बुधवार, 7 जनवरी 2009

सूचना का कमाल, लोगों ने छोड़ी शराब

उत्तर प्रदेश के बहराइ जिले में सूचना के अधिकार के इस्तेमाल का एक अनूठा मामला सामने आया है। इस कानून के तहत मिली सूचना का ही प्रभाव है कि बहराइच जिले के गांवों में परिवारों ने शराब से तौबा कर ली है। अभी तक सूचना के अधिकार का इस्तेमाल सरकारी फाइलों में छिपे सच को सामने लाने और इस प्रक्रिया में कर्मचारियों पर नियमानुसार काम करने का दबाव बनाने में होता रहा है। सरकारी फाइलें खुलने के डर से ही बहुत से कर्मचारी अपना आचरण सुधर लेते हैं। इसकी हजारों मिसालें दी जा सकती हैं। लेकिन फाइलों से जानकारी बाहर आए और उसका असर समाज पर इस प्रकार पड़े कि लोग शराब पीना तक छोड़ दें, ऐसा पहली बार हुआ है।
यह मामला किसी एक परिवार तक सीमित नहीं है। कई परिवार के लोगों ने शराबी पीनी छोड़ दी है और लोगों का यह सिलसिला अब तक जारी है। यह किस्सा है बहराइच जिले कतरनियाघाट में स्थित वनग्रामों का। यहां के बिछिया बाजार वनग्राम में कई सालों से देशी शराब का ठेका चला आ रहा था। मेहनत-मजूरी करने वाले यहां के लोग अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा शराब पर ही फूंक देते थे। गांव वालों के आर्थिक हालात पहले से ही काफी नाजुक थे, उस पर कुछ परिवारों में परिवार के मुखिया या किसी और की शराब पीने की लत से ये परिवार दरिद्रता से जूझ रहे थे।
देहात समाजसेवी संस्था से जुडे़ सामाजिक कार्यकर्ता जंग हिन्दुस्तानी इस इलाके के लोगों के अधिकारों के लिए लड़ते रहे हैं। उनका मुख्य संघर्ष इन लोगों के अधिकारों को लेकर है। इसमें भी विशेषकर मजूदरी न मिलना, विभिन्न कल्याण योजनाओं का लाभ न मिलना, राशन न मिलना आदि समस्याओं को लेकर पिछले कई सालों से संघर्ष चला आ रहा है। जिसमें सूचना के अधिकार के आने के बाद से उल्लेखनीय सफलता भी मिली है। जंग हिन्दुस्तानी यह देखकर अफसोस करते थे कि वनग्रामों के कई लोग अपनी मेहनत मजदूरी का पैसा घर परिवार में लगाने की जगह शराब में उड़ा देते थे। इससे उनकी आर्थिक स्थिति तो बुरी से बुरी हो ही रही थी इलाके में असामाजिक गतिविधियां भी होती थीं। उन्होंने लोगों को समझाने के लिए पहले भी कोशिश की थी लेकिन उसका कोई खास असर नहीं हुआ। इसी क्रम में वह जानना चाहते थे कि एक आम परिवार शराब पर कितना पैसा खर्च कर रहा है।
