शुक्रवार, 3 जुलाई 2009

काम के न काज के, दुश्मन समाज के

इसमें कोई शक नहीं कि आरटीआई कानून ने गरीब, मजदूर यहां तक कि एक अशिक्षित आदमी को भी सशक्त बनाने का काम किया है। लेकिन, सूचना आयोग और यहां बैठे सूचना आयुक्त के चाल और चरित्र को देखकर एक आम आदमी के लिए इस कानून पर भरोसा रख पाना मुश्किल होता जा रहा है। ऐसा ही एक मामला मुजीबुर्र रहमान बनाम केन्द्रीय सूचना आयोग का है। इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने आयोग के उस आदेश को उलट दिया जिसमें आयोग ने पीआईओ पर जुर्माना लगाने के लिए पहले तो कारण बताओ नोटिस जारी किया और बाद में इसे वापस ले लिया था। हाईकोर्ट का यह फैसला नि:संदेह स्वागतयोग्य है, जिसमें लोक सूचना अधिकारी पर जुर्माना लगाने से ले कर अपीलार्थी को अदालती खर्च तक दिलाने का आदेश दिया गया है। यानि जो काम केंद्रीय सूचना आयोग में बैठे विद्व जनों को करना चाहिए था, वो काम हाई कोर्ट ने किया है।
पूरा मामला कुछ यूं है। साउथ इस्टर्न कोलफील्ड लि. (एसईसीएल) छत्तीसगढ़, के कर्मचारी मुजीबुर्र रहमान ने अपने से जूनियर कर्मचारी को प्रमोशन किए जाने पर नवंबर 2005 में आरटीआई कानून के तहत अपने विभाग से सेवा नियमों के बारे में जानना चाहा, साथ ही सीनियरटी लिस्ट और प्रमोशन नियम के बारे में भी सवाल पूछे थे। पीआईओ ने 30 दिनों के भीतर सूचना उपलब्ध नहीं कराई। प्रथम अपील करने के बाद भी जब सूचना नहीं मिली तो रहमान केंद्रीय सूचना आयोग पहुंचे।
27 मार्च 2006 को आयोग ने सुनवाई के बाद अपीलार्थी को सभी सूचनाएं मुहैया कराने का आदेश दिया लेकिन डीम्ड रिफ्यूजल के लिए जिम्मेवार डीम्ड पीआईओ (क्योंकि वास्तविक पीआईओ ने सूचना एकत्र करने का जिम्मा एक अन्य अधिकारी को दे दिया था) को जुर्माना लगाने के लिए कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया। आयोग ने पीआईओ के खिलाफ विभागीय कार्रवाई करने का आदेश भी दिया।
बहरहाल, एसईसीएल ने जैसे-तैसे सूचना मुहैया कराने की खानापूर्ति कर दी। रहमान से कहा गया कि साल 2004-05 के दौरान कोई सीनियरटी लिस्ट नहीं बनाई गई है। दूसरी सुनवाई के दौरान आयोग को बताया गया कि पीआईओ के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जा रही है। जबकि सच्चाई यह थी कि विभागीय जांच को लटकाया जा रहा था। सुनवाई के बाद आश्चर्यजनक रुप से आयोग ने पीआईओ पर जुर्माना लगाने के लए पहली सुनवाई के दौरान जारी कारण बताओ नोटिस को निरस्त कर दिया।
लेकिन किस्सा यहीं खत्म नहीं होता। एसईसीएल ने रहमान के खिलाफ एक आरोप पत्र जारी कर दिया। आयोग के फैसले से असंतुष्ट रहमान ने 2007 में दिल्ली हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की। 28-04-2009 को हाई कोर्ट ने अपने फैसले में आयोग के उस आदेश को गैर कानूनी करार दिया जिसमें पीआईओ पर जुर्माना लगाने के लिए जारी कारण बताओ नोटिस को निरस्त कर दिया गया था। इसके अलावा कोर्ट ने पीआईओ पर 25 हज़ार रुपये का जुर्माना तो लगाया ही, साथ ही अदालती कार्यवाही के लिए याचिकाकर्ता को 50 हज़ार रुपये देने का आदेश भी एसईसीएल को दिया।

