शुक्रवार, 3 जुलाई 2009

कमजोर होता कानून, टूटती उम्मीदें

चार साल पहले बड़ी उम्मीदों के साथ आए सूचना अधिकार कानून से लोगों का भरोसा टूट रहा है। इसका श्रेय सबसे पहले अंग्रेजों के ज़माने से अपनी मनमानी करती आ रही नौकरशाही को दिया जा सकता है जो कहीं अपने भ्रष्टाचार के चलते तो कहीं अहंकार के चलते इस कानून को कुचलने का काम करते रहे हैं। लेकिन इसकी नैतिक ज़िम्मेदारी सूचना आयुक्त के पदों पर बैठे लोगों की बनेगी। सूचना आयुक्त की कुर्सी पर बैठने वाले पूर्व नौकरशाहों से तो कोई उम्मीद थी ही नहीं क्योंकि वे तो पहले से ही काम करने में मनमर्जी और गोपनीयता के पोषक रहे हैं लेकिन लालबत्ती की चमक, आगे पीछे घूमते पुलिस वाले और अफसरी रौब के आगे उनका अस्तित्व भी मिट गया, जिनसे उम्मीद थी कि वे कुछ दम दिखाएंगे। हालात ये हैं कि इस कानून के तहत सूचना मांगने वाले बहुत से लोगों को आयोग में अपील करना, समय और धन की बरबादी लगने लगा है।
तब क्या सूचना अधिकार कानून निष्क्रिय हो गया है? क्या यह कानून दम तोड़ रहा है? इस कानून का इस्तेमाल करने वाले अधिकतर लोगों की राय में यह अब कारगर नहीं रह गया है। इनमें से भी ज्यादातर का मानना है कि लोक सूचना अधिकारी के स्तर पर अगर सूचना नहीं मिली तो उसके बाद आयोग में जाना बेकार है। किसी राज्य में चले जाइए या केंद्र स्तर पर देख लीजिए इसके हज़ारों उदाहरण मिल जाएंगे।
नीचे हम ऐसे उदाहरण दे रहे हैं जिन्हें पढ़कर अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि आज सूचना के अधिकार कानून के साथ नौकरशाही और सूचना आयुक्तों ने मिलकर क्या खेल खेला है। साथ ही ऐसे उदाहरण भी दे रहे हैं जिन्हें पढ़कर हर नागरिक के मन में यह साफ हो सके कि आखिर यह कानून जरूरी क्यों है।

सूचना का अधिकार कानून आज एक मज़ाक बनकर रह गया है क्योंकि-
1 जुर्माना! नहीं लगाना
केंद्र और राज्यों के लगभग तमाम सूचना आयुक्त सूचना न देने वाले अधिकारियों पर जुर्माना लगाने से बचते रहे हैं। केन्द्रीय सूचना आयोग में अब तक महज 211 मामलों में जुर्माना लगाया गया है। देश के मुख्य सूचना आयुक्त ने इसे हिंसा मानते हुए यह कहकर पल्ला झाड़ लिया था कि `मैं तो अहिंसा में विश्वास करता हूं।´ फ़िर भी केंद्रीय सूचना आयोग में सबसे ज्यादा जुर्माना लगाने वाले आयुक्त भी वही हैं। यहां तक कि जनता जनार्दन की मांग पर आयुक्त बनाए गए शैलेष गाँधी भी अपनी श्रेष्ठता एक दिन में अधिक से अधिक मामले निपटा कर दिखाने में लगे हैं, जबकि यह साफ हो चुका है कि जुर्माने का प्रावधन नहीं होता तो सूचना अधिकार के तहत सूचना कभी मिली ही नहीं होती। जब तक सूचना न देने वाले अधिकारियों पर जुर्माना लगना शुरू नहीं होता, जब तक यह कानून मजाक ही बनता रहेगा।

2. कह दिया सो कह दिया
केन्द्रीय सूचना आयोग ने इस कानून के तहत शिकायत या दूसरी अपील दाखिल करने के नियम ऐसे बनाए हैं कि अच्छे अच्छे पढ़े लिखे अपील तैयार करने में मात खा जाएं। अपील बनाने में इतनी औपचारिकताएं हैं कि कोई साधारण आदमी सही से अपील बना ही नहीं सकता। इसी के चलते आयोग में आने वाली 45 फीसदी अपील खारिज हो चुकी हैं। कानपुर आईआईटी में पढ़ा चुके और जाने माने साहित्यकार गिरिराज किशोर की अपीलें भी यहां इसलिए खारिज हो चुकी हैं क्योंकि वे इन तानाशाही नियमावली के अनुरूप नहीं थीं। इतना ही नहीं केंद्रीय सूचना आयोग ने अपनी नियमावली में परिवर्तन कर स्पष्ट किया है कि वह अब पुनर्विचार याचिकाओं पर विचार नहीं करेगा। यानि अगर कोई वादी आयोग के फैसले से असंतुष्ट है तो वह कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है। आयोग उनकी एक नहीं सुनने वाले। केंद्रीय सूचना आयोग की तर्ज़ पर अब उत्तर प्रदेश सूचना आयोग भी चल पड़ा है।

3. आरटीआई का इस्तेमाल, मिसयूज कैसे?
भ्रष्ट अफसरों और नेताओं के साथ-साथ देश के लगभग सभी सूचना आयुक्त यह कहते मिल जाएंगे कि सूचना के अधिकार कानून का इस्तेमाल ठीक लोग नहीं कर रहे हैं। लोग इसका `मिसयूज´ कर रहे हैं। उन्हें यह कौन समझाए कि कानून बनाते वक्त संसद ने इसमें सिर्फ अच्छे लोगों के इस्तेमाल के लिए की शर्त नहीं डाली है। इतना ही नहीं कई सूचना आयुक्त जिनमें केंद्रीय सूचना आयुक्त एम एम अंसारी सबसे आगे हैं, यह कहते घूमते हैं कि इस अधिकार से लोग अपने निजी मामले सुलझाने में लगे हैं। अंसारी साहब से यह बात कई बार पूछी गई है कि क्या सूचना का अधिकार सिर्फ देश सेवा में लगे लोगों को ही मिलेगा। क्या एक आदमी जो रिश्वत नहीं देता उसे यह जानने का हक़ नहीं है कि उसके पासपोर्ट आवेदन का क्या हुआ? क्या किसी गरीब को यह जानने का हक़ नहीं है कि उसके हिस्से का राशन कहां जा रहा है? क्या किसी सरकारी कर्मचारी को यह जानने का हक़ नहीं है कि उसका ट्रांसफर क्यों किया गया, उसका प्रमोशन क्यों नहीं हुआ? जिस व्यवस्था में लोगों को मोटरसाइकिल की आर.सी. तक बिना रिश्वत दिए न मिलती हो वहां लोगों से उम्मीद की जाए कि सरकार के बड़े-बड़े कामों के बारे में सूचना के अधिकार का इस्तेमाल शुरू करें, ऐसी सोच पीड़ा देती है। जो सूचना आयुक्त इस तरह के मामलों को सूचना के अधिकार के इस्तेमाल में कमी के रूप में देखते हैं वे ही इस कानून की भ्रूण हत्या के ज़िम्मेदार हैं।

4. पैसा जनता का पर जवाबदेही नहीं
एक हाई प्रोफाइल संस्था, जो सरकार के पैसे से चलती है। सरकारी कोठी में जिसका दफ्तर है वह सूचना के अधिकार के दायरे में नहीं आती, ऐसी लिखित सलाह खुद देश के मुख्य सूचना आयुक्त जनाब वज़ाहत हबीबुल्ला संस्था को देते हैं और संस्था उसके आधार पर सूचना देने से मना कर देती है। यह अलग बात है कि हाई कोर्ट के निर्देश के बाद तीन सूचना आयुक्तों की पीठ ने जवाहरलाल नेहरू मेमोरियल फंड नाम की इस संस्था को सूचना अधिकार कानून के दायरे में माना है। इस मामले में सूचना मांगने वाले बी आर मन्हास जिन्होंने 27 नवंबर 2006 को यह सूचना मांगी थी, उन्हें आज तक सूचना नहीं मिली है, अब भी हौसला बनाए हुए हैं। लेकिन उनके प्रयासों को देखकर कितने लोग सूचना मांगने की हिम्मत जुटा सकते हैं?