30 जून 2007 को उन्होंने सूचना के अधिकार के तहत सरकार से पूछा कि इलाके की शराब की दुकान से उसे कितना राजस्व प्राप्त हुआ है। तो पता चला कि पिछले तीन साल में महज उस इलाके में शराब की ब्रिकी से सरकार को 40 लाख 86 हजार 40 रुपये का राजस्व प्राप्त हुआ। इलाके में न तो कोई टूरिस्ट पैलेस और न होटल आदि। कुल मिलाकर कुछ वनग्रामों की आबादी है। राजस्व की इस राशि के हिसाब से करीब 70 लाख रुपये की शराब इलाके में तीन साल के दौरान बिकी थी। जंग हिन्दुस्तानी ने अपने साथियों के साथ गांव-गांव जाकर ऐसे लोगों की सूची तैयार की जो शराब पीते थे। इस प्रक्रिया में पता चला कि इलाके के कुल 300 परिवारों में शराब पी जाती है। इसकी सामान्य गणना करने पर निकल कर आया कि इलाके में हर शराबी प्रतिदिन औसत 20 रुपये की शराब पी रहे थे। जबकि अधिकतर परिवार गरीब थे और किसी तरह मेहनत-मजूरी करके अपने परिवार का गुजारा चला रहा थे। इलाके में दिन भर मेहनत करने के बाद मुश्किल से 50-60 रुपये की मजदूरी मिलती है। शराब पीने वाले लोग इसमें एक तिहाई कमाई शराब में उड़ा रहे थे।
सूचना के अधिकार के तहत मिली इस जानकारी को लोगों के समक्ष रखा गया और उन्हें बताया गया कि वे शराब पर कितना पैसा खर्च कर रहे हैं। लोगों को बताया गया कि जो पैसा बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य, घर-गृहस्थी चलाने आदि में खर्च किया जा सकता था और जिससे गरीबी कम की जा सकती थी, उसे शराब पर बहाया जा रहा है।
इतने पुख्ता तथ्यों के साथ जब बात लोगों के सामने रखी गई तो इसने अपना असर दिखाया। जंग हिन्दुस्तानी ने लोगों को यह भी याद दिलाया कि अपने हक के एक-एक रुपये की खातिर वे लोग जो संघर्ष करते आए हैं वह कुछ मिनटों में नशे में उड़ा दिया जा रहा है। इन बातों ने अपना प्रभाव दिखाया।
लोगों को यह बात धीरे-धीरे समझ में आ गई कि शराब ही उनके दुखों को मूल कारण है। उन्हें एहसास हो गया कि यदि शराब की लत छोड़ दी जाए तो उनकी अधिकांश समस्याएं हल हो सकती हैं। उसी दिन से कुछ ग्रामीणों ने शराब छोड़ने की कसम खाई। गांव में शराब छोड़ने वाले लोगों की संख्या में निरंतर बढ़ोतरी होती जा रही है। जो पैसा पहले वे शराब पर खर्च कर रहे थे, उसे बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य, कपड़ों आदि पर खर्च करने लगें। कैलाशनगर वनग्राम के गीताप्रसाद कहते हैं- शराब छोड़ने से हमें हद से ज्यादा फायदा हुआ है, पहले हमारा एक भी पैसा बैंक में जमा नहीं था लेकिन अब मेरे 8 हजार रुपये बैंक में जमा हैं। शराब छोड़ चुके शिवचरण का कहना है- पहले हम हद से ज्यादा शराब पीते थे, लड़ाई झगड़ा करते रहते थे। सूचना के अधिकार से पता चलने पर हमने सोचा कि यदि पैसा बचेगा तो हमारे बच्चे पढ़ेगें, हम भूखे नहीं मरेंगे, यही सोचकर शराब छोड़ दी। अब हमारे बच्चे स्कूल जाने लगे हैं और हम सुकून में हैं। कैलाशनगर के द्वारिका प्रसाद ने भी यही सोचकर शराब की लत से मुक्ति पा ली।