बुधवार, 10 जून 2009

फटी व्यवस्था की सिलाई करता एक टेलर मास्टर

एक वर्ष पहले तक मो. शमीम अंसारी महराजगंज जनपद के सिसवा बाजार में टेलर मास्टर के रूप मे जाने जाते थे क्योंकि वह कपड़ों की सिलाई का काम करते थे। लेकिन अब उन्हें प्रशासनिक हलकों में खलनायक और आम लोगों के बीच हीरो के तौर पर जाना जाता है। उन्होंने सूचना अधिकार कानून के जरिए अपने गांव रूदलापुर और आस-पास के क्षेत्रा में भ्रष्टाचार और सरकारी योजनाओं की गड़बड़ी के आध दर्जन मामलों का पर्दाफाश किया है। लेकिन इसकी उन्हें सजा भी मिल रही है। प्रशासन ने उनके खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी है और उन्हें अपनी आजीविका का काम छोड़ना पड़ा है। उन्हें अपना यह अनूठा अभियान बंद करने की निरन्तर धमकी मिल रही है।
मो. शमीम एक दिलचस्प व्यक्ति हैं। उनके पास कुछ वर्ष पहले तक उनको सिलने वाले कपड़ों की नाप और उसको डिलेवर करने की तारीख का हिसाब-किताब रखना पड़ता था लेकिन अब उनके झोले में फाइलों का अम्बार है। उनकी ख्याति अब टेलर मास्टर के रूप में नहीं बल्कि सूचना अधिकार आन्दोलन के एक जुझारू कार्यकर्ता के रूप में है। उन्हें सूचना अधिकार कानून के बारे में जानकारी अक्टूबर 07 में सर्वप्रथम लखनउ में कांग्रेस की एक बैठक में हुई। इसके बाद वह कांग्रेस पार्टी की सूचना अधिकार आन्दोलन से जुड़ गए। उन्होंने सबसे पहले अपने गांव रूदलापुर में राशन कार्ड को बनाने में गड़बड़ी की जांच के सम्बन्ध में पूर्व में की गयी एक शिकायत का उल्लेख करते हुए सूचना अधिकार कानून के तहत जानकारी मांगी। जानकारी न मिलने पर वह इस मामले को आयोग तक ले गए। तब उन्हें जानकारी दी गयी। गड़बड़ी की पुष्टि हुई और उन्होंने इसकी जांच कराने के लिए मामले को आगे बढ़ाया। इसके अलावा उन्होंने गांव में पेड़ों की नीलामी, खुद के राशन कार्ड के कम्प्यूटर में दर्ज न होने, गांव की सार्वजनिक भूमि पर अवैध कब्जे और गन्ना विकास विभाग के गोदामों पर अवैध कब्जे के मामले को सूचना अधिकार कानून के तहत मिली जानकारी के जरिए उजागर किया। गांव की सार्वजनिक जमीन पर कब्जे के मामले में उनकी मुहिम के चलते अवैध कब्जेधारियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ। गांव के पेड़ों की नीलामी के मामले में गड़बड़ी उजागर हुई और पता चला कि गांव के 21 पेड़ गायब हैं। लेकिन इनमें से सिर्फ पांच पेड़ कटने की बात स्वीकार की गयी है और उसकी नीलामी से मिले पैसे न तो तहसील में और न ग्राम पंचायत के खाते में जमा है।
इस खुलासे से गांव के आम लोग तो खुश हुए लेकिन ग्राम प्रधान पति और कुछ अधिकारी उनसे नाराज हो गए। उनके खिलाफ सूचना अधिकार कानून के आवेदन के जरिए अधिकारियों को परेशान करने के आरोप में बीडीओ सिसवा ने वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश पर कोठीभार थाने में एफआईआर दर्ज करा दिया। इस एफआईआर का आधार सूचना अधिकार कानून के एक आवेदन में तीन आवेदनकर्ताओं में से एक का इस तरह के आवेदन बताया गया। हालांकि इस आवेदनकर्ता ने बाद में एक नोटरी बयान हल्फी के जरिए आवेदन करने की बात स्वीकार कर ली।
एफआईआर के अलावा उन्हें कई तरह से परेशान किया गया। कई अधिकारियों ने उन्हें धमकी दी कि यदि उन्होंने अपनी मुहिम बंद नहीं की तो उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे। उनके खिलाफ ग्राम पंचायत की एक जमीन पर कब्जा करने का आरोप लगाकर कार्यवाही करने की कोशिश हुई। मो. शमीम प्रताड़ना की इन कोशिशों से परेशान तो जरूर हुए लेकिन निराश नहीं हैं। अब वह दर्जी का काम छोड़ चुके हैं और पूरी तरह से आरटीआई कार्यकर्ता के रूप में कार्य कर रहे हैं। मुम्बई में कमाने वाले बेटे द्वारा भेजे गए पैसे से वह अपना काम चला रहे हैं। लेकिन वह हारेंगे नहीं बल्कि अपना मुहिम जारी रखेंगे। अगली मुहिम के तहत उन्होंने पेड़ों की नीलामी में गड़बड़ी के खिलाफ न्यायालय के जरिए मुकदमा दर्ज कराने की कोशिश शुरू की है।

मंगलवार, 5 मई 2009

देश और समाज की समस्याओं के प्रति कितनी गंभीर है हमारी शिक्षा व्यवस्था?

मनीष सिसोदिया

देश भले ही भ्रष्टाचार और आतंकवाद की विकराल समस्याओं से जूझ रहा हो लेकिन देश की शिक्षा व्यवस्था यह ज़रूरी नहीं मानती कि आने वाली पीढ़ियों को इन दोनों समस्याओं के प्रति संवेदनशील बनाने में उसकी भी कोई भूमिका है। सूचना के अधिकार के तहत दाखिल आवेदनों के जवाब में शिक्षा व्यवस्था का भावी समाज के प्रति यह गैर ज़िम्मेदाराना रुख सामने आया है।
भारत सरकार का मानव संसाधन विकास मंत्रालय देश के लोगों के शिक्षित होने की दिशा और दशा तय करने का दावा करता है। करीब छह महीने पहले इस मंत्रालय से सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगी गई थी कि इन दोनों समस्याओं के प्रति लोगों को संवेदनशील बनाने के लिए और आतंकवाद तथा भ्रष्टाचार के खिलाफ जनमानस तैयार करने के मकसद से देश की शिक्षण संस्थाओं में विभिन्न स्तर पर पाठयक्रमों में क्या कुछ पाठ जोड़े गए हैं। मंत्रालय ने इन आवेदनों को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) तथा राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) को अग्रसित कर दिया। यूजीसी ने तो एक लाइन में लिखकर दे दिया कि उच्च शिक्षण संस्थानों के पाठ्यक्रम में उसकी कोई भूमिका नहीं है।
दूसरी तरफ एनसीईआरटी ने दोनों आवेदनों के जवाब में बताया है कि उसके पाठ्यक्रम में भ्रष्टाचार या आतंकवाद के बारे में कोई विशेष पाठ नहीं है। गौरतलब है कि एनसीईआरटी का नया पाठ्यक्रम 2005 में ही लागू हुआ है। इस नए पाठ्यक्रम में देश की दो सबसे बड़ी समस्याओं के प्रति आने वाली पीढ़ियों को संवेदनशील बनाने का कितना ध्यान रखा गया है यह खुद एनसीईआरटी के जवाब से देखा जा सकता है -

