मंगलवार, 5 मई 2009

देश और समाज की समस्याओं के प्रति कितनी गंभीर है हमारी शिक्षा व्यवस्था?

मनीष सिसोदिया

देश भले ही भ्रष्टाचार और आतंकवाद की विकराल समस्याओं से जूझ रहा हो लेकिन देश की शिक्षा व्यवस्था यह ज़रूरी नहीं मानती कि आने वाली पीढ़ियों को इन दोनों समस्याओं के प्रति संवेदनशील बनाने में उसकी भी कोई भूमिका है। सूचना के अधिकार के तहत दाखिल आवेदनों के जवाब में शिक्षा व्यवस्था का भावी समाज के प्रति यह गैर ज़िम्मेदाराना रुख सामने आया है।
भारत सरकार का मानव संसाधन विकास मंत्रालय देश के लोगों के शिक्षित होने की दिशा और दशा तय करने का दावा करता है। करीब छह महीने पहले इस मंत्रालय से सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगी गई थी कि इन दोनों समस्याओं के प्रति लोगों को संवेदनशील बनाने के लिए और आतंकवाद तथा भ्रष्टाचार के खिलाफ जनमानस तैयार करने के मकसद से देश की शिक्षण संस्थाओं में विभिन्न स्तर पर पाठयक्रमों में क्या कुछ पाठ जोड़े गए हैं। मंत्रालय ने इन आवेदनों को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) तथा राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) को अग्रसित कर दिया। यूजीसी ने तो एक लाइन में लिखकर दे दिया कि उच्च शिक्षण संस्थानों के पाठ्यक्रम में उसकी कोई भूमिका नहीं है।
दूसरी तरफ एनसीईआरटी ने दोनों आवेदनों के जवाब में बताया है कि उसके पाठ्यक्रम में भ्रष्टाचार या आतंकवाद के बारे में कोई विशेष पाठ नहीं है। गौरतलब है कि एनसीईआरटी का नया पाठ्यक्रम 2005 में ही लागू हुआ है। इस नए पाठ्यक्रम में देश की दो सबसे बड़ी समस्याओं के प्रति आने वाली पीढ़ियों को संवेदनशील बनाने का कितना ध्यान रखा गया है यह खुद एनसीईआरटी के जवाब से देखा जा सकता है -