5. आयोग का क्या औचित्य?
सूचना के अधिकार की सर्वोच्च संस्था केन्द्रीय सूचना आयोग भी अहम मुद्दों पर निर्णय लेने से कैसे बचना चाहता है, इसकी एक मिसाल कैबिनेट मंत्रियों की संपत्ति सार्वजनिक किए जाने का मामला है। कैबिनेट सदस्यों की संपत्ति के सार्वजनिक करने के मामले में आयोग ने कहा कि यदि लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी यदि चाहें तो कैबिनेट सदस्यों की संपत्ति सार्वजनिक की जा सकती है। इससे निर्णय से सवाल उठता है कि यदि आयोग इतने महत्वपूर्ण मामले पर स्पष्ट फैसला देने का अधिकार लोकसभा अध्यक्ष पर छोड़ देता है तो ऐसे में आयोग का क्या औचित्य?

6. बदमिजाज सूचना आयुक्त
सुनवाइयों और सूचना मिलने की उम्मीद से आयोग जाने वाले आवेदनकर्ताओं की आशाएं उस वक्त टूटती हैं जब सूचना आयुक्त की कुर्सी पर बैठे आयुक्त महोदय सूचना दिलाने के बजाय आवेदक को ही डांटते-डपटते हैं। कभी-कभी तो ये आयुक्त धमकी तक दे देते हैं। `फटीचरगिरी पत्रकारिता करते हो, दो टके के पत्रकार सारी पत्रकारिता भुला दूंगा, तेरा अखबार बंद करवा दूंगा, निकल जा मेरे कक्ष से।´ ये वचन उत्तर प्रदेश के सूचना आयुक्त बृजेश कुमार मिश्रा ने पत्रकार मुन्ना लाल से एक सुनवाई के दौरान कहे। मुन्ना लाल 16, फरवरी 2009 को प्राधिकृत वादी के तौर आयोग में सुनवाई के लिए गए थे।
इसी तरह बांदा के राजाभैया जब उत्तर प्रदेश सूचना आयोग में पहुंचे तो सूचना आयुक्त सुनील चोधरी ने कहा, `आप ही हैं राजाभैया, तुमने क्या आरटीआई का ठेका ले रखा है।´ बहरहाल ये तो राज्य सूचना आयोग की स्थिति है लेकिन केन्द्रीय सूचना आयोग भी इस मामले में कम नहीं है। सामाजिक कार्यकर्ता से सूचना आयुक्त बने शैलेष गाँधी तक के बारे में लोग ऐसी शिकायतें कर रहे हैं कि वे अफसरों के सामने आवेदकों को कहते हैं, `आप डिपार्टमेंट को परेशान कर रहे हैं।´

7. लटकते मामले, बढ़ती निराशा
सूचना का अधिकार पेंडेंसी की वजह से भी दम तोड़ रहा है। आयोग अदालती ढर्रे पर चलने लगे हैं। लोगों को सुनवाई के लिए एक से दो साल तक इंतजार करना पड़ रहा है। सूचना आयोगों की सुस्ती का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि तमिलनाडु राज्य सूचना आयोग ने सात सूचना आयुक्त होने के बावजूद साल 2008 में मात्रा 880 मामलों की सुनवाई की है।
महाराष्ट्र सूचना आयोग का ऑडिट करने पर पता चला है कि आयोग के छह सूचना आयुक्त प्रतिदिन औसतन 5 अपील या सुनवाइयों को निस्तारित करते हैं। यही कारण है कि पेंडिंग केस की संख्या में यह आयोग पहले स्थान पर है। महाराष्ट्र सूचना आयोग की हालत यह है कि यहां 15438 मामले पेंडिंग हैं जिस कारण सुनवाई की पहली तारीख लगने में डेढ़ से दो साल का समय लग रहा है। कर्नाटक सूचना आयोग की स्थिति यह है कि मार्च 2009 के अंत तक यहां पेंडिंग मामलों की संख्या 5200 है। सुनवाई के मामले में पश्चिम बंगाल सूचना आयोग तो और दो कदम आगे है। आयोग ने तीन सालों में मात्र 116 सुनवाइयां की हैं। उत्तर प्रदेश सूचना आयोग का भी कुछ ऐसा ही हाल है जहां सूचना के बजाय सिर्फ तारीखें ही मिल रही हैं। लखनउ के डीएवी महाविद्यालय में रीडर देवदत्त शर्मा की 17 सुनवाईयां आयोग में लगीं, पर उन्हें अब तक सूचनाएं नहीं मिली हैं। लखनउ के ही अशोक कुमार गोयल को 18 सुनवाइयों के बाद भी सूचना नहीं मिली है।

8. क्यों नहीं वसूला जाता जुर्माना
सूचना आयोग एक तो जुर्माने नहीं लगाता। दूसरा, गलती से जो जुर्माने लगा भी देता है, उसे वसूलने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाता। बानगी के तौर पर महाराष्ट्र और केन्द्रीय सूचना आयोग को लिया जा सकता है। महाराष्ट्र सूचना आयोग ने साल 2008 में सूचना कानून का पालन न करने वाले लोक सूचना अधिकारियों पर 2 लाख 21 हजार 600 रुपए का जुर्माना लगाया था। लेकिन इस जुर्माने का महज एक प्रतिशत हिस्सा ही अब तक वसूला जा सका है। दूसरी तरफ केन्द्रीय सूचना आयोग ने 2005 से 2008 के बीच दिल्ली नगर निगम पर 3 लाख 81 हजार का जुर्माना लगाया लेकिन इसमें से केवल 1 लाख 10 हजार रुपए ही वसूल पाया है।

9. जेल भी भिजवा सकता है आयोग
सूचना आयुक्तों के पास सूचना दिलवाने का जो अधिकार कानून ने उन्हें दिया है, उसका इस्तेमाल वो भले ही न करें, लेकिन अपने अफसर होने के गुमान ने उन्हें बदतमीज और बेलगाम बना दिया है। शायद तभी ये सूचना आयुक्त आवेदकों या कार्यकर्ताओं पर झूठा केस दर्ज कराने से लेकर उन्हें जेल भिजवाने में भी नहीं हिचकते।
ताजा मामला महाराष्ट्र सूचना आयोग का है, जहां मुख्य सूचना आयुक्त सुरेश जोशी के आदेश पर मुंबई के आरटीआई कार्यकर्ता कृष्णराज राव और उनके 11 साथियों पर झूठा केस दर्ज कर गिरफ्तार कर लिया गया। यही हाल उत्तर प्रदेश सूचना आयोग का भी है, जहां यूपी आरटीआई टास्क पफोर्स के अध्यक्ष शैलेन्द्र सिंह को सूचना आयोग के इशारे पर रात को एक बजे घर से गिरफ्तार किया गया।
इस मामले में केन्द्रीय सूचना आयोग भी दूध का धुला नहीं है। केन्द्रीय सूचना आयोग के आदेश पर 40 महिलाओं को गिरफ्तार किया गया था। ये महिलाएं जुलाई 2009 को अपने केस को पदमा बालासुब्रमण्यम की बैंच से ट्रांसफर करवाने के लिए आयोग गई थी। मुख्य केन्द्रीय सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्ला के अनेक आश्वासनों के बाद भी जब ऐसा नहीं किया गया तो वे आयोग में सत्याग्रह करने लगी। आयोग को महिलाओं का यह रवैया रास नहीं आया और इन्हें गिरफ्तार करवा दिया गया।