आतंकवाद
6 अक्टूबर 2008 को दाखिल सूचना अधिकार आवेदन का जवाब अपील/शिकायत आदि दाखिल करने और सूचना आयोग का कड़ा नोटिस मिलने के बाद दिया है।
जवाब में एनसीईआरटी ने लिखा है कि 2005 के पाठ्यक्रम के आधर पर तैयार पाठ्यपुस्तकों में आतंकवाद पर कोई विशेष पाठ हमारी पुस्तकों में नहीं है `....हालांकि इनमें भारत की अखंडता और विश्व शांति पर मंडराते खतरे के रूप में आतंकवाद को रेखांकित किया गया है। राजनीतिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तकों में राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विजुअल एलीमेंट्स के माध्यम से आतंकवाद की चर्चा की गई है।´
एनसीईआरटी का यह दावा सकून देने वाला हो सकता था लेकिन सूचना के अधिकार के इस आवेदन का जवाब देते हुए पाठ्यपुस्तकों के उन हिस्सों की फोटोकॉपी प्रदान की गई हैं जिन पाठों के आधर पर एनसीईआरटी ने उपरोक्त दावा किया है। एक नज़र जवाब के उस हिस्से पर भी।
• भारत की अखंड्ता को बनाए रखने और आने वाली पीढ़ियों को आतंकवाद के प्रति संजीदा करने की कोशिश में पढ़ाए जा रहे पाठों में एनसीईआरटी ने पहला पाठ कक्षा 11 की पुस्तक का उपलब्ध कराया है। यह पाठ (पृष्ठ संख्या ११६) संसद में कानून पास होने की प्रक्रिया के बारे में है और बताता है कि किस तरह कुछ कानून यथा लोक पाल बिल अभी अधर में लटका है, 2002 में आतंकवाद रोधी कानून 2002 राज्य सभा में खारिज हो गया था। यहां पर आतंकवाद शब्द को एनसीईआरटी ने पीले मार्कर पेन से रेखांकित कर दिया है।
• इसके अगले पृष्ठ में संचार माध्यमों के लाभ हानि पर बात करते हुए लिखा गया है कि एक तरफ सामाजिक कार्यकर्ता आदिवासी संस्कृति और जंगल जैसे मुद्दों पर दुनिया भर से संपर्क करने में इनका लाभ ले रहे हैं वही अपराधी और आतंकवादी भी इससे अपना नेटवर्क फैलाते हैं। (यह पृष्ठ आतंकवाद के बारे में नहीं बल्कि इंटरनेट के फायदे नुकसान के बारे में है)
• अगले पन्ने में अधिकारों की बात करते हुए ज़िक्र आता है कि क्या आतंकवाद से पीड़ित एक देश को किसी दूसरे देश के नागरिक अधिकारों का हनन करना चाहिए? यहां भी आतंक वाद शब्द आया है, शायद इसीलिए इस पृष्ठ की फोटोकापी सूचना के अधिकार के तहत उपलब्ध कराई गई है।
• इसके आगे के पन्ने में भी इंटरनेट के उपयोग पर चर्चा है जिसमें लिखा है कि इंटरनेट के विभिन्न पहलू हैं जिसमें एक तरफ संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाएं इसका इस्तेमाल बर्ड फ्लू जैसी बीमारियों के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए करती हैं वहीं आतंकवादी इसका इस्तेमाल अपना नेटवर्क बढ़ाने में करते हैं।
• इसके बाद शंति (पीस) पर एक पाठ है जिसकी पहली ही लाइन में आतंकवाद शब्द आया है इसलिए एनसीईआरटी ने अपने दावे में इसे भी शमिल कर लिया है। इस पाठ में दुनिया भर में अशांति के माहौल पर चर्चा हुई है जैसे कि रवांडा के हालात भारत पाकिस्तान के हालात आदि। यहां पर दुनिया में बढ़ते आतंकवाद के बारे में कुछ चर्चा है। इस पाठ में आगे आतंकवाद के खतरों पर चर्चा है, जिसमें वर्ल्ड ट्रेड सेंटर आदि हमलों का ज़िक्र है।

• इसी तरह कक्षा 12 की पुस्तकों में जहां जहां भी आतंकवाद शब्द ढूंढने से मिलता है उस उस पृष्ठ की फोटोकापी उपलब्ध करा दी गई है। इसमें भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर युद्ध और वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमले और भारत पाकिस्तान तनाव का ज़िक्र है।
• इसी पुस्तक के कुछ अन्य पृष्ठों की फोटोकॉपी भी उपलब्ध कराई गई है जिसमें मुख्यत: संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों और आतंकवाद को एक राजनैतिक हिंसा के रूप में परिभाषित किया गया है।

• हैरानी की बात है कि पुस्तक में जितनी चर्चा अमेरिका, विश्व सुरक्षा आदि पर खतरे को लेकर है उसके मुकाबले भारतीय संदर्भ में आतंकवाद को हल्के ढंग से पेश किया गया है। आतंकवाद के मूल को समझने, इसके बढ़ने के कारणों और भारतीय परिप्रेक्ष्य में संभावित समाधानों का तो ज़िक्र भी नहीं है।

• 12 वीं की पुस्तक में ही आगे सुरक्षा नीतियों की समीक्षा की गई है। इसकी भी फोटोकॉपी उपलब्ध कराई गई है।

गौरतलब है कि यह सब फोटोकॉपी यह कहते हुए दी गई हैं कि आने वाली पीढ़ियों को आतंकवाद के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए शिक्षा व्यवस्था क्या पढ़ा रही है? कितनी ज़िम्मेदारी निभा रही है? सूचना के अधिकार के तहत आवेदन में यही जानकारी मांगी गई थी।


भ्रष्टाचार
इसी प्रकार सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगते हुए एक आवेदन यह भी डाला गया था कि आने वाली पीढ़ियों को भ्रष्टाचार के प्रति जागरूक करने के लिए शिक्षा व्यवस्था क्या ज़िम्मेदारी निभा रही है? पाठ्यक्रम में क्या सामग्री इस आशय के साथ जोड़ी गई है। यह आवेदन 16 अक्टूबर को डाला गया था। इसका जवाब भी इधर -उधर घूमते हुए सूचना आयोग के नोटिस के बाद एनसीईआरटी से प्राप्त हुआ। यहां भी यही कहानी है। कक्षा 9 से कक्षा 12 तक की पुस्तकों के कुछ अध्यायों की सूची। उसके बाद उनकी फोटोकॉपी।
• फोटोकॉपी सेट के पहले ही पन्ने पर एक जगह `करप्ट´ शब्द आया है। पूरा वाक्य इस प्रकार है, `....... इन जांचों से पता चला है कि पिनोशे (चिली का पूर्व तानाशाह) न सिर्फ क्रूर था बल्कि भ्रष्ट भी था..... प्रदान की गई फोटोकापी में करप्ट (भ्रष्ट) शब्द को रेखांकित किया गया है। चिली में लोकतंत्र पर एक पैराग्राफ में आया एक वाक्य `पिनोशे एक भ्रष्ट शासक था।´ सिर्फ यह वाक्य किस प्रकार बच्चों को भ्रष्टाचार के प्रति संवेदनशील बनाता है और कैसे इसे पढ़कर बच्चों के मन में यह भावना जागेगी कि भ्रष्टाचार एक गलत बात है और उसे बड़ा होकर भ्रष्ट नहीं बनना चाहिए.... क्या एनसीईआरटी को इस बात का जवाब नहीं देना चाहिए?
• इसी के अगले पृष्ठ पर पोलैंड के लोकतंत्र पर चर्चा के दौरान भ्रष्टाचार शब्द आया है। (सरकार में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन ने शासकों के लिए मुश्किल खड़ी कर दी) यहां भी पूरे पृष्ठ पर इस एक अकेले शब्द को हरे पेन से रेखांकित कर दिया है।
• इसके अगले पन्ने पर लोकतंत्र पर एक क्लास में चर्चा के दौरान एक चार जगह भ्रष्टाचार शब्द आया है। उसे भी उपरोक्त प्रकार से रेखांकित किया गया है।
• इसी तरह अगले पन्ने पर लोकतंत्र पर सवाल उठाते हुए फ़िर एकबार भ्रष्टाचार शब्द आता है जिसे रेखांकित कर उसकी फोटोकापी प्रदान कराई गई है।
• इसी तरह एक पृष्ठ पर वाक्य आया है कि सेना देश का सबसे अनुशासित और भ्रष्टाचार मुक्त विभाग है। इस पृष्ठ को भी उपरोक्त सवालों के जवाब में सूचना देते हुए उपलब्ध करवाया गया है।
• अगले पन्ने पर नागरिक समूह बनाने पर चर्चा है जिसमें एक वाक्य आता है कि नागरिक, प्रदूषण और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर अभियान चलाने के लिए भी समूह बना सकते हैं।