आतंकवाद
6 अक्टूबर 2008 को दाखिल सूचना अधिकार आवेदन का जवाब अपील/शिकायत आदि दाखिल करने और सूचना आयोग का कड़ा नोटिस मिलने के बाद दिया है।
जवाब में एनसीईआरटी ने लिखा है कि 2005 के पाठ्यक्रम के आधर पर तैयार पाठ्यपुस्तकों में आतंकवाद पर कोई विशेष पाठ हमारी पुस्तकों में नहीं है `....हालांकि इनमें भारत की अखंडता और विश्व शांति पर मंडराते खतरे के रूप में आतंकवाद को रेखांकित किया गया है। राजनीतिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तकों में राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विजुअल एलीमेंट्स के माध्यम से आतंकवाद की चर्चा की गई है।´
एनसीईआरटी का यह दावा सकून देने वाला हो सकता था लेकिन सूचना के अधिकार के इस आवेदन का जवाब देते हुए पाठ्यपुस्तकों के उन हिस्सों की फोटोकॉपी प्रदान की गई हैं जिन पाठों के आधर पर एनसीईआरटी ने उपरोक्त दावा किया है। एक नज़र जवाब के उस हिस्से पर भी।
• भारत की अखंड्ता को बनाए रखने और आने वाली पीढ़ियों को आतंकवाद के प्रति संजीदा करने की कोशिश में पढ़ाए जा रहे पाठों में एनसीईआरटी ने पहला पाठ कक्षा 11 की पुस्तक का उपलब्ध कराया है। यह पाठ (पृष्ठ संख्या ११६) संसद में कानून पास होने की प्रक्रिया के बारे में है और बताता है कि किस तरह कुछ कानून यथा लोक पाल बिल अभी अधर में लटका है, 2002 में आतंकवाद रोधी कानून 2002 राज्य सभा में खारिज हो गया था। यहां पर आतंकवाद शब्द को एनसीईआरटी ने पीले मार्कर पेन से रेखांकित कर दिया है।
• इसके अगले पृष्ठ में संचार माध्यमों के लाभ हानि पर बात करते हुए लिखा गया है कि एक तरफ सामाजिक कार्यकर्ता आदिवासी संस्कृति और जंगल जैसे मुद्दों पर दुनिया भर से संपर्क करने में इनका लाभ ले रहे हैं वही अपराधी और आतंकवादी भी इससे अपना नेटवर्क फैलाते हैं। (यह पृष्ठ आतंकवाद के बारे में नहीं बल्कि इंटरनेट के फायदे नुकसान के बारे में है)
• अगले पन्ने में अधिकारों की बात करते हुए ज़िक्र आता है कि क्या आतंकवाद से पीड़ित एक देश को किसी दूसरे देश के नागरिक अधिकारों का हनन करना चाहिए? यहां भी आतंक वाद शब्द आया है, शायद इसीलिए इस पृष्ठ की फोटोकापी सूचना के अधिकार के तहत उपलब्ध कराई गई है।
• इसके आगे के पन्ने में भी इंटरनेट के उपयोग पर चर्चा है जिसमें लिखा है कि इंटरनेट के विभिन्न पहलू हैं जिसमें एक तरफ संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाएं इसका इस्तेमाल बर्ड फ्लू जैसी बीमारियों के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए करती हैं वहीं आतंकवादी इसका इस्तेमाल अपना नेटवर्क बढ़ाने में करते हैं।
• इसके बाद शंति (पीस) पर एक पाठ है जिसकी पहली ही लाइन में आतंकवाद शब्द आया है इसलिए एनसीईआरटी ने अपने दावे में इसे भी शमिल कर लिया है। इस पाठ में दुनिया भर में अशांति के माहौल पर चर्चा हुई है जैसे कि रवांडा के हालात भारत पाकिस्तान के हालात आदि। यहां पर दुनिया में बढ़ते आतंकवाद के बारे में कुछ चर्चा है। इस पाठ में आगे आतंकवाद के खतरों पर चर्चा है, जिसमें वर्ल्ड ट्रेड सेंटर आदि हमलों का ज़िक्र है।

• इसी तरह कक्षा 12 की पुस्तकों में जहां जहां भी आतंकवाद शब्द ढूंढने से मिलता है उस उस पृष्ठ की फोटोकापी उपलब्ध करा दी गई है। इसमें भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर युद्ध और वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमले और भारत पाकिस्तान तनाव का ज़िक्र है।
• इसी पुस्तक के कुछ अन्य पृष्ठों की फोटोकॉपी भी उपलब्ध कराई गई है जिसमें मुख्यत: संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों और आतंकवाद को एक राजनैतिक हिंसा के रूप में परिभाषित किया गया है।

• हैरानी की बात है कि पुस्तक में जितनी चर्चा अमेरिका, विश्व सुरक्षा आदि पर खतरे को लेकर है उसके मुकाबले भारतीय संदर्भ में आतंकवाद को हल्के ढंग से पेश किया गया है। आतंकवाद के मूल को समझने, इसके बढ़ने के कारणों और भारतीय परिप्रेक्ष्य में संभावित समाधानों का तो ज़िक्र भी नहीं है।

• 12 वीं की पुस्तक में ही आगे सुरक्षा नीतियों की समीक्षा की गई है। इसकी भी फोटोकॉपी उपलब्ध कराई गई है।

गौरतलब है कि यह सब फोटोकॉपी यह कहते हुए दी गई हैं कि आने वाली पीढ़ियों को आतंकवाद के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए शिक्षा व्यवस्था क्या पढ़ा रही है? कितनी ज़िम्मेदारी निभा रही है? सूचना के अधिकार के तहत आवेदन में यही जानकारी मांगी गई थी।