माफ़ हुआ किसानों का 32 लाख का कर्ज

भारत सरकार ने ऋणग्रस्त किसानों के कर्जमाफी की घोषणा तो कर दी लेकिन बहराइच जिले में बैंक किसानों को यह लाभ देने से बच रहे थे। बैंक द्वारा कर्ज माफी के पात्र किसानों की घोषणा न करने के कारण कर्ज दाता परेशान थे। बैंक किसानों का कर्ज माफ करने के लिए पैसों की मांग भी कर रहे थे। इस संबंध में सूचना के अधिकार का इस्तेमाल किया गया तो समस्त पात्र किसानों की सूची बोर्ड पर लगा दी गई। जिसका नतीजा यह हुआ कि क्षेत्र के 57 किसानों का करीब 32 लाख रूपये का कर्ज माफ हो गया।
आवेदनकर्ता जंग हिन्दुस्तानी ने लखनऊ क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक के जन सूचना अधिकारी को लिखे आवेदन में बैंक की तीन शाखाओं (प्रेमीदास कुटी, चाकूजोत और भिलोरा बासू) के संबंध में जानकारी मांगी। आवेदन में पूछे गए प्रश्न-
1- उपरोक्त शाखा में तैनात बैंक कर्मियों के नाम, पद, पता व वेतनमान की लिखित जानकारी दें
2- उपरोक्त शाखाओं से सम्बंधित उपभोक्ताओं की बैंकवार संख्या की जानकारी दें
3- उपरोक्त शाखाओं से सम्बंधित समस्त ऋणदाताओं की लिखित व प्रामाणिक जानकारी दें। बैंकवार सूची प्रदान करें।
4- उपरोक्त शाखाओं से सम्बंधित समस्त कर्जमाफी के दायरे में आने वाले ऋण दाताओं की बैंकवार सूची प्रदान करें।
5- कर्जमाफी के संबंध में केन्द्र एवं राज्य सरकार द्वारा जारी किए गए समस्त शासनादेशों की प्रामाणिक छायाप्रति उपलब्ध कराएं।
बैंक ने आवेदन में पूछे गए इन प्रश्नों के जवाब तो नहीं दिए क्योंकि इन सवालों के जवाब देने में वे खुद फंस रहे थे। हालांकि आवेदन प्राप्त होने के बाद कर्जमाफी के पात्र किसानों की सूची बैंक के बोर्ड में लगा दी गई। जिससे लोगों को पता चल गया कि उनका कर्ज माफ हुआ है या नहीं। इस तरह सूचना के अधिकार की बदौलत 57 किसानों के नामों की घोषणा बैंक को करनी पड़ी और उनका करीब 32 लाख का ऋण माफ हो गया। आवेदनकर्ता जंग हिन्दुस्तानी ने आवेदन में मांगी गई सूचनाओं की प्राप्ति हेतु राज्य सूचना आयोग में अपील कर दी है और सुनवाई की प्रतीक्षा में हैं।

सूचना मत मांगिए, हमसे गलती हो गई....

अधिकारी अपनी मनमानियों से किस प्रकार आम लोगों को तंग करते हैं, बिना किसी आधर पर लोगों को परेशान करने के लिए नोटिस भेजकर पैसों की उगाही करने का प्रयास करते हैं, इसका उदाहरण बहराइच जिले के सत्यनारायण वर्मा के साथ देखने को मिला। लेकिन जैसे ही सूचना के अधिकार कानून का इस्तेमाल किया गया, अधिकारियों की मिलीभगत सार्वजनिक हो गई।
दरअसल सत्य नारायण वर्मा पटसिया चौराहा, थाना फकरपुर, बहराइच में एक दवाई की दुकान चलाते हैं। जिला पंचायत ने 24 फरवरी 2008 को एक नोटिस भेजकर उनकी आय 40 हजार मानते हुए 12 सौ रूपये वार्षिक कर के रूप में भरने को कहा। साथ ही कहा गया कि 30 दिन में कर अदा न करने पर उनके खिलाफ कार्रवाई जाएगी।
मामले की तह तक जाने के लिए सत्यनारायण ने अपर मुख्य अधिकारी, जिला पंचायत कार्यालय के लोक सूचना अधिकारी को सूचना के अधिकार के तहत आवेदन किया जिसमें नोटिस से सम्बंधित विवरण मांगा। यह आवदेन 12 फरवरी 2008 को सूचना के अधिकार के लाइफ एंड लिबर्टी उपबंध के अन्तर्गत डाला गया था। इस उपबंध के तहत 48 घंटे में सूचना मुहैया करानी होती है। आवेदन ने असर दिखाया। आवेदन दाखिल करने के एक हफ्ता बाद पंचायत का एक कर्मचारी आवेदनकर्ता के पास गया और नोटिस भेजने की गलती पर माफी मांगी। कर्मचारी ने कहा-गलती से आपके पास नोटिस चला गया था, आप सूचना मत मांगिए, हम आपसे कभी पैसा वसूलने नहीं आएंगे। उस दिन के बाद नोटिस भेजकर पैसा मांगने की घटनाएं समाप्त हो गईं और कोई कर्मचारी फ़िर पैसा मांगने नहीं आया।

