गुरुवार, 10 जुलाई 2008

सामाजिक न्याय एवं आधिकारिता मंत्रालय पर लगा क्षतिपूर्ति जुर्माना

केन्द्रीय सूचना आयोग ने एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई के बाद निर्णय दिया कि सामाजिक न्याय और आधिकारिता मंत्रालय एक आरटीआई आवेदक दस हजार रूपये क्षतिपूर्ति के रूप में दे। आयोग ने यह क्षतिपूर्ति जुर्माना आवेदक एफ सी थोमस द्वारा मांगी गई सूचनाओं से संबंधित फाइल न ढूंढने पर लगाया है।
आयोग ने मंत्रालय को लापरवाही बरतने का दोषी पाया और जवाबदेयता में कमी के लिए मंत्रालय की खिंचाई की। साथ ही मंत्रालय की उस अपील को खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि आवेदक द्वारा मांगी गई सूचनाएं 1952 से संबंधित हैं जिनकी फाइलों को नहीं ढूंढा जा सकता।
इस पर सूचना आयुक्त एम एम अंसारी ने कहा कि यदि ऐसे स्पष्टीकरण मान लिये जाएं तो सामान्य नागरिक को लोक प्राधिकरण से सूचना मांगने का अधिकार कैसे हासिल होगा। उन्होंने कहा कि ऐसे में तो सभी केन्द्रीय जन सूचना अधिकारी सरकारी विभागों से संबधित सूचना देने से मना कर देंगे और कानून मजाक बनकर रह जाएगा।

बुधवार, 9 जुलाई 2008

बोम्बे स्टॉक एक्सेंज ने किया सेबी का नियमों का उल्लंघन ?

बोम्बे स्टॉक एक्सेंज ने करीब एक हजार कंपनियों को गैर कानूनी तरीके से डिलिस्टींग कर दिया है। एक्सेंज पर यह आरोप कई इन्वेस्टर संगठनों ने लगाया है। आरोप के अनुसार बोम्बे स्टॉक एक्सेंज ने कंपनियों के डिलिस्टींग में बाज़ार नियामक संस्था ``भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी के निमयावली का उल्लंधन किया है। यह आरोप इन्वेस्टर एजूकेशन एण्ड प्रोटेक्शन फण्ड और मीडास टच इन्वेस्टर एसोसियसन ने लगाया है। जिसके जवाब के लिए आरोप लगाने वाले संस्थाओं ने सूचना के अधिकार के तहत सेबी से डिंलिस्टीग प्रकिया और और परकाशीत सूचना के संबंध में प्रमाण मांगा है। गौरतलब है कि बोम्बे स्टॉक एक्सेंज सीधे सूचना के अधिकार के दायरे मे नहीं आता इस कारण यह जानकारी नियामक संस्था सेबी के माध्यम से मांगी गई है। एसोसियशन के एक उच्च अधिकारी के अनुसार ने डिलिस्टींग प्रकिया के लिए किसी समाचार पत्र में इसका सूचना परकाशीत नहीं करवाया था। इस कारण इन्वेटर को इसकी कोई जानकारी नहीं मिल पाई। साथ ही मीडास टच इन्वेस्टर के निदेशक ने कहा कि हमने सेबी के माध्यम से इस कानून के तहत बोम्बे स्टॉक एक्सेंज से डिलिस्टींग प्रक्रिया के कागजात और किसी मीडिया में परकाशीत सूचना का प्रमाण मांगा है। जिसके जवाब में हमे केवल मीडिया रिलिज उपलब्ध कराई गई और डीलििस्टंग प्रकिया और दी गई सूचना का कोई कागजात नहीं उपलब्ध नहीं कराई गई। सेबी के डिलिंस्टींग नियमावली 2003 के अनुसार कम से कम पांच सदस्य होने चाहिए जो डिलिस्टींग आदेशों को पारित और रेटीफाई करता है। साथ ही कंपनियों को कारण बताओं नोटिस भी भेजा जाता है। और कम से कम दो सूचना किसी राष्ट्रीय अंग्रेजी पत्र में परकाशीत करावाना आवश्यक होता है। इसके बाद एसोसियशन ने फिर से सूचना के अधिकार के तहत एक नया आवेदन दे दिया है।