भ्रष्टाचार
इसी प्रकार सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगते हुए एक आवेदन यह भी डाला गया था कि आने वाली पीढ़ियों को भ्रष्टाचार के प्रति जागरूक करने के लिए शिक्षा व्यवस्था क्या ज़िम्मेदारी निभा रही है? पाठ्यक्रम में क्या सामग्री इस आशय के साथ जोड़ी गई है। यह आवेदन 16 अक्टूबर को डाला गया था। इसका जवाब भी इधर -उधर घूमते हुए सूचना आयोग के नोटिस के बाद एनसीईआरटी से प्राप्त हुआ। यहां भी यही कहानी है। कक्षा 9 से कक्षा 12 तक की पुस्तकों के कुछ अध्यायों की सूची। उसके बाद उनकी फोटोकॉपी।
• फोटोकॉपी सेट के पहले ही पन्ने पर एक जगह `करप्ट´ शब्द आया है। पूरा वाक्य इस प्रकार है, `....... इन जांचों से पता चला है कि पिनोशे (चिली का पूर्व तानाशाह) न सिर्फ क्रूर था बल्कि भ्रष्ट भी था..... प्रदान की गई फोटोकापी में करप्ट (भ्रष्ट) शब्द को रेखांकित किया गया है। चिली में लोकतंत्र पर एक पैराग्राफ में आया एक वाक्य `पिनोशे एक भ्रष्ट शासक था।´ सिर्फ यह वाक्य किस प्रकार बच्चों को भ्रष्टाचार के प्रति संवेदनशील बनाता है और कैसे इसे पढ़कर बच्चों के मन में यह भावना जागेगी कि भ्रष्टाचार एक गलत बात है और उसे बड़ा होकर भ्रष्ट नहीं बनना चाहिए.... क्या एनसीईआरटी को इस बात का जवाब नहीं देना चाहिए?
• इसी के अगले पृष्ठ पर पोलैंड के लोकतंत्र पर चर्चा के दौरान भ्रष्टाचार शब्द आया है। (सरकार में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन ने शासकों के लिए मुश्किल खड़ी कर दी) यहां भी पूरे पृष्ठ पर इस एक अकेले शब्द को हरे पेन से रेखांकित कर दिया है।
• इसके अगले पन्ने पर लोकतंत्र पर एक क्लास में चर्चा के दौरान एक चार जगह भ्रष्टाचार शब्द आया है। उसे भी उपरोक्त प्रकार से रेखांकित किया गया है।
• इसी तरह अगले पन्ने पर लोकतंत्र पर सवाल उठाते हुए फ़िर एकबार भ्रष्टाचार शब्द आता है जिसे रेखांकित कर उसकी फोटोकापी प्रदान कराई गई है।
• इसी तरह एक पृष्ठ पर वाक्य आया है कि सेना देश का सबसे अनुशासित और भ्रष्टाचार मुक्त विभाग है। इस पृष्ठ को भी उपरोक्त सवालों के जवाब में सूचना देते हुए उपलब्ध करवाया गया है।
• अगले पन्ने पर नागरिक समूह बनाने पर चर्चा है जिसमें एक वाक्य आता है कि नागरिक, प्रदूषण और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर अभियान चलाने के लिए भी समूह बना सकते हैं।