कांजीहाउस में बंद हुई मनमानी वसूली

सूचना के अधिकार की बदौलत ग्रामीणों से बिछिया बाजार स्थित वन विभाग के कांजीहाउस से गैर कानूनी वसूली बंद हुई है। कांजीहाउस वह स्थान होता है जहां आवारा जानवरों को बंद किया जाता है और निर्धारित शुल्क लेने के बाद ही उन्हें छोड़ा जाता है। बिछिया बाजार के कांजीहाउस में भी जानवरों को छोड़ने के लिए शुल्क निर्धारित था लेकिन गांव के किसी भी निवासी को सही दरें मालूम नहीं थीं। कांजीहाउस मालिक व ठेकेदार ग्रामीणों से निर्धारित दर से कई गुना अधिक शुल्क वसूलते थे। उदाहरण के लिए एक भैंस को छोड़ने के लिए मनमाने तरीके से 150 रूपये लिए जाते हैं। प्रति गाय 100 रूपये, प्रति बकरी 50 से 75 रूपये तक वसूले जाते थे।
कांजीहाउस की ज्यादतियों और मनमानियों से तंग आकर सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. जंग हिन्दुस्तानी ने सूचना के अधिकार के अन्तर्गत दिनांक 25 जून 2007 को जनसूचना अधिकारी, अपर मुख्य जिला पंचायत, बहराइच से आवेदन दाखिल कर इस संबंध में जानकारी मांगी। आवेदन में पूछा गया कि जनपद में कुल कितने कांजीहाउस है और कहां-कहां स्थित हैं? बिछिया बाजार कांजीहाउस की स्थापना कब हुई और अब तक के समस्त ठेकेदारों के नाम बताए जाएं। कांजीहाउस में बंद पशुओं के साथ कैसा व्यवहार होना चाहिए? साथ ही पशुओं को छोड़ने के लिए जुर्माने की दर, सम्बंधित नियमों, शासनादेशों की प्रामाणिक छायाप्रति भी मांगी गई।
जवाब में जो जानकारी मिली वो चौंकाने वाली थी। वसूली जाने वाली जुर्माने की राशि और निर्धारित राशि में काफी अंतर था। पता चला कि जिस भैंस को छोड़ने के लिए 150 रूपये वसूले जाते थे, उसकी निर्धारित जुर्माना राशि 25 रूपये है। इसी तरह बकरी को छोड़ने के लिए 5 रूपये, एक वर्ष तक के बछडे़ के लिए 10 रूपये, ऊँट के लिए 25 और हाथी के लिए 50 रूपये की दर निर्धारित थी। यह जानकारी भी मिली कि भैंस की प्रतिदिन की खुराक 6 रूपये, गाय की 5 रूपये, बकरी की 2 रूपये आदि है।
जानवरों की सही दरों की जानकारी मिलने के लिए बाद जंग हिन्दुस्तानी ने सरकारी दरों को फोटोकॉपी करवाकर जगह-जगह छपवा दीं ताकि गांव के सभी लोगों को सही दरों का पता चल जाए और वे अतिरिक्त शुल्क देने से बचें। इस तरह सूचना के अधिकार कानून की बदौलत बिछिया बाजार का कांजीहाउस अब भ्रष्ट ठेकेदारों से चुंगल से मुक्त हो चुका है।