मिला अधिकार मानवीय और जवाबदेह इलाज का

चिकित्सक भगवान का रुप होते हैं। लेकिन भारत में इस भगवान की जवाबदेयता के लिए कोई कानून नहीं है। चिकित्सकों की लापरवाही और पारदिशZता के अभाव में यदि किसी रोगी को हानि होती है, तो क्या इसका जिम्मेदार समान रुप से चिकित्सक को माना जाना चाहिए ? भारत में उपभोक्ता अदालत की उच्चतम संस्था ``नेशनल कन्ज्यूमर डिसप्यूट रेडरेशल कमीशन´´ ने चिकित्सा सेवा से संबंधित कई कायदे कानून निर्धारित किए है। उदाहरण के लिए राइट्स टू प्रोपर एण्ड ह्यूमेन ट्रीटमेंट और राइट्स टू मेडिकल रिपोर्ट आदि। कमीशन ने इन कायदे कानूनों का निर्धारण उसको मिले कई िशकायतो को आधार पर बनाया है। जिसके अनुसार चिकित्सक को रोगी के दवाई लिखने से पहले उसके सभी छोटे-बडे़ रोग का जानकारी देना होगा। जिसके ना उपलब्ध नहीं कराने पर आदेश का उल्लंधन माना जाएगा। इसके अलावे एक अन्य िशकायत के परिप्रेक्ष्य में आदेश दिया है कि चिकित्सक रोगी को रोग का विवरण बताएं साथ ही इसके सभी उपचार विकल्प और उपचार विकल्प के महत्व और खतरें को बताएं। साथ ही कहा कि अस्पताल या चिक्तिसक रोगी को और रोगी की मृत्यु की दशा में उसके रिश्तेदार को रोगी के पूरा चिकित्सा विवरण उपलब्ध करायें। यह आदेश मेडिकल प्रेिक्टसनर द्वारा रोगियों को लिखे गए दवाई के संबंध में और सूचना के अधिकार के परिप्रेक्ष्प में चिकित्सक और रोगी के बीच बेहतर पारदिशZता और जवाबदेयता के लिए दिया गया है। 

अवकाशों की जानकारी देनी होगी गुजरात विवि के उपकुलपति को

गुजरात राज्य सूचना आयुक्त ने गुजरात विश्वविद्यालय के जन सूचना अधिकारी को आदेश दिया है कि वह विश्वविद्यालय के उपकुलपति की अनुपस्थिति के आंकडे़ 10 दिनों के भीतर आरटीआई आवेदक को उपलब्ध कराए। इस आदेश के बाद गुजरात विश्वविद्यालय के उपकुलपति परिमल त्रिवेदी को अब तक की अपनी सभी छुटि्टयों की जानकारी मुहैया करानी होगी। सूचना आयुक्त आर एन दास ने यह निर्णय विवि के कला विभाग के डीन डॉक्टर प्रदीप प्रजापति की आरटीआई अर्जी की सुनवाई के बाद दिया।
प्रदीप प्रजापति ने अपने आवेदन में प्रश्न किया था कि अवकाश में जाने के लिए उपकुलपति किसे सूचित करते हैं ? किसकी अनुमति पर वह राज्य से बाहर जाते हैं ? और उनकी अनुपस्थिति में कौन उनका पदभार संभालता है ? विश्वविद्यालय ने इन सूचनाओं को निजी बताते हुए देने से मना कर दिया था। मामले की सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद आयोग ने कहा कि मांगी गई सूचनाएं व्यक्तिगत नहीं हैं बल्कि लोक सेवक के नाते उनकी सेवा से संबंधित हैं। आयोग ने कहा कि विश्वविद्यालय इस प्रकार की सूचनाएं देने से मना नहीं कर सकते। गौरतलब है कि कानून के अनुसार उपकुलपति को अवकाष लेने के लिए कुलपति अर्थात राज्य के गवर्नर से अनुमति लेना अनिवार्य है।
परिमल त्रिवेदी के खिलाफ आरटीआई की लगभग दस अपील गुजरात सूचना आयोग में सुनवाई और फैसले के इंतजार में हैं। इन अपीलों में विष्वविद्यालय में लिए गए उनके निर्णयों के बारे में जानकारी मांगी गई है। आयोग ने विष्वविद्यालय को एम-एड डिपार्टमेंट में की गई नियुक्तियों के संबंध में एक आदेष भी जारी किया है। परिमल द्विवेदी पर आरोप है कि उन्होंने अपनी पत्नी की विभाग में गैर कानूनी तरीके से नियुक्ति करवाई और अन्य आवेदकों को अनदेखा किया।