10. आयुक्तों के खिलाफ 67 शिकायतें
उत्तर प्रदेश के राज्यपाल कार्यालय को सूचना आयुक्तों के खिलाफ सितंबर 2008 तक 67 शिकायतें मिल चुकी हैं और इनमें से किसी भी शिकायत पर राज्यपाल कार्यालय की तरफ कोई कार्रवाई नहीं की गई है। यह जानकारी खुद राज्यपाल कार्यालय के लोक सूचना अधिकारी ने सूचना का अधिकार जागरूकता मंच के राम सरन शर्मा द्वारा दायर आवेदन के जवाब में दी है। उत्तर प्रदेश के आयुक्तों के अलावा देश भर के कई आयुक्तों की शिकायतें मुख्यमंत्रियों, राज्यपालों, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति तक पहुंची हैं। फ़िर भी इनके खिलाफ अब तक कोई ठोस कार्रवाई हुई हो, ऐसा देखने को नहीं मिला। जाहिर है, ऐसे आयुक्तों से कोई क्या उम्मीद करे।

11 जनता के सामने पारदर्शी नहीं होना चाहती सरकारें
सरकार चाहे केंद्र की हो या किसी राज्य की, जनता के प्रति जवाबदेही और पारदर्शिता को छोड़कर आप उनसे कुछ भी मांग सकते हैं। सड़क, पानी, बिजली यहां तक कि साइकिल, टीवी और दो रुपए किलो चावल तक आपको भीख में दे सकते हैं। हर सरकार खुद को जनता की, आम आदमी की, गरीबों की, किसानों की सरकार कहते नहीं थकती, लेकिन जनता कामकाज और खर्चे के बारे में पूछे, यह कैसे हो सकता है।
सूचना के अधिकार को लेकर यही रवैया है तमाम सरकारों का। उत्तर प्रदेश में मायावती सरकार ने तो तमाम हदें पार करते हुए इस कानून के पंख ही काट डाले हैं। उन्होंने मंत्रियों की आचार संहिता तक को कानून के दायरे से बाहर निकाल दिया है।

12. तोहफे में मिलती है सूचना आयुक्त की कुर्सी
सामान्य परिस्थितियों में एक आईएएस अफसर के लिए भी मुख्य सचिव जैसा ओहदा पाना एक कठिन काम है। तमाम मेहनत, तिकड़म और जोड़-तोड़ आदि के बाद कुर्सी मिलती भी है तो महज़ एक दो साल के लिए, लेकिन जब नेताओं से नज़दीकी और राजनीतिक घरानों में निष्ठा के चलते ही इतना बड़ा पद मिलता हो, वह भी सीधे पांच साल के लिए। उस पर भी ताकत इतनी कि कोई आसानी से हटा भी न सके। सूचना के अधिकार कानून की रखवाली के लिए सूचना आयुक्तों की कुर्सी को मिली यह ताकत ही इसका अभिशाप बन गई। राज्य सूचना आयोग में आयुक्त का दर्जा मुख्य सचिव के बराबर का होता है। मुख्य सूचना आयुक्त और केंद्र की तो बात इससे ऊपर ही है। किसी को लालबत्ती पानी है तो किसी को बनाए रखनी है। इसी के चलते बड़ी संख्या में नौकरशाह इस कुर्सी की ओर लपक रहे हैं।
आज आयुक्त की कुसियों पर ज्यादातर ऐसे लोग बैठे हैं जिन्हें सूचना के अधिकार, पारदर्शी और जवाबदेह शासन व्यवस्था की न तो कोई समझ है और ने कोई इच्छा। उन्होंने ज़िंदगी में ऐसा कोई काम नहीं किया, जिससे उन्हें इस पद के योग्य माना जा सके। एकमात्र योग्यता रही नेताओं और राजनीतिक घरानों से नज़दीकियां। उत्तराखंड, पंजाब, कर्नाटक सहित कई राज्यों में तो राज्यों के मुख्य सचिवों ने सीधे मुख्य सूचना आयुक्त की कुर्सी संभाली, भले ही इसके लिए उन्हें वक्त से पहले रिटायरमेंट लेना पड़ा हो। उत्तर प्रदेश में तो सतीश मिश्रा के साथ काम करने वाले उनके चार जूनियरों को ही आयुक्त बना दिया गया है। पूरे देश में आयोगों का यही हाल है। आज यही लोग सुनिश्चित कर रहे हैं कि सूचना के अधिकार का ढिंढोरा भी बजता रहे और उनके आकाओं के भ्रष्टाचार पर भी कोई आंच न आए।

13. बंद होने की कगार पर सूचना आयुक्त के कार्यालय
फंड की कमी के चलते महाराष्ट्र सूचना आयोग के नागपुर और औरंगाबाद सूचना आयुक्त के कार्यालय बंद होने की कगार पर हैं। फंड उपलब्ध न होने की वजह से महीनों से कार्यालय के टेलीफोन, स्टेशनरी, बिजली और यात्रा का बिल नहीं चुकाया गया है। नागपुर के सूचना आयुक्त विलास पाटिल, औरंगाबाद के विजय भोरगे और पुणे के विजय कुवलेकर ने खुलेआम राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त सुरेश जोशी पर फंड उपलब्ध न कराने और कानून के विरुद्ध काम करने के आरोप लगाएं हैं। जब एक ही आयोग के आयुक्तों के बीच टकराव हो और वे बिजली, स्टेशनरी की कमी से जूझ रहे हों तो कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वहां सूचना मांगने वाले लोगों को न्याय मिलेगा।

14. सूचना के बदले पैसे
गाज़ियाबाद के रहने वाले कुलदीप सक्सेना ने बिजली विभाग से अपने इलाके के बिजलीघर की क्षमता और तीन महीने की सप्लाई के बारे में जानकारी मांगी तो विभाग ने उन्हें कहा कि सूचना देने के लिए एक कर्मचारी लगाना पडे़गा जिस पर 5000 का खर्च आएगा। इसी तरह भोजपुर जिले के गुप्तेश्वर सिंह ने राशन विभाग से अनाज और मिट्टी के तेल के बारे में सूचना मांगी तो उनसे 78 लाख रुपए की मांग की गई। वह भी तीस दिन की अधिकतम समयावधि के बाद। इसी तर्ज़ पर मेरठ विश्वविद्यालय के लोक सूचना अधिकारी ने संदीप पहल को सूचना देने के लिए क्लर्क और चपरासी के एक-एक महीने का वेतन मांगा। संदीप ने बीएड पाठ्यक्रम में सीटों की संख्या, इस सम्बन्ध में जारी किए गए शासनादेशों की प्रति तथा आरक्षण का लाभ पा रहे छात्रों के बारे में जानकारी मांगी थी। यह हथकंडा देश के सैकड़ों लोक सूचना अधिकारी आज़मा रहे हैं।

