से जद्दोजहद करता रहा हूं तो कभी इस कानून की मदद से अनउदघाटित तथ्यों को सामने लाता रहा हूं। यह इस कानून की सुंदरता ही है कि जब फाइलों में दबी जानकारी हमारे हाथ में होती है तो कई रोचक तथ्य सामने आते हैं। भारत में सूचना का अधिकार कानून से जुड़ी कहानियों के प्रकाशन या उनपर रिपोर्टिंग को मुख्यधारा के मीडिया में अपनी जगह बनाने में बहुत जद्दोजहद करनी पड़ी है। अभी भी कई समाचार पत्रों के दफ्तर ऐसे हैं जहां सूचना का अधिकार कानून से जुडे़ मुद्दों पर कहानियां बहुत मुश्किल ही देखने को मिलती हैं।

विडंबना ही है कि हिन्दी या अन्य भारतीय भाषाओं में इस कानून को लेकर कम ही काम हुआ है। इस मामले में अंग्रेजी के माध्यम ज्यादा मुखर रहे हैं। सूचना का अधिकार पर काम कर रहे लोगों या संगठनों ने भी शायद अंग्रेजी के जनमाध्यमों को ज्यादा महत्व दिया है। ऐसा शायद इसलिए भी हुआ है कि क्योंकि नीतिगत स्तर पर और व्यवस्था में बदलाव लाने की कोशिशों के लिए अंग्रेजी माध्यम में अपनी बात को कहना शायद ज्यादा प्रभावशाली है। पर इससे एक नुकसान यह हुआ है कि हिंदी और अन्य भाषाओं के पत्रकारों से सूचना का अधिकार पर काम कर रहे लोगों को ताल्लुक कम ही रहा है। दूसरा नुकसान यह हुआ है कि अन्य भाषाओं या हिंदी के पत्रकार इसी दुराव के चलते सूचना कानून को इतनी मजबूती से नहीं समझ पाते जितना कि अंग्रेजी माध्यमों के पत्रकार। मेरी इस बात से कई लोगों को आपत्ति हो सकती है और कहा जा सकता है कि कुछ सरकारी कार्यक्रमों और हिंदी सहित अन्य भाषाओं के समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, टीवी चैनलों ने इस दिशा में खासा काम किया है पर इन भाषाओं को जानने वाली आबादी के औसत के हिसाब से देखने पर अंग्रेजी के माध्यम ज्यादा सक्रिय दिखाई देंगे।

पत्रकारों की ओर से सूचना सूचना का अधिकार कानून के तहत जानकारी मांगने के प्रयास कम ही देखने को मिले हैं। अधिकतर मीडिया कर्मी खुद हफ्तों का समय एक ही सूचना निकलवाने की प्रक्रिया में नहीं लगाना चाहते, वे चाहते हैं कि कोई सूचना निकलवा कर उन तक पहुंचाए और वे उसे इस्तेमाल करें। इसमें कोई बुराई नहीं है पर ज्यादा बेहतर है कि ये पत्रकार खुद भी कानून की इस्तेमाल करें, सूचनाएं मांगे और अपने आवेदनों पर मिल रही जानकारी व जवाबों से लोगों को अवगत कराए। इसकी जरूरत इसलिए है क्योंकि एक तो देश का नागरिक होने के नाते पत्रकार बिरादरी का भी हक और जिम्मेदारी है कि इस कानून का इस्तेमाल करें। दूसरा यह कि रोजमर्रा की जिंदगी में ऐसे कई सवालों से पत्रकार रूबरू होते भी हैं, जो आम आदमी को परेशान करते हैं, जिससे कोई भी व्यक्ति प्रभावित होता है या जिन्हें जानने की जरूरत महसूस होती है। अब अगर पत्रकार इस बात को समझकर खुद भी सूचनाएं निकलवाने का काम करते हैं या किसी सूचना मांगने की प्रक्रिया का हिस्सा बनते हैं तो उनको जानकारी तो मिलेगी ही, सूचना मिलने या न मिलने की सूरत में एक आवेदक क्या कुछ झेलता है, यह भी समझ में आएगा।
पिछले दिनों एक बात देखने को मिली। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान ने एक मामले में सूचना देने से यह कहते हुए इंकार कर दिया था कि जनमाध्यमों में प्रकाशन के मकसद से सूचना मांगना गलत है। केवल निजी इस्तेमाल के लिए ही सूचना मांगी जानी चाहिए। अभी सुनने में आया है कि ऐसा कोई प्रावधन भी है जो वो अपने यहां जोड़ रहे हैं। तो क्या ऐसे अधिकारियों को सूचना का अधिकार कानून अबतक समझाया नहीं गया है या सरकारी गोपनीयता कानून के ज्वर से अभी ये मुक्त नहीं हुए हैं। क्या इन अधिकारियों को सूचना कोई तस्करी की चीज लगती है जिसका सार्वजनिक किया जाना सही न हो।