गोसदन की संपत्ति अधिकारी के घर

बहराइच जिले के बिछिया बाज़ार स्थित राजकीय गोसदन में पशु तो एक भी नहीं है, लेकिन यहां के दो कर्मचारी हर महीने 21 हजार रूपये का वेतन घर बैठे पाते हैं। 1952 में बना ये गोसदन बिछिया रेलवे स्टेशन के पास पशुओं के रखरखाव और देखभाल के लिए बना था। लेकिन देखभाल किसी और की हो रही थी। गोसदन के लिए आबंटित 24 कुर्सियां पशुधन विभाग के लोक सूचना अधिकारी के घर की शोभा बढ़ाती मिलीं। 2 लाख 34 हजार की बताई गई गोसदन की परिसंपत्ति मौजूद ही नहीं है, उसे भी अधिकारी अपने निजी हित के लिए इस्तेमाल करते मिले। इस तरह की तमाम अनियमिताएं सूचना के अधिकार के जरिए उजागर हुई हैं।
आवेदनकर्ता जंग हिन्दुस्तानी ने 30 जून 2007 को मुख्य पशुधन विकास अधिकारी से गोसदन के संबंध में अनेक प्रश्न किए। आवेदन में गोसदन की स्थापना के समय और वर्तमान परिसंपत्तियों के बारे में जानकारी मांगी गई। गोसदन की स्थापना से अब तक आए और वर्तमान में मौजूद पशुओं की संख्या, गोसदन में अब तक हुए निर्माण कार्यों की जानकारी, अब तक मृत पशुओं की संख्या, गोसदन में तैनात कर्मचारियों के नाम, पद तथा पते आदि का विवरण भी उपलब्ध कराने को कहा गया। साथ ही 2006 से आगे की कार्ययोजना हेतु स्वीकृत धनराशि की जानकारी भी चाही।
पशुधन विकास अधिकारी कार्यालय की तरफ से 7 अगस्त 2007 को दिए गए जवाब में अधिकांश सवालों के उत्तर नदारद थे लेकिन कुछ जवाब चौंकाने वाले थे। मसलन, वर्तमान में गोसदन में उपलब्ध पशुओं की संख्या सात बताई गई जबकि वहां एक भी पशु नहीं था। गोसदन बनने से अब तक कुल 196 पशु यहां लाए गए जिनमें 189 पशु मर चुके हैं। श्री कुंवर मुकेश गोसदन के मैनेजर के रूप में कार्य कर रहे हैं और इसके रखरखाव के लिए 14 हजार का वेतन पाते हैं। गाय चराने के लिए रखे गए शिवकुमार 7 हजार का वेतन ले रहे हैं।
जवाब में जनवरी 2006 से आगे की कार्ययोजना के बारे में बताया गया है कि पशुओं के खाने के लिए टब, जनरेटर और पानी निकालने के लिए पंप खरीदा जा चुका है तथा बोरिंग कराने की कार्रवाई चल रही है। इस कार्य हेतु 2 लाख 34 हजार रूपये की राशि स्वीकृत की गई।
लेकिन जवाब में बताई गई यह परिसंपत्ति गोसदन में मौजूद नहीं थी बल्कि उसका इस्तेमाल पशुधन विभाग के अधिकारी के घर पर हो रहा था। इसके अलावा गोसदन को आंबटित 24 कुर्सियां भी पशुधन विभाग के अधिकारी के घर इस्तेमाल हो रही थीं।