उच्चतम न्यायालय और डीओपीटी स्पष्ट करे आरटीआई पर अपने विचार- सीआईसी

न्यायाधीश सूचना के अधिकार के दायरे में आ सकते हैं या नहीं, इस विवादास्पद मुद्दे पर केन्द्रीय सूचना आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के अधिकारियों व कोमिक और प्रशिक्षण विभाग से उनके विचार पूछे हैं । आयोग ने अलग-अलग नोटिस जारी कर न्यायालय और विभाग के अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वह अपने विचार 11 जुलाई को होने वाली फुल बैंच सुनवाई से पहले प्रस्तुत करें। आयोग ने न्यायाधीषों की संपत्तियों को सार्वजनिक किए जाने या ना किए जाने पर इनके विचार पूछे हैं।
आयोग का यह निर्देश दिल्ली निवासी सुभाष चन्द्र अग्रवाल द्वारा दायर की गई अपील के जवाब में आया है। श्री अग्रवाल ने अपील में पूछा था कि क्या सुप्रीम कोर्ट ने अपने पास किये हुए प्रस्ताव पालन किया है जिसमें सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के सभी जजों को अपनी संपत्ति का ब्यौरा संबंधित मुख्य न्यायधीष को नियमित अंतराल पर भेजना था।
यह प्रस्ताव मई 1997 को 22 न्यायधीषों की उपस्थिति में पारित किया गया था, जिसकी अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश ने की थी। इस बैठक में न्यायधीष वर्मा ने उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय के सभी जजों को नियुक्ति के बाद निश्चित समय सीमा के भीतर अपनी और अपने संबंधियों की संपत्तियों और निवेश का ब्यौरा देने की बात कही। जजों की बैठक में पास किए गए इस प्रस्ताव में कोई कानूनी बाध्यता नहीं है।
गौरतलब है कि मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन ने यह कहकर विवाद खड़ा कर दिया था कि न्यायाधीश सूचना के अधिकार के दायरे में नहीं आते। उनके इस बयान का लोकसभा अध्यक्ष और पार्लियामेंट्री स्टेडिंग कमिटी ऑन लॉ एंड जिस्टस ने आलोचना की थी।