15. सूचना देने के कैसे-कैसे बहाने
सूचना कानून के तहत सूचना न देने के लिए लोक सूचना अधिकारी ऐसे अजीबोगरीब तर्क देते हैं, जिसका कोई मतलब नहीं होता। उत्तर प्रदेश सूचना आयोग संस्था के लेटरहेड पर सूचना मांगने पर आवेदन निरस्त कर देता है। रंजन कुमार की शिकायत संख्या 4269, मधुसुदन श्रीवास्तव की शिकायत 42700, अशोक कुमार सिंह की शिकायत एस 10-418(सी , मोज्जिमिल अंसारी की शिकायत संख्या एस 262(सी ) एवं कुंवर मनोज सिंह की शिकायत संख्या एस 10-173 (सी) इसी आधर पर निरस्त कर दी गईं। लखनऊ के सुरेन्द्रपाल रस्तोगी ने भारतीय निर्वाचन आयोग से जानकारी मांगी कि पोलिंग बूथ में तैनात किए जाने कर्मियों को अलग-अलग राज्यों में कितना मेहनताना दिया जाता है। आयोग ने आवेदन को धरा 6(३) के तहत विभिन्न राज्यों के निर्वाचन आयोगों में प्रेषित कर दिया। जम्मू-कश्मीर निर्वाचन आयोग की तरफ़ से आवेदक को पत्र मिला जिसमें कहा गया कि आवेदन हिन्दी के बजाय अंग्रेजी में भेजें।

16. आवेदन शुल्क का पेंच
आवेदन लेने में फीस का पेंच इस तरह फंसा है कि इसने एक सामान्य से कानून का इस्तेमाल भी पेचीदा बना दिया है। एक तरफ़ हरियाणा, जैसे राज्यों में सूचना के अधिकार के तहत आवेदन करने के लिए 50 रुपए देने पड़ते हैं वहीं अरुणाचल में यह फीस 10 रुपए से 500 रुपए तक है। हाई कोर्ट्स में तो यह 500 रुपए कर ही दी गई है। जहां 10 रुपए भी फीस है वहां भी हाल बेहाल है। नकद की रसीद नहीं, डिमांड ड्राफ्ट या पोस्टल ऑर्डर किस नाम से बनेगा कोई बताने को तैयार नहीं। गाजियाबाद के सुशील राघव जब अपना आरटीआई आवेदन यूपीएसआईडीसी के कार्यालय में जमा करने पहुंचे तो लोक सूचना अधिकारी ने पहले तो नगद आवेदन शुल्क लेने से ही मना कर दिया और बाद में कैश के बदले चैक जमा करने को कहा। इसके अलावा कई राज्य सरकारों ने आरटीआई नियमावली में संशोधन कर, आवेदन शुल्क 50 रुपए और फोटोकोपी शुल्क 10 प्रतिपेज कर दिया है। कुछ राज्यों में तो अपील के लिए भी शुल्क निर्धारित है, जबकि मूल कानून में अपील के लिए किसी भी तरह के शुल्क का प्रावधान नहीं है।

17. लोक सूचना अधिकारियों की गुंडई
आयोग तो आयोग, लोक सूचना अधिकारी भी आवेदकों पर फर्जी मुकदमा करने, धमकाने, जेल भिजवाने से लेकर उनके साथ मारपीट करने में पीछे नहीं हैं।
`जागरुक आदमी जेल मे सड़ते है या किसी गली में मरे पड़े मिलते हैं।´ यह बात उत्तर प्रदेश के एक पुलिस अधिकारी ने लखनऊ के सलीम बेग को कही। बेग ने सूचना के अधिकार कानून के तहत कॉन्सटेबल पद के लिए आवेदकों के नाम, पते एवं चयनित उम्मीरवारों के नाम, पता और आरक्षण अनुपात की जानकारी मांगी थी। जब सूचना आयोग ने सारी सूचनाएं उपलब्ध कराने का आदेश दिया तो विभाग के लोक सूचना अधिकारियों को यह नागवार गुजरा। चूंकि मामला पुलिस विभाग से जुड़ा था, सो पुलिस ने फर्जी एफआईआर दर्ज कर बेग को 17 दिनों के लिए जेल में बंद कर दिया।
इसी तरह बीएसएनएल, आजमगढ़ के अधिकारी और कर्मचारी आरटीआई आवेदनों से इस तरह परेशान हो गए कि उन्होंने सूचना मांगने वाले स्थानीय निवासी रवि कुमार मौर्य की कार्यालय में ही पिटाई कर दी। साथ की झूठा पुलिस केस भी दर्ज करा दिया। रवि ने कार्यालय में हमेशा देर से आने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों की सूचना मांगी थी। आजमगढ़ के ही इन्द्रसेन सिंह को जिला प्रशासन ने इसलिए गिरफ्तार करवा दिया क्योंकि उन्होंने एक ऐसी संस्था के लेटरहेड पर आवेदन जमा किया था जो रजिस्टर्ड नहीं थी।

18. धारा 8 के मायने
सूचना देने से बचने के लिए लोक सूचना अधिकारियों और अपीलीय अधिकारियों द्वारा आरटीआई कानून की धारा 8 का अपनी सहूलियत के हिसाब से तोड़ने-मरोड़ने के कई उदाहरण सामने आएं हैं। तमिलनाडु के सी. रमेश ने जब आरटीआई के तहत फरवरी 2002 से मार्च 2002 के दौरान तात्कालीन राष्ट्रपति के आर नारायणन और प्रधानमंत्री अटल बिहारी के बीच हुए पत्र व्यवहार की प्रतिलिपि मांगी तो सूचना कानून की धरा 8(१)(ए) का हवाला देते हुए सूचना देने से मना कर दिया गया। कहा गया कि इसे सार्वजनिक किए जाने से देश की एकता और अखंडता पर विपरीत असर पड़ सकता है। दिल्ली के दिव्यज्योति जयपुरियार ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी उत्तर पुस्तिका उपलब्ध कराने की मांग की तो दिल्ली विश्वविद्यालय के लोक सूचना अधिकारी ने धारा 8 का हवाला देते हुए जवाब दिया कि उत्तरपुस्तिका सार्वजनिक करने से देश की एकता, अखंडता और सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है, इसलिए इसे सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। दिल्ली के अफरोज ने बाटला हाउस एनकाउंटर के संबंध में दिल्ली पुलिस से कुछ सूचनाएं मांगी थी। जवाब में कानून की धरा 8(१)(बी) की आड़ लेते हुए बताया गया कि मामला कोर्ट में विचाराधीन है, इसलिए सूचनाएं नहीं दी जा सकतीं। जबकि कोर्ट ने सूचना सार्वजनिक न किए जाने का कोई आदेश प्रकाश में नहीं आया था। नई दिल्ली के प्रमोद सरीन ने दिल्ली कॉलेज और इंजीनियरिंग की संयुक्त प्रवेश परीक्षा परिणाम से असंतुष्ट होकर आरटीआई के तहत प्रश्न पत्र, ओएमआर शीट की छायाप्रति मांगी। विश्वविद्यालय प्रशासन ने यह कहते हुए सूचना देने से मना कर दिया कि प्रश्न पत्र और उनके जवाब विश्वविद्यालय की बौधिक संपदा है, इसलिए इन्हें कानून की धारा 8(१)(दी) के तहत नहीं दिया जा सकता। जबकि केन्द्रीय सूचना आयोग का कहना था कि प्रश्न पत्र और उत्तर कुंजी तैयार करना ऐसी कोई कला नहीं, जिसे बौधिक संपदा माना जाए।