यहां सवाल सिर्फ सूचना के अधिकार का नहीं है। सूचना तो प्रदान कर ही दी गई है, भले ही अपील और आयोग के नोटिस के बाद मिली हो। सवाल है कि देश को चलाने के लिए अरबों रुपए खर्च कर चल रही शिक्षा व्यवस्था किस प्रकार कल के नागरिक तैयार कर रही है। क्या यह कहने से कि पिनोशे एक भ्रष्ट आदमी था। हम बच्चों को भ्रष्टाचार के खतरे के प्रति संवेदनशील बनाते हुए यह उम्मीद कर सकते हैं कि इसे पढ़ने वाला बच्चा जब नागरिक बनकर आगे आएगा तो वह भ्रष्ट नहीं बनेगा, रिश्वत नहीं लेगा देगा। जिस देश की व्यवस्था को भ्रष्टाचार का घुन लगा हो उस देश की शिक्षा व्यवस्था यह कहकर अपनी पीठ ठोक रही है कि हमारे पाठ्यक्रम में नैतिकता के महत्व पर ज़रूर दिया गया है। वह भी उपरोक्त अध्यायों के दम पर!
यही स्थिति आतंकवाद के मामले में है। देश पिछले कई दशक से आतंकवाद से जूझ रहा है। हमारा रक्षा-सुरक्षा बजट बढ़ रहा है। हम हथियारों के बड़े खरीददार बनते जा रहे हैं। सुरक्षा के कड़े से कड़े नियम बना रहे हैं लेकिन फ़िर भी यह समस्या बढ़ी ही है। अभी तो नामी गिरामी शिक्षा संस्थानों से निकले युवाओं को भी आतंकवाद ने अपनी गिरफ्त में ले लिया है। लेकिन शिक्षा व्यवस्था में लगे लोग उपरोक्त पाठ्यक्रम के बल पर अपनी पीठ थपथपाने में लगे हैं।
देश को आगे ले जाने वाल शिक्षा कैसी होगी इसकी ज़िम्मेदारी हमने शिक्षा व्यवस्था को दी है। और खुद एनसीईआरटी के जवाब से तथा उसके जवाब से उभरे तथ्यों से सवाल यह उभरता है कि क्या यह ज़िम्मेदारी ठीक से निभाई जा रही है? समाज में बढ़ती समस्याएं, बढ़ता आतंकवाद और भ्रष्टाचार तो कम से कम इसका जवाब नहीं में दे रहा है।

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009

अदालत, आयोग और उत्तरपुस्तिका

भागीरथ
देश के करोड़ों छात्रों का भविष्य परीक्षा में प्राप्त होने वाले अंकों पर निर्भर करता है। ऐसे में कई छात्रों की शिकायत होती है कि उन्हें उम्मीद से कम अंक मिले हैं। कई बार ये शिकायत वाजिब भी होती है। लेकिन परीक्षा लेने वाली संस्थाएं किसी भी कीमत पर उत्तरपुस्तिका को सार्वजनिक नहीं करना चाहती। लेकिन सूचना अधिकार कानून लागू होने के बाद परिस्थितियां कुछ-कुछ बदली हैं। केन्द्रीय सूचना आयोग, कई राज्य सूचना आयोग और उच्च न्यायालय ने इस ऐसे मामलों में छात्रहित में फैसला सुनाया है और परीक्षा लेने वाली संस्थाओं को उत्तरपुस्तिका छात्र को मुहैया कराने के आदेश दिए हैं। यहाँ छात्रहित से जुडे़ कुछ ऐसे ही मामलों का उल्लेख किया जा रहा है ताकि आम आदमी और खासकर छात्र वर्ग इससे लाभ उठा सके।

कलकत्ता उच्च न्यायालय:
कलकत्ता उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कलकत्ता विश्वविद्यालय को सूचना के अधिकार के जरिए आवेदक प्रीतम रूज को उत्तर पुस्तिका दिखाने का आदेश दिया है। विश्वविद्यालय के प्रेजीडेंसी कॉलेज मे पढ़ने वाले प्रीतम के एक पेपर में 28 अंक आए थे। कॉलेज द्वारा छात्र के कहने पर समीक्षा की गई तो 32 अंक हासिल हो गए। पेपर में क्या गड़बड़ी हुई, यही जानने के लिए छात्र ने आरटीआई के जरिए उत्तर पुस्तिका दिखाने की मांग की थी। उत्तर पुस्तिका दिखाना विश्वविद्यालय के नियमों में नहीं है इस आधार पर विश्वविद्यालय ने उत्तर पुस्तिका दिखाने की मांग खारिज कर दी। आवेदक ने सूचना आयोग में जाने के बजाय सीधे उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की, जहां जस्टिस संजीव बनर्जी की एकल बैंच ने आवेदक के पक्ष में फैसला सुनाया। विश्वविद्यालय को इससे तसल्ली नहीं हुई और उसने एकल बैंच के इस फैसले को चुनौती दी थी।
कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एस एस निज्जर और दीपांकर दत्ता की खंडपीठ ने एकल बैंच के पूर्ववर्ती फैसले को बरकरार रखते हुए विश्वविद्यालय, सीबीएसई और अन्य परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसिओं को कानून के दायरे में बताया है। न्यायालय ने कहा कि भारतीय संविधान की धारा 19 के अनुसार अभ्यर्थियों को उत्तर पुस्तिका हासिल करने का अधिकार है। निरीक्षण न करने देने से अभिव्यक्ति और सूचना के सांवैधनिक अधिकार को कोई मतलब नहीं रह जाएगा।