यहां सवाल सिर्फ सूचना के अधिकार का नहीं है। सूचना तो प्रदान कर ही दी गई है, भले ही अपील और आयोग के नोटिस के बाद मिली हो। सवाल है कि देश को चलाने के लिए अरबों रुपए खर्च कर चल रही शिक्षा व्यवस्था किस प्रकार कल के नागरिक तैयार कर रही है। क्या यह कहने से कि पिनोशे एक भ्रष्ट आदमी था। हम बच्चों को भ्रष्टाचार के खतरे के प्रति संवेदनशील बनाते हुए यह उम्मीद कर सकते हैं कि इसे पढ़ने वाला बच्चा जब नागरिक बनकर आगे आएगा तो वह भ्रष्ट नहीं बनेगा, रिश्वत नहीं लेगा देगा। जिस देश की व्यवस्था को भ्रष्टाचार का घुन लगा हो उस देश की शिक्षा व्यवस्था यह कहकर अपनी पीठ ठोक रही है कि हमारे पाठ्यक्रम में नैतिकता के महत्व पर ज़रूर दिया गया है। वह भी उपरोक्त अध्यायों के दम पर!
यही स्थिति आतंकवाद के मामले में है। देश पिछले कई दशक से आतंकवाद से जूझ रहा है। हमारा रक्षा-सुरक्षा बजट बढ़ रहा है। हम हथियारों के बड़े खरीददार बनते जा रहे हैं। सुरक्षा के कड़े से कड़े नियम बना रहे हैं लेकिन फ़िर भी यह समस्या बढ़ी ही है। अभी तो नामी गिरामी शिक्षा संस्थानों से निकले युवाओं को भी आतंकवाद ने अपनी गिरफ्त में ले लिया है। लेकिन शिक्षा व्यवस्था में लगे लोग उपरोक्त पाठ्यक्रम के बल पर अपनी पीठ थपथपाने में लगे हैं।
देश को आगे ले जाने वाल शिक्षा कैसी होगी इसकी ज़िम्मेदारी हमने शिक्षा व्यवस्था को दी है। और खुद एनसीईआरटी के जवाब से तथा उसके जवाब से उभरे तथ्यों से सवाल यह उभरता है कि क्या यह ज़िम्मेदारी ठीक से निभाई जा रही है? समाज में बढ़ती समस्याएं, बढ़ता आतंकवाद और भ्रष्टाचार तो कम से कम इसका जवाब नहीं में दे रहा है।

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009

अदालत, आयोग और उत्तरपुस्तिका

भागीरथ
देश के करोड़ों छात्रों का भविष्य परीक्षा में प्राप्त होने वाले अंकों पर निर्भर करता है। ऐसे में कई छात्रों की शिकायत होती है कि उन्हें उम्मीद से कम अंक मिले हैं। कई बार ये शिकायत वाजिब भी होती है। लेकिन परीक्षा लेने वाली संस्थाएं किसी भी कीमत पर उत्तरपुस्तिका को सार्वजनिक नहीं करना चाहती। लेकिन सूचना अधिकार कानून लागू होने के बाद परिस्थितियां कुछ-कुछ बदली हैं। केन्द्रीय सूचना आयोग, कई राज्य सूचना आयोग और उच्च न्यायालय ने इस ऐसे मामलों में छात्रहित में फैसला सुनाया है और परीक्षा लेने वाली संस्थाओं को उत्तरपुस्तिका छात्र को मुहैया कराने के आदेश दिए हैं। यहाँ छात्रहित से जुडे़ कुछ ऐसे ही मामलों का उल्लेख किया जा रहा है ताकि आम आदमी और खासकर छात्र वर्ग इससे लाभ उठा सके।

कलकत्ता उच्च न्यायालय:
कलकत्ता उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कलकत्ता विश्वविद्यालय को सूचना के अधिकार के जरिए आवेदक प्रीतम रूज को उत्तर पुस्तिका दिखाने का आदेश दिया है। विश्वविद्यालय के प्रेजीडेंसी कॉलेज मे पढ़ने वाले प्रीतम के एक पेपर में 28 अंक आए थे। कॉलेज द्वारा छात्र के कहने पर समीक्षा की गई तो 32 अंक हासिल हो गए। पेपर में क्या गड़बड़ी हुई, यही जानने के लिए छात्र ने आरटीआई के जरिए उत्तर पुस्तिका दिखाने की मांग की थी। उत्तर पुस्तिका दिखाना विश्वविद्यालय के नियमों में नहीं है इस आधार पर विश्वविद्यालय ने उत्तर पुस्तिका दिखाने की मांग खारिज कर दी। आवेदक ने सूचना आयोग में जाने के बजाय सीधे उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की, जहां जस्टिस संजीव बनर्जी की एकल बैंच ने आवेदक के पक्ष में फैसला सुनाया। विश्वविद्यालय को इससे तसल्ली नहीं हुई और उसने एकल बैंच के इस फैसले को चुनौती दी थी।
कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एस एस निज्जर और दीपांकर दत्ता की खंडपीठ ने एकल बैंच के पूर्ववर्ती फैसले को बरकरार रखते हुए विश्वविद्यालय, सीबीएसई और अन्य परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसिओं को कानून के दायरे में बताया है। न्यायालय ने कहा कि भारतीय संविधान की धारा 19 के अनुसार अभ्यर्थियों को उत्तर पुस्तिका हासिल करने का अधिकार है। निरीक्षण न करने देने से अभिव्यक्ति और सूचना के सांवैधनिक अधिकार को कोई मतलब नहीं रह जाएगा।