19. अदालत कानून से ऊपर
जिस सुप्रीम कोर्ट ने किसी समय सूचना के अधिकार को मूलभूत अधिकार के रूप में व्याख्यायित किया था, उसी सुप्रीम कोर्ट के जज खुद को इस कानून के दायरे से बाहर मानते हैं और ऐसा कहने में शर्म भी महसूस नहीं करते। महामहिम न्यायविदों को इसमें अन्याय लगता है कि आम जनता न्याय की कुर्सी पर बैठे लोगों से पारदर्शिता की मांग करे। दिल्ली के रहने वाले सुभाष अग्रवाल और जाने माने अधिवक्ता प्रशांत भूषण की दाद देनी होगी कि उन्होंने सूचना के अधिकार के प्रति न्यायपालिका के रवैये को एक मुद्दा बना दिया। कई उच्च न्यायालयों में आज भी सूचना के अधिकार के तहत सूचना मांगने के आवेदन की फीस 500 रुपए है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने तो नियमावली बनाने में इस कानून के प्रावधानों को तोड़ मरोड़ दिया है। सवाल है कि देश की न्यायपालिका खुद को पारदर्शी और जनता के प्रति जवाबदेह बनाने के लिए तैयार है या नहीं। अगर नहीं तो फ़िर सेना और सीबीआई सहित करीब दर्जन भर विभाग तो ऐसे हैं ही जो शुरू से ही सूचना के अधिकार के दायरे से बाहर रखे जाने के लिए छटपटा रहे हैं।

20. कर्मचारियों पर विभागीय डंडा
अगर आप सरकार में काम करते हैं और अपने ही विभाग से सूचना मांगने की हिम्मत करना चाहते हैं तो आपको अफसरों की डांट, बिना वजह आरोप, फालतू की जांच और यहां तक की तबादला और निलंबन जैसी कार्रवाई के लिए भी तैयार रहना पड़ेगा। मध्य प्रदेश के देवास में केन्द्रीय विद्यालय के प्राईमरी शिक्षक मांगीलाल कजोडिया ने अपने ही विद्यालय से सूचनाएं मांगी तो पहले उन्हें कारगिल भेज दिया गया और बाद में नौकरी से ही निकाल दिया गया। कजोडिया ने अपने शिक्षक संघ के बारे में कुछ दस्तावेज और तबादला नीति के बारे में सूचना मांगी थी।
यही हाल रेलवे प्रोटेक्शन स्पेशल फोर्स में चालक ओंकार गुप्ता का भी हुआ जब उन्होंने अपने ही विभाग की तानाशाही को आरटीआई से उजागर किया। ओमकार ने चालकों के काम के घंटे, उन्हें मिले अवकाश, चालक को रिलीवर देने की जिम्मेदारी आदि जानकारियां मांगी थीं। इसके जवाब में ओंकार की तनख्वाह ही कम कर दी गई।
इसी तरह साउथ इस्टर्न कोलफील्ड लिमिटेड में कार्यरत मुजीबुर्र रहमान ने जब अपनी ही कंपनी से प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष में जमा किए गए धन की जानकारी मांगी तो उन्हें कंपनी के निदेशक की तरफ़ से धमकियाँ मिलनी शुरू हो गईं और उनके ख़िलाफ़ तमाम तरह की जांच बिठा दी गई।


जरूरी है सूचना का अधिकार क्योंकि........
1. सब पढ़ें, सब बढ़ें
सूचना कानून ने शिक्षा व्यवस्था में लगी जंग को थोड़ा बहुत सापफ करने का काम किया है, और इसी का कमाल है कि दिल्ली की पुनर्वास बस्ती, सुंदर नगरी में रहने वाला मोहन अब अर्वाचीन पब्लिक स्कूल में पढ़ता है। आरटीआई की बदौलत ही मोहन का दाखिला इस स्कूल में फ्रीशिप कोटे के तहत हो पाया है। दिल्ली में इस तरह के हजारों उदाहरण हैं। कल्याणपुरी में रहने वाली सुनीता ने तो सूचना के अधिकार का सहारा लेकर स्कूल की सभी छात्राओं छात्रवृत्तिदिलाई। सुनीता ने आरटीआई के तहत छात्रवृत्ति न मिलने का कारण पूछा। दो दिन बाद ही अधिकारी स्कूल में इस संबंध में जांच करने आए। सुनीता ने बेबाकी से प्रिंसिपल की शिकायत की। इसके कुछ दिनों बाद स्कूल की सभी छात्राओं को छात्रवृति वितरित कर दी गई। इसी तरह हरियाणा के सोनीपत जिले के सिलारपुर मेहता गांव की साठ वर्षीय सुमित्रा देवी ने आरटीआई की मदद से न सिर्फ़ प्रशासन की लापरवाही को उजागर किया बल्कि गरीब स्कूली लड़कियों के लिए साइकिल वितरण की एक सरकारी योजना और सर्वशिक्षा अभियान के तहत मिलने वाले स्कूल ड्रेस का लाभ भी छात्र -छात्राओं को पहुंचाया। इसी तर्ज पर इलाहाबाद के गुलरहाई और चित्रकूट के भरथौल प्राथमिक विद्यालय के छात्र-छात्राओं को भी आरटीआई डालने के बाद स्कूल ड्रेस मिल गई।

2. कहीं मिली नौकरी तो कहीं प्रोमोशन
आरटीआई की बदौलत लोग अब नौकरी भी पा रहे हैं, अब उन्हें प्रोमोशन भी मिल जाता है। और यह सब कुछ बिना रिश्वत दिए हो रहा है। ऐसा ही एक मामला रेवाड़ी की सपना यादव का है। सपना ने गुड़गांव ग्रामीण बैंक में प्रोबेशनरी अधिकारी पद के लिए आवेदन किया था। लेकिन उसका चयन नहीं हो पाया। आरटीआई के तहत सपना ने चयन प्रक्रिया से सम्बंधित प्रश्न पूछे। जवाब न मिलने पर मामला सीआईसी गया जहां आयोग ने बैंक को सभी सूचनाएं उपलब्ध कराने का आदेश दिया। दिलचस्प रूप से बैंक ने सूचना तो उपलब्ध नहीं कराई, अलबत्ता सपना को फोन कर प्रोबेशनरी अधिकारी के तौर पर बैंक ज्वाइन करने का अनुरोध जरूर किया। इसी तरह बिहार के मधुबनी जिले के चन्द्रशेखर ने जब पंचायत शिक्षक नियुक्ति के लिए घूस नहीं दी तो उन्हें यह कहकर नियुक्ति नहीं दी गई कि जिस महाविद्यालय से उन्होंने प्रशिक्षण हासिल किया है, वह फर्जी है। जबकि उसी महाविद्यालय से प्रशिक्षित अन्यों की नियुक्ति कर दी गई। चन्द्रशेखर ने जब प्रखंड विकास अधिकारी से इस मामले में सवाल किए तो उनकी नियुक्ति पंचायत शिक्षक के रूप में कर दी गई। नियुक्ति के अलावा बहुत से लोग पदोन्नत भी हुए हैं। उड़ीसा वन विकास निगम में सेक्शनल सुपरवाईजर के पद पर कार्यरत गणपति बहरा को वरिष्ठता के आधार पर प्रोमोशन नहीं दिया गया जबकि उनके जूनियरों को प्रोमोशन दे दिया गया। इस संबंध में आरटीआई डाली तो उन्हें सेक्शनल सुपरवाईजर से सब डिवीजन मैनेजर के पद पर प्रोमोट कर दिया गया।