केन्द्रीय सूचना आयोग:
केस संख्या 1- केन्द्रीय सूचना आयोग ने एक अपील की सुनवाई की बाद पोंडिचेरी विश्वविद्यालय को आवेदक अजय कुमार साहू को न केवल उत्तर पुस्तिका दिखाने बल्कि उनकी छायाप्रति उपलब्ध कराने के आदेश भी दिए। उत्तरपुस्तिका न दिखाने के लिए अपीलीय अधिकारी ने दलील दी थी कि विश्वविद्यालय में उत्तरपुस्तिका दिखाने का कोई नियम या प्रावधन नहीं है और इस तरह की सूचना कानून की धारा 8(१)(ई) और (जे) के तहत आच्छादित है। आयोग ने सुनवाई में इन दलीलों को निराधर पाया और लोक सूचना अधिकारी को चेतावनी दी कि वह इस धारा का गलत इस्तेमाल न करे।

केस 2- सीआईसी ने मुकेश कुमार के नरेश बनाम सीबीएसई के निर्णय में सीबीएसई को उत्तरपुस्तिका दिखाने के आदेश दिए। आवेदक मुकेश कुमार ने अपने पुत्र रवि नरेश की उत्तरपुस्तिका दिखाने की मांग की थी जिसे सीबीएसई ने कानून की धरा 8 (१)(ई) का सहारा लेकर ठुकरा दिया था। मुकेश कुमार ने दलील दी की उनका पुत्र एक मेधावी छात्र है और उसने अनेक प्रतियोगी परीक्षाएं पास की हैं। उन्होंने अपने पुत्र के 90 प्रतिशत अंक प्राप्त होने की उम्मीद जताई थी। परीक्षा में कम अंक प्राप्त होने की वजह वह उत्तरपुस्तिका देखकर जानना चाहते थे। आवेदक की दलीलों से सहमत होते और पारदर्शिता का ख्याल रखते हुए आयोग ने सीबीएसई को उत्तरपुस्तिका दिखाने का आदेश दिया।

केस 3- दिल्ली के प्रमोद सरीन ने दिल्ली इंजीनियरिंग कॉलेज से 27 मई 2007 को आयोजित किए गए संयुक्त प्रवेश परीक्षा की टेस्ट बुकलेट, उत्तर और ओएमआर की प्रतियां मांगी, जिसे विश्वविद्यालय की बौद्धिक संपदा मानते हुए देने से मना कर दिया गया। साथ ही दलील दी कि इससे अन्य प्रतियोगी छात्रों पर भी बुरा असर पडे़गा। आयोग ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि वस्तुनिष्ठ प्रश्न तैयार करना कोई ऐसी कला नहीं है जिसे बौद्धिक संपदा माना जाए। आयोग ने विश्वविद्यालय की इस दलील को भी खारिज कर दिया है कि ओएमआर प्रति सार्वजनिक करने से भविष्य में अन्य विवाद और अदालती मामलों की संख्या बढ़ सकती है। इस संबंध में आयोग का मानना था कि भविष्य में आने वाली समस्याओं को आधार मानकर अपना फैसला नहीं दे सकती।

बिहार सूचना आयोग:
एलएन मिथिला विश्वविद्यालय के बी. कॉम प्रथम वर्ष के छात्र मुरारी कुमार झा ने अपनी उत्तरपुस्तिका निरीक्षण की मांग की लेकिन विश्वविद्यालय ने कानून की धरा 8(१)(ई) यानि वैश्वासिक रिश्ते की आड़ लेकर इसकी इजाजत नहीं दी। विश्वविद्यालय ने दलील दी कि परीक्षक और परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था के बीच एक वैश्वासिक रिश्ता होता है। उत्तरपुस्तिका निरीक्षण की अनुमति देने से यह इस रिश्ते पर विपरीत असर पडे़गा, इसलिए निरीक्षण की अनुमति नहीं दी जा सकती। आयोग को इन दलीलों में कोई दम नजर नहीं आया। आयोग का मानना था कि जो रिश्ता विश्वविद्यालय और छात्र के बीच होता है वह विश्वविद्यालय और परीक्षक के बीच रिश्ते से अधिक मजबूत और महत्व पूर्ण होता है, इसलिए इसकी आड़ में निरीक्षण या उत्तरपुस्तिका दिखाने से मना नहीं किया जा सकता।