केन्द्रीय सूचना आयोग:
केस संख्या 1- केन्द्रीय सूचना आयोग ने एक अपील की सुनवाई की बाद पोंडिचेरी विश्वविद्यालय को आवेदक अजय कुमार साहू को न केवल उत्तर पुस्तिका दिखाने बल्कि उनकी छायाप्रति उपलब्ध कराने के आदेश भी दिए। उत्तरपुस्तिका न दिखाने के लिए अपीलीय अधिकारी ने दलील दी थी कि विश्वविद्यालय में उत्तरपुस्तिका दिखाने का कोई नियम या प्रावधन नहीं है और इस तरह की सूचना कानून की धारा 8(१)(ई) और (जे) के तहत आच्छादित है। आयोग ने सुनवाई में इन दलीलों को निराधर पाया और लोक सूचना अधिकारी को चेतावनी दी कि वह इस धारा का गलत इस्तेमाल न करे।

केस 2- सीआईसी ने मुकेश कुमार के नरेश बनाम सीबीएसई के निर्णय में सीबीएसई को उत्तरपुस्तिका दिखाने के आदेश दिए। आवेदक मुकेश कुमार ने अपने पुत्र रवि नरेश की उत्तरपुस्तिका दिखाने की मांग की थी जिसे सीबीएसई ने कानून की धरा 8 (१)(ई) का सहारा लेकर ठुकरा दिया था। मुकेश कुमार ने दलील दी की उनका पुत्र एक मेधावी छात्र है और उसने अनेक प्रतियोगी परीक्षाएं पास की हैं। उन्होंने अपने पुत्र के 90 प्रतिशत अंक प्राप्त होने की उम्मीद जताई थी। परीक्षा में कम अंक प्राप्त होने की वजह वह उत्तरपुस्तिका देखकर जानना चाहते थे। आवेदक की दलीलों से सहमत होते और पारदर्शिता का ख्याल रखते हुए आयोग ने सीबीएसई को उत्तरपुस्तिका दिखाने का आदेश दिया।

केस 3- दिल्ली के प्रमोद सरीन ने दिल्ली इंजीनियरिंग कॉलेज से 27 मई 2007 को आयोजित किए गए संयुक्त प्रवेश परीक्षा की टेस्ट बुकलेट, उत्तर और ओएमआर की प्रतियां मांगी, जिसे विश्वविद्यालय की बौद्धिक संपदा मानते हुए देने से मना कर दिया गया। साथ ही दलील दी कि इससे अन्य प्रतियोगी छात्रों पर भी बुरा असर पडे़गा। आयोग ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि वस्तुनिष्ठ प्रश्न तैयार करना कोई ऐसी कला नहीं है जिसे बौद्धिक संपदा माना जाए। आयोग ने विश्वविद्यालय की इस दलील को भी खारिज कर दिया है कि ओएमआर प्रति सार्वजनिक करने से भविष्य में अन्य विवाद और अदालती मामलों की संख्या बढ़ सकती है। इस संबंध में आयोग का मानना था कि भविष्य में आने वाली समस्याओं को आधार मानकर अपना फैसला नहीं दे सकती।

बिहार सूचना आयोग:
एलएन मिथिला विश्वविद्यालय के बी. कॉम प्रथम वर्ष के छात्र मुरारी कुमार झा ने अपनी उत्तरपुस्तिका निरीक्षण की मांग की लेकिन विश्वविद्यालय ने कानून की धरा 8(१)(ई) यानि वैश्वासिक रिश्ते की आड़ लेकर इसकी इजाजत नहीं दी। विश्वविद्यालय ने दलील दी कि परीक्षक और परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था के बीच एक वैश्वासिक रिश्ता होता है। उत्तरपुस्तिका निरीक्षण की अनुमति देने से यह इस रिश्ते पर विपरीत असर पडे़गा, इसलिए निरीक्षण की अनुमति नहीं दी जा सकती। आयोग को इन दलीलों में कोई दम नजर नहीं आया। आयोग का मानना था कि जो रिश्ता विश्वविद्यालय और छात्र के बीच होता है वह विश्वविद्यालय और परीक्षक के बीच रिश्ते से अधिक मजबूत और महत्व पूर्ण होता है, इसलिए इसकी आड़ में निरीक्षण या उत्तरपुस्तिका दिखाने से मना नहीं किया जा सकता।

त्रिपुरा सूचना आयोग:
अगरतला की सोमाश्री चौधरी बनाम त्रिपुरा माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के मामले में त्रिपुरा राज्य सूचना आयोग ने बोर्ड को उत्तरपुस्तिका दिखाने के आदेश दिए हैं। सोमाश्री चौधरी ने 2007 की परीक्षा में कम अंक आने पर बोर्ड से बंगाली, गणित और जीवविज्ञान की उत्तरपुस्तिका दिखाने की मांग की थी। उत्तरपुस्तिका न दिखाने के लिए बोर्ड ने दलील दी थी कि इससे परीक्षक की सुरक्षा को खतरा उत्पन्न हो सकता है। इसके अलावा बोर्ड ने उत्तरपुस्तिका न दिखाने के पक्ष में उच्चतम न्यायालय, कलकत्ता उच्च न्यायालय और केन्द्रीय सूचना आयोग का भी हवाला दिया था लेकिन राज्य सूचना आयोग ने इन दलीलों को खारिज कर दिया और साथ की बोर्ड के लोक सूचना अधिकारी पर जुर्माना भी लगाया।

पश्चिम बंगाल सूचना आयोग
पश्चिम बंगाल सूचना आयोग ने कलकत्ता के सुजोय दास गुप्ता बनाम बर्धवान विश्वविद्यालय के मामले में उत्तरपुस्तिका आवेदक को उपलब्ध कराने के आदेश दिए हैं। एम ए राजनीति विज्ञान के एक पेपर (इंटरनेशनल लॉ) में सुजोय के 56 अंक आए थे जो समीक्षा कराने पर 47 हो गए। सुजोय दास गुप्ता इसी पेपर का निरीक्षण करना चाहते थे। लेकिन विश्वविद्यालय ने इसे निजी सूचना और व्यापक जनहित से सम्बंधित न होने और नियमों में ऐसा न होने की दलील देकर आवेदक को निरीक्षण करने की अनुमति नहीं दी। आयोग ने इन दलीलों को नहीं माना और कहा कि विश्वविद्यालय प्राधिकरण को अधिक से अधिक सूचना प्रदान करने की मानसिकता विकसित करनी चाहिए। साथ ही कहा कि विश्वविद्यालय को उत्तरपुस्तिका दिखाने का पूर्ण तंत्र विकसित करना चाहिए। और सुजोय दास गुप्ता को उत्तरपुस्तिका उपलब्ध करानी चाहिए।