3. खत्म हुआ पेंशन का टेंशन
लोगों के लिए सूचना का अधिकार जादू की एक छड़ी साबित हुआ है। सूचना कानून ने ऐसे हजारों लोगों को पेंशन दिलाने में अहम भूमिका निभाई है, जिनकी पेंशन विभागीय लापरवाही के कारण जारी नहीं की जा रही थी। उड़ीसा की 70 वर्षीय कबनाकलता त्रिपाठी का 13 साल से लटका पेंशन आरटीआई डालने के बाद एक महीने में ही मिल गया। कबनाकलता के पति श्याम सुंदर त्रिपाठी स्वतंत्रता सैनानी थे। कबनाकलता को 1993 से 1995 के बीच पेंशन राशि का भुगतान नहीं किया गया लेकिन जैसे ही आरटीआई डाली गई, इसके लिए दोषी अधिकारियों के नाम और पद पूछे, पेंशन राशि का भुगतान हो गया। बिहार के मधुबनी जिले के गंगापुर पंचायत के 200 पेंशनार्थी राष्ट्रीय वृधावस्था एवं सामाजिक सुरक्षा पेंशन पाने के उद्देश्य से उप डाक घर में पासबुक खुलवाने हेतु महीनों चक्कर लगाते रहे। पोस्टमास्टर इन लोगों के खाते खोलने को तैयार नहीं था। सूचना के अधिकार के अन्तर्गत लोगों ने आरटीआई आवेदन डालकर मधुबनी के डाक अधीक्षक से इस बारे में सवाल पूछे। आवेदन आने के बाद मधुबनी के डाक अधीक्षक ने मामले की जांच की। उन्होंने दोषी पोस्ट मास्टर गणेश सिंह को तत्काल निलंबित करते हुए सभी पेंशन धारियों का खाता दूसरे पोस्ट ऑफिस में खुलवा दिया।

4. सुधरता पीडीएस सिस्टम
राशन चोरी और राशन कार्ड का न बनना, ये दो समस्याएं हिन्दुस्तान में आम हैं। लेकिन जन वितरण प्रणाली में लगे घुन को भी आरटीआई ने धीरे-धीरे साफ़ किया है। दिल्ली में तो इसके सैकड़ों उदाहरण हैं हीं, पुरी की अनासारा गांव की 68 वर्षीय जनातुन बेगम और उनके पति को अंत्योदय योजना के तहत मिलने वाला अनाज आरटीआई की वजह से दोबारा मिलने लगा। यह अनाज उनके जीवन-यापन का एकमात्र सहारा था। आरटीआई डालकर राशन न मिलने की वजह पूछने के बाद अधिकारी और डीलर जनातुन के घर आए और एक क्विंटल चावल मुफ्त में देकर गए। इसी तरह बिहार के जहानाबाद जिले के कताईबिगहा गांव में ग्रामीणों को सही मात्रा में राशन और मिट्टी का तेल मिलने लगा है।

5. सुधारना पड़ा रवैया
आम आदमी के प्रति सरकारी अफसरों का रवैया कैसा होता है, यह किसी से छिपा नहीं है। लेकिन आरटीआई आवेदनों ने ऐसे अफसरों को अपने व्यवहार में बदलाव लाने पर मजबूर कर दिया है। ऐसे ही कुछ मामले बहराइच जिले में देखने को मिले। जिले के गिरिजापुरी कॉलोनी में स्थित भारतीय स्टेट बैंक की शाखा में बैंक कर्मी समय पर नहीं आते थे, विधवाओं एवं छात्रो के खाते नहीं खोले जाते थे, कैशियर पास बुक फ़ेंक देता था। इस तरह की घटनाएं आम थीं। लेकिन जंग हिन्दुस्तानी की सूचना के अधिकार की एक अर्जी ने वहां सब कुछ ठीक कर दिया। बैंककर्मियों का व्यवहार भी सुधरा है। जंग हिन्दुस्तानी ने बैंक शाखा के लोक सूचना अधिकारी को लिखे आवेदन में बैंक कर्मचारियों से सम्बंधित ब्यौरा, मौजूदा सुविधाओं की जानकारी मांगी थी। एक अन्य उदाहरण सत्य नारायण वर्मा का है। सत्य नारायण वर्मा पटसिया चौराहा बहराइच में एक दवाई की दुकान चलाते थे। जिला पंचायत ने एक नोटिस भेजकर उनकी आय 40 हजार मानते हुए 12 सौ रूपये वाशी कर के रूप में भरने को कहा। सत्यनारायण ने जिला पंचायत कार्यालय में सूचना के अधिकार के तहत आवेदन कर नोटिस से संबंधित विवरण मांगा। एक हफ्ता बाद पंचायत का एक कर्मचारी आवेदनकर्ता के पास गया और बोला - गलती से आपके पास नोटिस चला गया था, आप सूचना मत मांगिए, हम आपसे कभी पैसा वसूलने नहीं आएंगे।

6. अब नहीं चलेगा पुलिसिया डंडा
पुलिस की तानाशाही जगजाहिर है, लेकिन सूचना के अधिकार ने पुलिस की तानाशाही को कुछ हद तक कम जरूर किया है। उदाहरण के लिए पटना के सगुना निवासी अमित आनंद की जमीन कोइलवर थानाध्यक्ष के कब्जे से मुक्त हो गई। यह सूचना के अधिकार से ही संभव हुआ। अमित आनंद की रैयती जमीन को पुलिस ने अपनी धौंस दिखाकर गलत तरीके से अपने कब्जे में कर ली था। इसी तरह का एक मामला देवरिया जिले का भी है। यहां के धनेसर यादव की बेटी का गांव के कुछ लोगों ने अपहरण कर लिया था। धनेसर ने देवरिया कोतवाली को प्रार्थना पत्र देकर अभियुक्तों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करने की गुहार लगायी थी, लेकिन पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। तब धनेसर यादव ने सूचना कानून के तहत पुलिस कप्तान कार्यालय को आवेदन दिया जिसमें अपने शिकायत पर की गई कार्रवाई के बारे में पूछा। आवेदन मिलते ही पुलिस ने एफआईआर दर्ज करते हुए धनेसर की अगवा पुत्री को बरामद कर लिया तथा अभियुक्त भी गिरफ्तार कर लिए गए।

7. किसानों को हासिल हुए एक करोड़ रूपये
सूखे की मार झेल रहे बुंदेलखंड के बांदा जिले के गरीब किसानों को 1 करोड़ रूपये की राशि सूचना कानून की बदौलत हासिल हुई। जिले के त्रिवेणी बैंक ने किसानों की फसल बीमा की दावा राशि का भुगतान नहीं किया था। अप्रैल 2008 में राजभैया ने बैंक पूछा कि जिले के जिन किसानों के क्रेडिट कार्ड बनें, उनकी फसल का बीमा किया गया है या नहीं। जवाब न मिलने पर मामला राज्य सूचना आयोग पहुंचा। सूचना आयोग के आदेश का असर हुआ। किसानों के खातों में करीब एक करोड़ की राशि शीघ्र स्थानांतरित कर दी गई।