रातों-रात दुरूस्त हुआ स्कूल

उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले के बरदिया गांव में सूचना के अधिकार की एक अर्जी ने ऐसा असर दिखाया कि वहां का बदहाल माध्यमिक स्कूल रातों-रात दुरूस्त हो गया। अर्जी दाखिल होते ही अधिकारियों ने मिस्त्री लगाकर स्कूल के टूटे फर्श, टपकती छत और दीवारों से झड़ती बालू को ठीक करवा कर दिया। यह असर सूचना के अधिकार का था।
बरदिया गांव एक थारू जनजाति हुल गांव है। गांव के लोगों को शिकायत थी कि उनके ग्राम पंचायत के पूर्व माध्यमिक विद्यालय के नवनिर्मित अतिरिक्त कक्ष की छत टपक रही है तथा कई जगह पफर्श टूट चुके है। लोगों का कहना था कि स्कूल की जर्जर हो चुकी दीवारों से बालू झड़ती है। ग्रामीणों ने इस अपनी शिकायत के प्रमाण के लिए 3 अगस्त 2007 को स्कूल की जर्जरावस्था तस्वीरें भी खींच लीं। इन्हीं तथ्यों एवं तस्वीरों के आधार पर 3 अगस्त को ही बहराइच के बेसिक शिक्षा अधिकारी को सूचना के अधिकार के तह आवेदन किया गया। आवेदनकर्ता जंग हिन्दुस्तानी ने आवेदन में शिक्षा सत्र 2006-07 के दौरान विद्यालय के संबंध में अनेक प्रश्न पूछे। मसलन, कक्षा वार छात्रा-छात्राओं की संख्या, कुल कितने दिन विद्यालय खुला, कितने दिन मिड डे मील पकाया गया एवं पूरे साल इस पर कितना भुगतान किया गया और इस दौरान कुल कितना गेंहू, चावल और गैस का इस्तेमाल हुआ।
दूसरे प्रश्न में आवेदनकर्ता ने स्कूल में कुल पदों की संख्या, कार्यरतों की संख्या, रिक्त पदों की संख्या, शिक्षा मित्रों की संख्या, छात्रावृत्ति एवं ड्रेस पाने वालों छात्रों के नाम एवं पतों की जानकारी मांगी। तीसरे प्रश्न में आवेदक ने विद्यालय भवन के संबंध में सवाल पूछे जिसमें कुल कक्षों की संख्या, कार्यालय कक्षों की संख्या, प्रयोग किए जा रहे कक्षों की संख्या, अतिरिक्त कक्षों की संख्या तथा प्रयोग न किए जाने वाले कक्षों का कारण जानना चाहा। चौथे प्रश्न में आवेदक ने 2006-07 में स्वीकृत अतिरिक्त कक्षों की संख्या और उक्त वर्ष में बने कक्षों की जानकारी मांगी। अंतिम और पांचवे प्रश्न में जंग हिन्दुस्तानी ने अतिरिक्त कक्ष स्वीकृत होने की तिथि, कक्ष के लिए स्वीकृत धनराशि, निर्माण कार्य शुरू होने की तिथि, निर्माण में लगे मजदूरों के नाम और पते और उनको मिली मजदूरी की जानकारी मांगी। इसके अतिरिक्त निर्माण कार्य में प्रयुक्त ईंट, सीमेंट, बालू, लकड़ी, सरिया आदि सामान का विवरण भी मांगा।
कक्ष की स्थिति पर हां या ना में सवालों के जवाब देने के उद्देश्य से पूछा गया कि क्या स्कूल की छत टपकती है, क्या फर्श टूट गया है, क्या दीवार धंस गई है, क्या दीवार से बालू गिरता है, क्या नींव कम गहरी है और क्या भवन कभी भी गिर सकता है? कक्ष का निर्माण कराने वाले, सत्यापन करने वाले तथा कक्ष के गिरने के लिए जिम्मेदार कर्मचारी एवं अधिकारियों के नाम और पद भी अंत में पूछे गए।
अधिकारियों के आवेदन में पूछे गए सवालों से होश उड़ गए। उन्होंने जवाबों से बचने के लिए रातों रात स्कूल की मरम्मत करवा दी। सूचना न देने पर आवेदनकर्ता ने राज्य सूचना आयोग में शिकायत कर दी है और सुनवाई की प्रतीक्षा में हैं।

मंगलवार, 6 जनवरी 2009

क्या है सूचना के अधिकार कानून में तीसरा पक्ष

नीरज कुमार
सूचना के अधिकार कानून के नजरिए से देखें तो जो व्यक्ति या आवेदक सूचना मांगता है वह प्रथम पक्षकार माना जाता है और जिस विभाग या लोक प्राधिकारी से सूचना मांगता है वह द्वितीय पक्षकार होता है। इस तरह की सूचनाओं में आमतौर पर किसी प्रकार की परेशानी नहीं होती। लेकिन यदि आवेदक द्वारा मांगी जा रही सूचना आवेदक से सीधे-सीधे सम्बंधित होकर किसी अन्य व्यक्ति से सम्बंधित हो तो यह अन्य व्यक्ति तृतीय पक्ष कहलाता है। तीसरे पक्ष से सम्बंधित व्यक्ति की सूचना को तृतीय पक्ष की सूचना कहा जाता है। सूचना के अधिकार कानून में तृतीय पक्ष की गोपनीयता को संरक्षित करने का प्रावधान है। कानून की धारा 11 में ऐसी सूचनाएं जो किसी पर-व्यक्ति से सम्बंधित होती है, वह सूचना आवेदक को दिए जाने से पूर्व तीसरे पक्षकार से इजाजत लेनी पड़ती है।

ऐसे मामलों में लोक सूचना अधिकारी की जिम्मदारी होती है कि वह आवेदन प्राप्त होने के पांच दिनों के भीतर तीसरे पक्षकार को इस आशय की सूचना देगा तथा अगले 10 दिनों के भीतर सूचना जारी करने की सहमति या असहमति प्राप्त करेगा। लेकिन कानून में यह भी स्पष्ट किया गया है कि ऐसी सूचना जिसको जारी करने में किसी प्रकार का सामाजिक हित सधता हो या तीसरे पक्ष की सूचना को जारी करने से होने वाली संभावित क्षति लोक हित से ज्यादा बड़ी न हो तो उस दशा में मांगी गई सूचना जारी की जा सकती है।