उपरोक्त राज्य सूचना आयोगों और कलकत्ता हाईकोर्ट के निर्णय के अलावा गुजरात और छत्तीसगढ़ सूचना आयोग ने भी ऐसे निर्णय दिए हैं। हालांकि कुछ फैसलों के खिलाफ उच्च न्यायालयों में अपील की गई है। प्रतियोगी परीक्षाओं में भी आयोगों और उच्च न्यायालयों का उत्तरपुस्तिका को सार्वजनिक करने को लेकर सकारात्मक रूख रहा है। पहले केन्द्रीय सूचना आयोग और फ़िर दिल्ली उच्च न्यायालय ने यूपीएससी का उत्तरपुस्तिका दिखाने का ऐसा ही आदेश दिया है। हालांकि यह मामला फिलहाल उच्चतम न्यायालय में लंबित है। इसी तरह पटना उच्च न्यायालय भी एक फैसले में बिहार लोक सेवा आयोग को अभ्यर्थियों के प्राप्तांकों को सार्वजनिक करने के आदेश दिए हैं।
उधर छत्तीसगढ़ में राज्य सिविल सेवा परीक्षा में जबरदस्त धांधली का खुलासा भी सूचना के अधिकार की बदौलत ही हुआ था। इस मामले में राज्य लोक सेवा आयोग तात्कालीन चेयरमैन के खिलाफ मामला भी चल रहा है।

सवाल ये है कि विश्वविद्यालय को उत्तर पुस्तिका दिखाने में ऐतराज क्यों है? दरअसल विश्वविद्यालय को लगता ही नहीं है कि परीक्षा जांच में उनसे कोई गड़बड़ी हो सकती है। यह अलग बात है कि अनेक बार विश्वविद्यालय इस मामले में पहले ही कठघरे में खडे़ हो चुके हैं। दूसरा, उन्हें लगता है, ऐसा होने पर उनके कामकाज पर अनावश्यक भार पड़ जाएगा और पूरा परीक्षा तंत्र ढह जाएगा क्योंकि अगर एक बार उत्तर पुस्तिका दिखा दी तो उत्तर पुस्तिका देखने वाले छात्रों की बाढ़ आ जाएगी। विश्वविद्यालय की इन दलीलों से शायद ही कोई जवाबदेही और पारदर्शिता की उम्मीदें करने वाला सहमत होगा।
सवाल ये भी है कि क्या विश्वविद्यालयों और परीक्षा बोर्डों को गोपनीयता के नाम पर छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ करने खुली छूट दी जा सकती है? क्या छात्र को यह जानने का अधिकार नहीं है कि उत्तर पुस्तिका देखकर वह अपनी कमियां दूर कर सके ताकि आगामी परीक्षाओं में उन्हें न दोहराया जाए?

सच हुए सपने

सुंदर नगरी का मोहन अब अर्वाचीन पब्लिक स्कूल में पढ़ता है और कांगो प्रतियोगिता में कांस्य पदक जीतता है। दूसरी और दिलशाद पब्लिक स्कूल में पढ़ने वाले साजन और चैंपियन अपनी कक्षा में अव्वल आते हैं। ऐसे बच्चों की फेहरिस्त काफी लंबी है। पहले इन्हीं बच्चों को दाखिला देने से बचने के लिए पब्लिक स्कूलों का तर्क होता था कि ऐसे बच्चे स्कूल का माहौल खराब कर देंगे क्योंकि ये अपराधिक पृष्ठभूमि से आते हैं, गंदे माहौल में रहते हैं। लेकिन अब स्कूल प्रशासन भी इन बच्चों की लगन और काबिलियत देखकर चकित है। और यह कमाल हुआ है सूचना के अधिकार कानून की बदौलत। झुग्गी झोपड़ियों और पुनर्वास बस्तियों में रहने वाले हजारों बच्चों के सपने इस कानून ने न केवल पूरे किए हैं बल्कि उन्हें इससे एक नई ताकत भी मिली है।

इस चमत्कार को समझने के लिए थोड़ा पृष्ठभूमि में जाना होगा। दरअसल, डीडीए और भूमि और विकास कार्यालय ने दिल्ली के 361 स्कूलों को निशुल्क और सस्ती दर पर जमीन इस शर्त पर दी थी कि वे 25 प्रतिशत तक सीटें आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों को देंगे। इस शर्त की भनक किसी को नहीं लगी और न ही स्कूलों ने इसे अमल में लाने में कोई दिलचस्पी दिखाई। थोड़े बहुत लोगों को इसकी जानकारी तब मिली जब अधिवक्ता अशोक अग्रवाल ने इस संबंध में हाईकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की और हाईकोर्ट ने शिक्षा निदेशालय को इसे कढ़ाई से लागू कराने का आदेश दिया। हाईकोर्ट के आदेश के बाद शिक्षा निदेशालय को इस संबंध में दिशा निर्देंश तय करने के लिए मजबूर होना पड़ा। हालांकि बाद में हाईकोर्ट ने इस कोटे को पचीस प्रतिशत से घटाकर बीस प्रतिशत कर दिया लेकिन एक अच्छी आत यह रही कि सभी मान्यताप्राप्त स्कूलों को इसके दायरे में ला दिया। 2008 में हाईकोर्ट ने एक अंतरिम आदेश में सभी स्कूलों को कम से कम 15 प्रतिशत दाखिले गरीब परिवार के बच्चों के लिए अनिवार्य कर दिया।
डीडीए द्वारा स्कूल को सस्ती जमीन दिए जाने की शर्तों और हाईकोर्ट के आदेश को जानने के बाद लोगों ने स्कूल में अपने बच्चों को दाखिला दिलाने की कोशिशें शुरू कीं लेकिन अधिकांश स्कूलों ने इस सबके बावजूद बच्चों को दाखिला नहीं दिया। इसके बाद लोगों ने बड़ी संख्या में उप शिक्षा निदेशक के पास इन स्कूलों की शिकायत की और कुछ ही दिनों बाद उप शिक्षा निदेशक द्वारा शिकायत पर की गई कार्रवाई की जानकारी सूचना के अधिकार के तहत मांगी। इन आवेदनों ने उप शिक्षा निदेशक पर इतना दबाव बना दिया कि उन्हें ऐसे बच्चों के दाखिले सुनिश्चित कराने को मजबूर होना पड़ा। लेकिन इसके लिए बहुत बार लोगों को उप शिक्षा निदेशक के यहां आरटीआई आवेदन जमा कराने में भी कई तरह की दिक्कतों का सामना पड़ा और दर्जनों मामलों में अपील भी करनी पड़ी।