8. बेनकाब हुआ डओ
डओ कंपनी की यह कारस्तानी जनता के सामने शायद कभी नहीं आ पाती, अगर सूचना का अधिकार नहीं होता। डओ केमिकल्स पुणे के निकट तथाकथित रिसर्च और डेवलपमेंट सेंटर स्थापित कर रहा था। पुणे की विनीता देशमुख ने आरटीआई के तहत महाराष्ट्र सरकार के विभिन्न विभागों से इस मामले में सूचना मांगी। प्राप्त दस्तावेजों से पता चला कि महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्राण बोर्ड ने डओ कंपनी को केमिकल उत्पादन की मंजूरी दी है, जबकि इस कंपनी ने दावा किया था कि उनका यह प्लांट केवल रिसर्च सेंटर होगा यानि कोई उत्पादन कार्य नहीं होगा। इसके अलावा महाराष्ट्र औद्योगिक विकास निगम के मुख्य कार्यकारी अधिकारी की फाइल नोटिंग में पुणे कार्यालय को इसे महत्वपूर्ण परियोजना मानते हुए 48 घंटे के भीतर चाकन में सौ एकड़ जमीन की मंजूरी दिलाने की बात लिखी थी। इतना ही नहीं, डओ ने बिना अनुमति लिए 14800 पेड़ भी काट डाले। सूचना कानून से इतनी जानकारी निकलने के बाद यह मुद्दा मीडिया में खूब उछला। चाकन और उसके आसपास रहने वाले लोगों को जब सच्चाई का पता चला तो उन लोगों ने राज्यस्तरीय विरोध शुरू कर दिया। इसका परिणाम यह निकला कि उस वक्त लंदन में मौजूद मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख को डाओ के काम की समीक्षा करने का आश्वासन देना पड़ा।

9. क्लीनिकल ट्रायल में बच्चों की मौत
बड़े नामों के पीछे की असली कहानी है, एम्स का यह मामला। यह मामला भी तभी प्रकाश में आ सका जब आरटीआई कानून का इस्तेमाल किया गया। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में ढ़ाई साल (2006-०८) के दौरान हुए क्लीनिकल ट्रायल में 49 बच्चों की मौत हुई। यह क्लीनिकल ट्रायल करीब 4000 बच्चों पर किया गया था। जिसमें से करीब 2700 बच्चे एक साल से कम्र उम्र के थे। सूचना कानून के तहत दी गई जानकारी से पता चला है कि इन ट्रायल में कई विदेशी मेडिसिन और ड्रग को शामिल किया गया था। ट्रायल में दो ऐसे ड्रग इस्तेमाल किए गए थे जो केवल व्यस्कों को दिए जाते हैं। ट्रायल किए गए बच्चों की उम्र 1 से 16 साल के बीच थी। इस खबर के मीडिया में आने के बाद स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस मामले की जांच के आदेश भी दिए।

10. जनता की कमाई, शाहखर्ची में उड़ाई
आम आदमी के पैसों का इस्तेमाल हमारे नेता और नौकरशाह कैसे करते हैं, इसका खुलासा किया सूचना के अधिकार कानून ने। मिली सूचना के मुताबिक चार साल में इन मंत्रालयों के चाय-पानी पर आम आदमी की गाढ़ी कमाई में से लगभग 26 करोड़ रफपये खर्च कर दिए गए। जाहिर है यह तस्वीर भारत की नहीं बल्कि शाइनिंग इंडिया की है। पानी की कहानी से अलग इन नेताओं की एक कहानी और भी है और वो है तेल का खेल। यानि जितनी तेज इन्हें प्यास लगती है उतनी ही तेज प्यास इनकी गाड़ियों को भी लगती है। ये अलग बात है कि इस प्यास को बुझाने के लिए पानी की जगह तेल (ईंधन) खरीदने पर जम कर खर्च किया जाता है। इसके अलावा, साल 2003 से 2008 के बीच 44 मंत्रालयों एवं उनके अधीन विभिन्न विभागों के मंत्रियों और अधिकारियों ने केवल स्थानीय यात्राओं पर 58 करोड़ 54 लाख रुपये उड़ा दिए हैं।

11. खुलासा लूट की छूट का
शाहखर्ची के अलावा हमारे नेता जनता के हिस्से में आने वाले राहत पैकेज और राहत कोष पर अपनी गिद्ध दृष्टि रखते हैं। आरटीआई कानून ने ऐसे नेताओं की भी पोल खोली है। विदर्भ के किसानों के नाम पर आने वाला राहत पैकेज नेताओं और अधिकारियों के रिश्तेदारों में बांटा गया है। आरटीआई से पता चला कि भूतपूर्व कांग्रेस सांसद उत्तमराव पाटिल और उनके परिवार के सदस्यों ने इस पैकेज के तहत 10 गाय हासिल की। क्षेत्रा के विधायक डिगरास संजय देशमुख की पत्नी और मां को एक-एक गाय मिली। नागपुर जिले के पूर्व मंत्री शिवाजी राव मोघे के संबंधियों को आठ गाय हासिल हुई। इसी तर्ज पर वाणी के पूर्व विधायक वामाराव कसावर के 4 संबंधियों को 8 गाय मिलीं। दुसरी ओर, महाराष्ट्र मुख्यमंत्री राहत कोष प्राकृतिक आपदाओं या दुर्घटनाओं के मामले में राहत देने का काम कम लेकिन कबड्डी, फुटबोल प्रतियोगिता और गजल के महफिलों पर खर्च करने का काम ज्यादा करती है। 2003-05 के दौरान करोड़ों रपए उपरोक्त मदों पर खर्च कर दिए गए।

12. सफ़ेद हाथी है स्टेट गेस्ट हाउस
दिल्ली में स्थित विभिन्न राज्यों के स्टेट गेस्ट हाउस के रख-रखाव पर ही जनता की गाढ़ी कमाई के करोड़ों रुपये बहा दिए जाते हैं। और इतने के बाद भी कुछ ऐसे मंत्री या मुख्यमंत्री है जिन्हें इन अतिथि गृहों में रुकना नहीं भाता। सो, उनके लिए पांच सितारा होटल की भी बुकिंग की जाती है। आरटीआई के तहत उपलब्धकराए गए दस्तावेज के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 2006-07 में बिहार भवन और बिहार निवास के रख-रखाव पर, लगभग डेढ़ करोड़, उत्तर प्रदेश भवन और सदन पर 76 लाख रुपये का खर्च आया। जबकि झारखंड सरकार का अपना कोई भवन नहीं है (2006-07 के दौरान) इसलिए किराए के तौर पर 9 लाख रुपये प्रति माह भुगतान किया जाता है।

13. जजों की विदेश यात्राओं में कटौती
आरटीआई की बदौलत उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय के जजों का अपने सम्बन्धियों के साथ विदेशों में छुटि्टयां मनाने और अनावश्यक यात्राओं पर रोक लगाने की कवायद शुरू हो गई है। आरटीआई के इस्तेमाल से मिली सूचना के मुताबिक उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने अपनी पत्नी के साथ विदेश यात्रा की थी, जबकि नियम के मुताबिक उस यात्रा के दौरान मुख्य न्यायाधीश अपनी पत्नी को साथ नहीं ले जा सकते थे। मामला सामने आते ही सरकार ने कई दिशानिर्देश जारी किए हैं जिसमें जजों की विदेश यात्राओं में 30 प्रतिशत तक कटौती की बात है। इसके अलावा आवश्यक यात्राओं पर ही जाने की बात कही गई है, साथ ही सत्र के दौरान ऐसे दौरों से बचने की सलाह भी दी गई है।