त्रिपुरा सूचना आयोग:
अगरतला की सोमाश्री चौधरी बनाम त्रिपुरा माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के मामले में त्रिपुरा राज्य सूचना आयोग ने बोर्ड को उत्तरपुस्तिका दिखाने के आदेश दिए हैं। सोमाश्री चौधरी ने 2007 की परीक्षा में कम अंक आने पर बोर्ड से बंगाली, गणित और जीवविज्ञान की उत्तरपुस्तिका दिखाने की मांग की थी। उत्तरपुस्तिका न दिखाने के लिए बोर्ड ने दलील दी थी कि इससे परीक्षक की सुरक्षा को खतरा उत्पन्न हो सकता है। इसके अलावा बोर्ड ने उत्तरपुस्तिका न दिखाने के पक्ष में उच्चतम न्यायालय, कलकत्ता उच्च न्यायालय और केन्द्रीय सूचना आयोग का भी हवाला दिया था लेकिन राज्य सूचना आयोग ने इन दलीलों को खारिज कर दिया और साथ की बोर्ड के लोक सूचना अधिकारी पर जुर्माना भी लगाया।

पश्चिम बंगाल सूचना आयोग
पश्चिम बंगाल सूचना आयोग ने कलकत्ता के सुजोय दास गुप्ता बनाम बर्धवान विश्वविद्यालय के मामले में उत्तरपुस्तिका आवेदक को उपलब्ध कराने के आदेश दिए हैं। एम ए राजनीति विज्ञान के एक पेपर (इंटरनेशनल लॉ) में सुजोय के 56 अंक आए थे जो समीक्षा कराने पर 47 हो गए। सुजोय दास गुप्ता इसी पेपर का निरीक्षण करना चाहते थे। लेकिन विश्वविद्यालय ने इसे निजी सूचना और व्यापक जनहित से सम्बंधित न होने और नियमों में ऐसा न होने की दलील देकर आवेदक को निरीक्षण करने की अनुमति नहीं दी। आयोग ने इन दलीलों को नहीं माना और कहा कि विश्वविद्यालय प्राधिकरण को अधिक से अधिक सूचना प्रदान करने की मानसिकता विकसित करनी चाहिए। साथ ही कहा कि विश्वविद्यालय को उत्तरपुस्तिका दिखाने का पूर्ण तंत्र विकसित करना चाहिए। और सुजोय दास गुप्ता को उत्तरपुस्तिका उपलब्ध करानी चाहिए।

उपरोक्त राज्य सूचना आयोगों और कलकत्ता हाईकोर्ट के निर्णय के अलावा गुजरात और छत्तीसगढ़ सूचना आयोग ने भी ऐसे निर्णय दिए हैं। हालांकि कुछ फैसलों के खिलाफ उच्च न्यायालयों में अपील की गई है। प्रतियोगी परीक्षाओं में भी आयोगों और उच्च न्यायालयों का उत्तरपुस्तिका को सार्वजनिक करने को लेकर सकारात्मक रूख रहा है। पहले केन्द्रीय सूचना आयोग और फ़िर दिल्ली उच्च न्यायालय ने यूपीएससी का उत्तरपुस्तिका दिखाने का ऐसा ही आदेश दिया है। हालांकि यह मामला फिलहाल उच्चतम न्यायालय में लंबित है। इसी तरह पटना उच्च न्यायालय भी एक फैसले में बिहार लोक सेवा आयोग को अभ्यर्थियों के प्राप्तांकों को सार्वजनिक करने के आदेश दिए हैं।
उधर छत्तीसगढ़ में राज्य सिविल सेवा परीक्षा में जबरदस्त धांधली का खुलासा भी सूचना के अधिकार की बदौलत ही हुआ था। इस मामले में राज्य लोक सेवा आयोग तात्कालीन चेयरमैन के खिलाफ मामला भी चल रहा है।