इन तमाम दिक्कतों के बावजूद बच्चों के दाखिले हुए हैं। हालांकि कई गैर सरकारी संस्थाओं ने भी इसमें अहम भूमिका निभाई है। `आई एस एस टी ´ संस्था की अमिता जोशी बताती हैं कि मयूर, अहलकोन सहित अनेक पब्लिक स्कूलों ने पहले फ्रीशिप कोटे के तहत दाखिले के फार्म देने से ही मना कर दिया। आरटीआई आवेदनों का भी उप शिक्षा निदेशक के यहां से कोई जवाब नहीं मिला लेकिन अपील करते ही शिक्षा विभाग में खलबली मच गई। मयूर पब्लिक स्कूल ने शिक्षा निदेशालय कें आदेश के बाद दाखिले के लिए झुग्गियों में फार्म भिजवा दिए। इसके बाद 9 बच्चों का दाखिला हुआ।

और सफलता का यह सिलसिला आज भी जारी है। ग्रीन फील्ड, नूतन विद्या मंदिर, हंसराज, फ्लोर डेल, ग्रीनवे, सिद्धार्थ इंटरनेशनल, अर्वाचीन, मयूर, बालभवन, मदर टेरेसा, प्रीत, यूनिवर्सल, विवेकानंद, नेशनल विक्टर आदि पब्लिक स्कूलों में दाखिले हुए हैं और अब भी हो रहे हैं। इस संबंध में हाईकोर्ट में याचिका डालने वाले अधिवक्ता अशोक अग्रवाल का कहना है कि साल 2008 में पब्लिक स्कूलों में 10 हजार गरीब बच्चों के दाखिल हुए हैं। उनका कहना है कि इस कोटे के तहत हर साल 40 हजार बच्चों का पब्लिक स्कूल में दाखिला हो सकता है। लेकिन लोगों में जागरूकता की कमी के चलते ऐसी सीटें नहीं भर पा रही हैं।

सीमा पुरी के रहने वाले आरटीआई कार्यकर्ता रामआसरे बताते हैं कि यदि सूचना का अधिकार नहीं होता तो दिल्ली के हजारों गरीब बच्चों के दाखिले नहीं हो पाते। रामआसरे स्वयं एक पुनर्वास बस्ती में रहते हैं और उनके बच्चे हंसराज पब्लिक स्कूल में पढ़ते हैं। पिछले साल उनके बच्चे यश ने अपनी कक्षा में चौथा स्थान हासिल किया था। उनका कहना है कि गरीब परिवारों के बच्चों किसी मायने में अमीरों के बच्चों से कमतर नहीं हैं। यदि मौका मिले तो झुग्गी झोपड़ियों में रहने वाले बच्चे भी अच्छा कर सकते हैं और दिल्ली के अनेक बच्चों ने इसे साबित करके दिखाया भी है।
(अपना पन्ना के अप्रैल अंक में प्रकाशित)

छोटी उमर के बुलंद हौसले

दिल्ली के पब्लिक स्कूलों में गरीब-गुरबत बच्चों का दाखिला टेढ़ी खीर है लेकिन सरकारी स्कूल भी इस मामले में कुछ कम नहीं हैं। दिल्ली सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के तहत छात्रों को मिलने वाली छात्रवृत्तियां भी कई बार जरूरतमंदों तक पहुंचने से पहले या तो दम तोड़ देती हैं। लेकिन इन्हीं सरकारी स्कूलों की लड़कियों ने सूचना कानून का इस्तेमाल कर भ्रष्ट शिक्षा व्यवस्था की कुम्भकर्णी नींद को तोड़ने का काम किया है। पेश है अपना पन्ना की एक रिपोर्ट:-

बंटी छात्रवृति
दिल्ली के कल्याणपुरी राजकीय उच्चतर माध्यमिक कन्या विद्यालय के बच्चों की छात्रवृत्तियों की रकम स्कूल प्रशासन हड़पने के फिराक में था। लेकिन स्कूल की ही छात्रा सुनीता ने सूचना के अधिकार का सहारा लेकर स्कूल प्रशासन के इरादों पर पानी फेर दिया। सुनीता ने न केवल अपनी बल्कि स्कूल की सभी छात्राओं को छात्रावृत्ति दिलाकर ही चैन की सांस ली।
मामला कुछ इस तरह है। स्कूल की तमाम छात्राओं के परिजनों से हस्ताक्षर करवा लेने के चार महीने बाद भी छात्रवृत्तियां आबंटित नहीं की गई थीं। सुनीता ने सूचना के अधिकार के जरिए अधिकारियों से जवाब तलब किया। आवेदन ने असर दिखाया और दो दिन बाद ही अधिकारी स्कूल में इस संबंध में जांच करने आए। इस बीच प्रिंसिपल ने छात्राओं को नाम काटने की धमकी देते हुए कहा कि वह अधिकारियों के सामने छात्रवृत्ति मिलने की बात कहें। अधिकारियों ने जब छात्राओं से इस बारे में पूछा तो उन्होंने अपनी प्रिंसिपल के कहे अनुसार जवाब दिए लेकिन सुनीता ने ऐसा नहीं किया। अधिकारियों के सामने उसने बेबाकी से प्रिंसिपल की शिकायत की और उसका काला चिट्ठा अधिकारियों के सामने रख दिया। सुनीता को इस तरह बोलते देख बाकी छात्राओं में भी उत्साह जगा और उन्होंने भी सब कुछ साफ-साफ बता दिया। इसके कुछ दिनों बाद स्कूल की सभी छात्राओं को छात्रवृत्तियां वितरित कर दी गई।