14. पकड़ी गई लोक सेवा आयोग की धांधली
छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग से आरटीआई से मिली जानकारी से पता चला कि साल 2003 में आयोजित लोक सेवा आयोग की परीक्षा में स्केलिंग, कट ऑफ़ मार्क्स और मूल्यांकन में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी हुई है। अभ्यर्थी राजेश कुमार (रोल नं. १०५१८८) को सांख्यकी की 300 अंक की परीक्षा में 304 अंक दिए गए। वर्षा डोगरे का चयन कट ऑफ़ मार्क्स से अधिक अंक (१२९०) पाने के बाद भी नहीं हो पाया जबकि उससे कम अंक प्राप्त करने वाले कई अभ्यर्थियों का चयन हो गया। यह तो महज कुछ उदाहरण भर हैं, ऐसी और भी गई धांधलियां सामने आई हैं। इन तथ्यों के आधार पर बिलासपुर उच्च न्यायालय में रिट दायर की गई तो आयोग के अध्यक्ष अशोक दरबारी ने भी माना की परीक्षा में बड़े पैमाने पर धांधली हुई है। फिलहाल मामला उच्चतम न्यायालय में चल रहा है।

15. सड़कें भी बनवाता है आरटीआई
देश के अलग-अलग हिस्सों में सूचना के अधिकार ने सड़क निर्माण और मरम्मत में अहम भूमिका निभाई है। दिल्ली के मॉडल टाउन में रहने वाले मोहित अपने इलाके की सड़कों की दुर्दशा से परेशान थे। सड़कों में जगह-जगह गड्ढे थे। दिल्ली जल बोर्ड ने सीवर डालने के लिए उनके घर के आगे सड़क खोद दी थी। एमसीडी से इसी लापरवाही का जवाब मांगने के लिए मोहित ने आरटीआई दायर दी। आरटीआई की अर्जी आते ही एमसीडी हरकत में आई और सड़क मरम्मत का कार्य एक महीने से भी कम समय में संपन्न हो गया। इसी तरह पूर्वी दिल्ली के विजयनगर, डबल स्टोरी ब्लॉक नंबर एक और चार में नाला बनाने के लिए सड़क तोड़ी गई जो छह महीने तक टूटी ही पड़ी रही। इस मामले में आरटीआई डाली गई तो सड़क की मरम्मत नौ दिन में हो गई। उड़ीसा में भी ऐसी ही एक मिसाल देखी गई। पुरी जिले के कोणार्क क्षेत्र के करमंगा गांव में आरटीआई की बदौलत रातों रात सड़क बनवा दी गई।

16. पहले फेल फ़िर पास
स्कूल कॉलेज में पढ़ने वाले छात्रों ने पहले कभी नहीं सोचा था कि परीक्षा परिणाम से असंतुष्ट होने पर वे अपनी उत्तरपुस्तिका देख सकते हैं। लेकिन सूचना के अधिकार ने अब इसे मुमकिन कर दिखाया है। अनेक सूचना आयोगों और उच्च न्यायालयों ने ऐसे कई मामलों में उत्तरपुस्तिका दिखाने का आदेश दिया है। हालांकि इन आदेशों का पूर्णत: पालन नहीं हो रहा है, लेकिन बिहार के मलयनाथ का मामला इस दिशा में एक महत्वपूर्ण और सकारात्मक कदम माना जा सकता है। मलयनाथ नालंदा ओपन यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे थे। परीक्षा में फेल होने पर उन्होंने आरटीआई के तहत विश्वविद्यालय प्रशासन से अपनी उत्तरपुस्तिका दिखाने की मांग की। उत्तर पुस्तिका की दोबारा जांच की गई तो पता चला कि वे प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हैं।

17. नोटिस मिलते ही भेज दिया अनुदान
गोरखपुर के मिर्जा कमर बेग के बेटे मिर्जा सालिक बेग का एक गुर्दा खराब हो गया था। इस कार्य में ढाई लाख रूपए खर्च होने थे। गरीब बेग के लिए इतना पैसा जुटा पाना मुश्किल था। मदद के लिए स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय में आवेदन भेजा। इस तरह के मामलों में स्वास्थ्य मंत्रालय गरीब लोगों को अनुदान देता है। स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से कोई सूचना नहीं मिली। आखिरकार कर्ज लेकर बेग ने अपने बेटे का गुर्दा प्रत्यारोपण करवाया। स्वास्थ्य मंत्रालय के इस व्यवहार से व्यथित बेग ने सूचना अधिकार कानून का सहारा लेते हुए मंत्रालय के जनसूचना अधिकारी से पूछा कि नियमानुसार अनुदान कब तक मिल जाना चाहिए था और उनके मामले में अनुदान क्यों नहीं दिया गया? मंत्रालय की ओर से उनके आवेदन का कोई जवाब नहीं दिया गया। तब बेग ने केंन्द्रीय सूचना आयोग में शिकायत की। आयोग ने जनसूचना अधिकारी को नोटिस देकर इस मामले के अभिलेख के साथ प्रस्तुत होने का आदेश दिया। नोटिस मिलते ही स्वास्थ्य मंत्रालय हरकत में आ गया और बेग को अनुदान के तौर पर 20 हजार रुपए भेज दिए।

18. डर से ही हो गया काम
असम के तिनसुखिया जिले के रहने वाले नारायण परियाल जब भी एसबीआई बैंक की न्यू तिनसुखिया शाखा में पैसा निकालने के बाद पास बुक में प्रविष्टी कराने जाते तो बैंककर्मी काम से बचने की कोशिश करते थे। इससे आजिज आकर नारायण ने एक बार बैंक परिसर से ही आरटीआई हेल्पलाइन पर फोन करके इस मामले पर मदद मांगी। इस बातचीत को ब्रांच मैनेजर सुन रहा था, जो बात खत्म हो हाने के बाद नारायण के पास आया और बोला कि आपको आरटीआई पफाइल करने की जरूरत नहीं है, आपका काम हो जाएगा।

19. मिड डे मील में सुधार
अहमदाबाद में मिड डे मील योजना के तहत स्कूली बच्चों को दोयम दर्जे का भोजन मिलता था। भोजन में कई बार तो कीड़े भी पाए गए। भोजन की गुणवत्ता की जांच की कोई व्यवस्था नहीं थी। इस मामले में इंदुपुरी गोसाईं ने आरटीआई के तहत जवाब-तलब किया तो न केवल भोजन की लेबोरेट्री जांच हुई बल्कि उसकी गुणवत्ता भी सुधरी और निगरानी की समुचित व्यवस्था भी हुई। यह सब एक सप्ताह के भीतर हो गया। देश के अलग-अलग हिस्सों से इस तरह के अनेक मामले सामने आए हैं, जहां आरटीआई की बदौलत मिड डे मील व्यवस्था में गुणात्मक सुधर हो सका है।

20. मिली मजदूरी
उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गांरटी योजना के तहत काम करने वाले मजूदरों को 2 लाख रुपए का भुगतान संभव हुआ। तालाब खुदाई में लगे इन मजदूरों को समय पर भुगतान नहीं किया गया था। बांदा के ही सामाजिक कार्यकर्ता राजा भैया ने आरटीआई डालकर पूछा था कि तालाब निर्माण के इस काम में कितने लोगों को काम मिला है और कितनों को मजदूरी का भुगतान किया गया है। प्राप्त सूचना के अनुसार यहां काम में लगे मजदूरों का भुगतान एक माह से नहीं हो पाया था। धांधली सामने आते ही मुख्य विकास अधिकारी ने मामले की जांच की और इसके लिए दोषी अधिकारी को निलंबित तो किया ही, साथ ही मजदूरों के लिए 2 लाख रुपए की राशि आबंटित की।

1 टिप्पणी:

बेनामी ने कहा…

अब तो ये एक भद्दा मजाक भर लगता है.जब इस देश के सबसे उपर बैठे राष्ट्रपति इस कानून का अनुपालन नहीं करते .धारा 4-5 तो फिर ये किस काम का झुन-झुना बजाते रहिए.