कानून में यह एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी लोक सूचना अधिकारी को है कि वह मांगी गई सूचना तृतीय पक्षकार व लोक हित को अच्छी तरह समझ बूझ कर जारी करे। लेकिन कई मामलों में देखने में आया है कि लोक सूचना अधिकारी व्यक्तिगत स्वार्थ या विभागीय दबाव के चलते तृतीय पक्ष से सम्बंधित धारा 11 का गलत इस्तेमाल सूचनाओं को जारी करने से रोकने में कर रहे हैं। ऐसा होने से इस महत्वपूर्ण एवं लाभकारी कानून का फायदा आम जनता ठीक से नहीं उठा पा रही है। ऐसे समय में सूचना आयुक्तों की जिम्मेदारी काफी बढ़ जाती है कि वह तृतीय पक्ष से सम्बंधित सूचनाओं को जारी करने में लोक हित का विशेष ख्याल रखें जिससे कानून की मूल भावना पारदर्शिता और जवाबदेयता बची रहे। साथ ही गलत तरीके से सूचनाओं को बाधित करने वाले लोक सूचना अधिकारियों पर कानून की धारा के मुताबिक जुर्माना लगाएं एवं उनके खिलाफ अनुशासनात्कम कार्रवाई की भी अनुशंसा करें।

तीसरे पक्ष से सम्बंधित कुछ महत्वपूर्ण फैसले
एक कर दाता द्वारा जमा की गई आयकर रिटर्न की सूचना भी तृतीय पक्ष से सम्बंधित मानी गई है। सूचना आयोग ने एक मामले की सुनवाई के दौरान आयकर रिटर्न की प्रतिलिपि नहीं दिलवाई । आयोग का मानना था कि आयकर रिटर्न से व्यक्ति विशेष की व्यवसायिक गतिविधि का पता चलता है और करदाता द्वारा यह सूचना विभाग को वैश्वासिक संबंधों के तहत दी जाती है, जिसे सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। लेकिन इसी तरह के एक दूसरे मामले में आयोग ने आयकर एसेसमेंट की जानकारी सार्वजनिक करने में कोई आपत्ति नहीं जताई। जबकि आयकर असेसमेंट में आयकर रिटर्न से अधिक व्यक्तिगत एवं व्यवसायिक सूचनाएं निहित होती हैं। इसी से समझा जा सकता है कि कानून तो सूचना दिलाने के लिए प्रतिबद्ध है लेकिन सूचना दी जाए या नहीं इसका सारा दारोमदार सूचना आयुक्त पर ही है।

ऐसे कई मामले भी सामने आए हैं जिसमें सूचना आयुक्तों ने वैश्वासिक संबंध में उपलब्ध कराई गई सूचना लोकहित में उपलब्ध कराने के आदेश दिए हैं। ऐसे ही एक मामले में एक दंपत्ति ने सूचना के अधिकार कानून के तहत एक डॉक्टर के शैक्षणिक प्रमाण पत्रों की प्रतिलिपि मांगी। जिसे मेडिकल संस्थान ने देने से मना कर दिया। संस्थान का यह मानना था कि शैक्षणिक प्रमाण पत्रों की प्रतिलिपियां पर-व्यक्ति की व्यक्तिगत सूचना है जिसे दिए जाने से उसकी निजता का हनन होता है। आयोग में सुनवाई के दौरान दंपत्ति ने यह सूचना लोकहित में जारी करने की दलील दी। उनका कहना था कि शैक्षणिक दस्तावेज जिस डाक्टर के मांगे गए हैं, उसने उनके पुत्र का इलाज किया था और उनके पुत्र की इलाज के दौरान मृत्यु हो गई थी। उन्हें संदेह था कि डाक्टर के दस्तावेज फर्जी हैं। आयोग ने भी इस दलील पर सहमति जताई और सूचना जनहित में जारी करने के आदेश दिए।