गोपनीय मानी जाने वाली सूचनाएं हुई हासिल

दीपक फूरिया तरूण मि़त्र मंडल और महाधिकार नामक गैर सरकारी संस्था के सक्रिय सदस्य हैं। यह संस्था सूचना के अधिकार कानून के प्रचार-प्रसार का कार्य करती है। दीपक ने सूचना के अधिकार के तहत मुंबई के होमी भाभा सेंटर फोर साइंस एजुकेषन से सूचनाएं मांगी थीं। होमी भाभा सेंटर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विज्ञान और एस्ट्रोनामी के उम्मीदवारों का चयन करने वाली एक नोडल एजेन्सी है।
सेंटर से भारतीय भौतिकी और रसायन के ओलिम्पयाड में बैठने वाले छात्रों की लिस्ट, रैंक और प्राप्तांक पूछे गए थे। आरटीआई आवेदन के जवाब में सेंटर के जन सूचना अधिकारी ने न केवल सूचनाएं देने से मना कर दिया बल्कि इस प्रकार की सूचनाओं को निजता पर हमला भी बताया। साथ ही यह दलील भी दी गई कि इस प्रकार की सूचनाएं छात्र और षिक्षक के बीच के पवित्र संबंध को हिंसक बना सकती हैं।
जन सूचना अधिकारी से सूचना ने मिलने पर दीपक फूरिया निराष नहीं हुए। सूचना के अधिकार पर पूर्ण विष्वास के साथ उन्होंने प्रथम अपीलीय अधिकारी के पास प्रथम अपील दायर की। अपीलीय अधिकारी पेरियास्वामी ने जन सूचना अधिकारी द्वारा दी गईं दलीलों से असहमति जताते हुए उसे निर्देष दिया कि वह आवेदक को मांगी गई सूचनाएं उपलब्ध कराए। इस निर्देष के बाद श्री फूरिया को वह सभी सूचनाएं मिल गई जिन्हें देने से पहले मना कर दिया गया था। गोपनीय मानी जाने वाली जिन सूचनाओं को पहले नहीं दिया जाता था अब वह सभी नागरिकों के लिए उपलब्ध हैं।


गाजियाबाद नगर निगम ने उड़ाया आरटीआई का मजाक

गाजियाबाद नगर निगम को न तो सूचना के अधिकार की फिक्र है और न ही इस कानून के तहत मांगी गई सूचनाओं की। तभी तो निगम द्वारा न तो नियत समय में जवाब दिया जाता है और न ही मांगी गई सभी सूचनाएं महैया कराई जाती हैं। हैरत की बात तो यह है कि निगम गलत और झूठी सूचनाएं देने से भी नहीं चूकता। निगम के इस रवैये को सूचना के अधिकार कानून का मजाक ही कहा जा सकता है। निगम ने हाल ही में आरटीआई का जवाब एक साल में दिया है, वह भी आधा-अधूरा। यह आधा-अधूरी जवाब भी सूचना आयोग के हस्तक्षेप के बाद दिया गया। निगम की घटिया नागरिक सुविधाओं से त्रस्त होकर शालीमार गार्डन कल्याण समिति ने 23 मई 2007 को आरटीआई दायर की थी। जिसका जवाब करीब एक साल बाद 15 अप्रैल 2008 में दिया गया। समिति ने अपने आवेदन में प्रश्न किया था कि शालीमार गार्डन से संपत्ति कर वसूलने के बदले नगर निगम ने क्या-क्या सुविधाएं उपलब्ध कराईं हैं, इसके लिए कौन अधिकारी उत्तरदायी हैं ? उन्होंने प्रश्न किया कि पिछले पांच वर्षों में यहां की नागरिक सुविधाओं में कितनी राशि खर्च की गई है और अगले 6 महीनों में यहां के लिए क्या योजनाएं हैं ? समिति का आरोप है कि जो सूचनाएं दी गईं हैं वह अधूरी हैं। साथ ही निगम ने अपने एक साल बाद दिए गए जवाब में कहा कि मांगी गई सूचनाएं अभी एकत्र की जा रही हैं। गौरतलब है कि आरटीआई के तहत 30 दिनों में सूचनाएं देने का प्रावधान है।
समिति के पदाधिकारियों का कहना है कि सूचना न देने के दोषी व्यक्ति पर जुर्माना लगना चाहिए लेकिन जुर्माना लगाया गया है या नहीं इस बारे में उनके पास कोई जानकारी नहीं है। समिति से चेयरमेन प्रदीप गुप्ता ने जन सूचना अधिकारी के अलावा प्रथम अपीलीय अधिकारी पर भी मामले का न निपटाने का आरोप लगाया। साथ ही निगम पर गलत सूचनाएं देने का आरोप भी लगाया।