सूचना का अधिकार कानून के मुद्दे पर कुछ जनसंगठनों की ओर से सक्रियता से काम किया गया है। पर यह काम ऐसा है जिसपर अभी बहुत ध्यान नहीं दिया जा सका है, और वह है पत्रकारों, जनमाध्यमों से जुडे़ लोगों को सूचना को अधिकार कानून की पेचीदगियों से परिचित कराना। अगर प्रशिक्षण कार्यक्रमों के लिए मीडिया संस्थानों को राजी करके इस काम को व्यापक पैमाने पर किया जाए तो पत्रकार सूचना कानून के प्रयोग के दौरान सरकारी महकमों द्वारा खड़ी की जाने वाली बेवजह की अड़चनों से बचेंगे। हालांकि कुछ संगठनों की ओर से ऐसी पहल देखने को मिली तो है पर इसे लेकर मीडिया संस्थान बहुत गंभीर हुए हैं और पत्रकारों की एक खेप सूचना का कानून के प्रयोग के लिए तैयार की जा सकी है, ऐसा कहना जल्दबाजी होगा।

कुछ मुद्दे ऐसे हैं, जिन पर खोजी पत्राकारिता के जरिए काम होता रहा है। सूत्रों, जान पहचान के जरिए जानकारी ली जाती रही है, खबरें सामने आती रही हैं। ऐसी खबरों को लोगों ने हाथोंहाथ लिया है। बहुत कुछ लिखा-कहा गया है इस तरीके से लेकिन एक पहलू एक पहलू यह भी है कि कुछ मामलों में पत्रकारों को यह महंगा भी पड़ा है। मैं सीधे उदाहरण न देकर इतना ही कहना चाहूंगा कि सूत्रों और जान पहचान से गलत या अधूरी जानकारी सामने आने पर खबरों की सत्यता पर भी सवाल उठे हैं। इस दिशा में एक जिम्मेदार और जवाबदेह पत्रकारिता के लिए सूचना का अधिकार एक बहुत उम्दा हथियार है। सूचना कानून के जरिए जानकारी हासिल करना और फ़िर उसके आधार पर रिपोर्टिंग करना, विचार व्यक्त करना पत्रकार और उसकी खबर को और जवाबदेह और जिम्मेदार बनाएगा।

एक पहलू और है जिसको कहे बिना बात पूरी नहीं की जा सकती है। कुछ संगठनों ने सूचना कानून का व्यापक स्तर पर प्रयोग किया है। उनके द्वारा अर्जित सूचना का समाज और पत्रकारिता, दोनों को ही लाभ मिला है। कई अहम बातें अखबारों, टेलीविजन के जरिए लोगों के सामने आई हैं। पर एक बात जो चिंताजनक हो सकती है वो है संगठनों या लोगों में सूचना के जरिए प्रसिद्धि या प्रचार पाने की निजी होड़। ऐसा करने से सूचना तो लोगों के बीच आती रहेंगी पर ऐसा करने वाले सूचना को सामने लाने तक ही ज्यादा केंद्रित रहेंगे, सूचना के इस्तेमाल पर ध्यान कम दिया जाएगा जो कि उचित नहीं है। संगठनों में ऐसी स्थिति पैदा होने की सूरत में सूचनाओं के जरिए अपने काम और नाम को मीडिया की मदद से प्रसारित कराने में ज्यादा वक्त खर्च होगा, सूचनाओं को लेकर लोगों के बीच काम करने पर कम।

ऐसे में अच्छा यह होगा कि कुछ संगठन या कुछ लोग ऐसे भी सामने आएं जो शुद्ध रूप से सूचना का अधिकार कानून और इसके इस्तेमाल से मिलने वाली जानकारी के प्रचार प्रसार पर काम करें। लोगों के बीच मुद्दों पर काम कर रहे संगठनों को ऐसे संगठनों की जानकारियों से मदद मिल सकती है। सूचना के प्रचार-प्रसार पर काम कर रहे एक पत्रकार और पत्रिका का ज़िक्र मैं यहां जरूर करना चाहूंगा। वरिष्ठ पत्रकार भरत डोगरा का लेखन और भीलवाड़ा राजस्थान के भंवर मेघवंशी का डायमंड इंडिया नाम की पत्रिका के जरिए प्रयास खासा अनुकरणीय है।

(लेखक दिल्ली में बीबीसी संवाददाता हैं)

1 टिप्पणी:

chandan kumar ने कहा…

आलेख से बहुत फायदा मिलेगा हम लोगो को , लिखते रहे और हमारा मार्गदर्शन करते रहेँ
www.sanghsadhna.blogspot.com