अफरीदा ने पाया दाखिला
आजमगढ़ से पढ़ाई के सपने संजोकर दिल्ली आई अफरीदा बानो के सपने उस वक्त बिखरने लगे जब कोंडली के दो और दल्लूपुरा के एक स्कूल ने उसे दाखिला देने से मना कर दिया। नौंवी कक्षा में दाखिले के लिए उसने अपने पिता सनीफ अहमद के साथ अनेक चक्कर काटे लेकिन स्कूल ने जैसे दाखिला न देने की कसम खा ली थी। उप शिक्षा अधिकारी को दाखिले के लिए प्रार्थना पत्र भेजा और वहां से स्कूल को दाखिला करने के निर्देश मिले। लेकिन स्कूल ने इस बार भी यह कहकर दाखिला देने से मना कर दिया कि कोई सीट खाली नहीं है। तब जाकर सनीफ ने सूचना के अधिकार का सहारा लिया। उपशिक्षा निदेशक कार्यालय आवेदन दाखिल कर उन्होंने निम्न प्रश्न पूछे-
-मेरी शिकायत की डेली प्रोग्रेस रिपोर्ट बताएं और यह किस अधिकारी के पास है, उसका नाम पद और फोन नंबर बताएं
-मेरी बेटी का एडमिशन कब तक हो पाएगा, तारीख बताएं
-शिक्षा अधिकारी द्वारा निर्देश दिए जाने के बावजूद प्रधानाचार्य ने प्रवेश देने से इंकार कर
दिया। क्या यह शिक्षा सम्बन्धी कानून का खुला उल्लंघन नहीं है?
-कृपया यह बताएं कि शिकायत में उल्लखित तीनों सरकारी विद्यालयों में कक्षा नवीं के लिए कितने सेक्शन हैं तथा प्रति सेक्शन कितने बच्चों को प्रवेश दिया गया है, कृपया प्रवेश रजिस्टर की कॉपी दें।
आवेदन में पूछे गए सवालों का असर ये हुआ कि उपशिक्षा निदेशक कार्यालय हरकत में आया है और अफरीदा बानो का शीघ्र दाखिला हो गया। यह दाखिला आध सत्र बीत जाने के बाद यानि अक्टूबर माह में किया गया।

यूजीसी का आदेश: पर्यावरण शिक्षा अनिवार्य

गिरीश चन्द्र करगेती
पर्यावरण संरक्षण का कार्य विभिन्न व्यक्तियों और संस्थाओं द्वारा लंबे समय से किया जा रहा है लेकिन अब तक सफलता नहीं मिली है। इसी क्रम में वरिष्ठ अधिवक्ता एवं पर्यावरणविद एम सी मेहता ने भारत के समस्त विद्यालयों, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय एवं अन्य शिक्षण संस्थानों में पर्यावरण का अनिवार्य पाठ्यक्रम लागू करने के लिए एक याचिका (संख्या 860/१९९१) उच्चतम न्यायालय में दाखिल की ताकि बचपन से ही विद्यार्थियों के मन में पर्यावरण संरक्षण की सोच विकसित हो सके। उच्चतम न्यायालय ने 18 दिसंबर 2003 में इस याचिका पर ऐतिहासिक निर्णय सुनाया जिसके अन्तर्गत एआईसीटीई, एनसीईआरटी, यूजीसी को पर्यावरण का अनिवार्य पेपर 2004-05 सत्र से लागू करने का आदेश दिया और पालन न करने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की बात कही। उच्चतम न्यायालय के पूर्ण आदेश मिलने से पहले ही विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने उच्चतम न्यायालय के अंतरिम आदेश का पालन करते हुए भारत के समस्त विश्वविद्यालयों और संस्थानों को सिक्स मंथ मोड्यूल सिलेबस पफॉर इनवायरमेंट स्टडीज इन अंडरग्रेजुएट्स कोर्सेस में लागू करने का आदेश अपने पत्र डी ओ संख्या एफ13-1/2000 (एफए /ईएनयू/सीओएस-एफ) 23 जुलाई 2003 को प्रेषित किया और पत्र में वर्तमान सत्र में पेपर लागू करने का आदेश भी दिया।
लेकिन सूचना के अधिकार का इस्तेमाल करने पर ये पता चला कि अब तक मात्र 94 विश्वविद्यालय और संस्थानों में ही यह पेपर लागू हुआ था। अप्रैल 2007 में जानकारी मांगी गई थी कि कितने विश्वविद्यालयों और संस्थानों ने छह माह का अनिवार्य पेपर लागू किया है। मई 2007 में यूजीसी ने उत्तर दिया कि भारत में 94 विश्वविद्यालयों और संस्थानों ने उच्चतम न्यायालय के आदेश का पालन करते हुए अनिवार्य पर्यावरण का पेपर लागू किया और 268 विश्वविद्यालयों एवं संस्थानों ने 2007 तक इसे लागू नहीं किया। पेपर लागू न करने पर कार्रवाई के बारे में पूछने पर यूजीसी ने समस्त संस्थानों को जुलाई 2003 का पत्र अनुस्मारक के रूप में प्रेषित किया ताकि तुरंत पेपर लागू किया जा सके।

इस क्रम को आगे बढ़ाते हुए जुलाई 2007 में पुन: आरटीआई आवेदन डालकर पेपर लागू न करने वाले संस्थानों के विरुद्ध की गई कार्रवाई की स्थिति जाननी चाही। यूजीसी ने जवाब दिया कि पुन: अनुस्मारक भेजा गया है और उच्चतम न्यायालय की अवमानना तथा सख्त कार्रवाई की स्थिति के संदर्भ में उन्होंने लिखा कि आयोग अपने वकील से संपर्क बना रहा है। कुछ समय बाद मई 2008 को यूजीसी के वकील के पत्र की प्रति और अप्रैल 2008 तक कितने संस्थानों ने पेपर लागू किया है, की सूचना मांगी गई। जवाब में यूजीसी के वकील अमितेश कुमार के पत्र की प्रति और कुछ विश्वविद्यालय और संस्थानों की सूची दी गई जिन्होंने पेपर लागू कर दिया था। वकील के पत्र में संयुक्त सचिव को सुझाव दिया गया था कि जो संस्थान आदेश नहीं मान रहे हैं उनका अनुदान रोक लिया जाए। और इस संदर्भ में मेमो भी जारी करे। इसके बाद यूजीसी ने भारत के समस्त संस्थानों को अंतिम मेमो भेजा और स्पष्ट किया कि पर्यावरण का पेपर लागू न करने की स्थिति में वार्षिक अनुदान रोक लिया जाएगा।
जाहिर है यह आरटीआई का ही कमाल था कि यूजीसी को इस मामले पर रूख अपनाना पड़ा। और इसका नतीजा ये निकला कि अब देश के सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में छात्रों को पर्यावरण का पाठ पढ़ाया जाएगा।

(अपना पन्ना के अप्रैल अंक में प्रकाशित)