सवाल ये है कि विश्वविद्यालय को उत्तर पुस्तिका दिखाने में ऐतराज क्यों है? दरअसल विश्वविद्यालय को लगता ही नहीं है कि परीक्षा जांच में उनसे कोई गड़बड़ी हो सकती है। यह अलग बात है कि अनेक बार विश्वविद्यालय इस मामले में पहले ही कठघरे में खडे़ हो चुके हैं। दूसरा, उन्हें लगता है, ऐसा होने पर उनके कामकाज पर अनावश्यक भार पड़ जाएगा और पूरा परीक्षा तंत्र ढह जाएगा क्योंकि अगर एक बार उत्तर पुस्तिका दिखा दी तो उत्तर पुस्तिका देखने वाले छात्रों की बाढ़ आ जाएगी। विश्वविद्यालय की इन दलीलों से शायद ही कोई जवाबदेही और पारदर्शिता की उम्मीदें करने वाला सहमत होगा।
सवाल ये भी है कि क्या विश्वविद्यालयों और परीक्षा बोर्डों को गोपनीयता के नाम पर छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ करने खुली छूट दी जा सकती है? क्या छात्र को यह जानने का अधिकार नहीं है कि उत्तर पुस्तिका देखकर वह अपनी कमियां दूर कर सके ताकि आगामी परीक्षाओं में उन्हें न दोहराया जाए?

सच हुए सपने

सुंदर नगरी का मोहन अब अर्वाचीन पब्लिक स्कूल में पढ़ता है और कांगो प्रतियोगिता में कांस्य पदक जीतता है। दूसरी और दिलशाद पब्लिक स्कूल में पढ़ने वाले साजन और चैंपियन अपनी कक्षा में अव्वल आते हैं। ऐसे बच्चों की फेहरिस्त काफी लंबी है। पहले इन्हीं बच्चों को दाखिला देने से बचने के लिए पब्लिक स्कूलों का तर्क होता था कि ऐसे बच्चे स्कूल का माहौल खराब कर देंगे क्योंकि ये अपराधिक पृष्ठभूमि से आते हैं, गंदे माहौल में रहते हैं। लेकिन अब स्कूल प्रशासन भी इन बच्चों की लगन और काबिलियत देखकर चकित है। और यह कमाल हुआ है सूचना के अधिकार कानून की बदौलत। झुग्गी झोपड़ियों और पुनर्वास बस्तियों में रहने वाले हजारों बच्चों के सपने इस कानून ने न केवल पूरे किए हैं बल्कि उन्हें इससे एक नई ताकत भी मिली है।

इस चमत्कार को समझने के लिए थोड़ा पृष्ठभूमि में जाना होगा। दरअसल, डीडीए और भूमि और विकास कार्यालय ने दिल्ली के 361 स्कूलों को निशुल्क और सस्ती दर पर जमीन इस शर्त पर दी थी कि वे 25 प्रतिशत तक सीटें आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों को देंगे। इस शर्त की भनक किसी को नहीं लगी और न ही स्कूलों ने इसे अमल में लाने में कोई दिलचस्पी दिखाई। थोड़े बहुत लोगों को इसकी जानकारी तब मिली जब अधिवक्ता अशोक अग्रवाल ने इस संबंध में हाईकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की और हाईकोर्ट ने शिक्षा निदेशालय को इसे कढ़ाई से लागू कराने का आदेश दिया। हाईकोर्ट के आदेश के बाद शिक्षा निदेशालय को इस संबंध में दिशा निर्देंश तय करने के लिए मजबूर होना पड़ा। हालांकि बाद में हाईकोर्ट ने इस कोटे को पचीस प्रतिशत से घटाकर बीस प्रतिशत कर दिया लेकिन एक अच्छी आत यह रही कि सभी मान्यताप्राप्त स्कूलों को इसके दायरे में ला दिया। 2008 में हाईकोर्ट ने एक अंतरिम आदेश में सभी स्कूलों को कम से कम 15 प्रतिशत दाखिले गरीब परिवार के बच्चों के लिए अनिवार्य कर दिया।
डीडीए द्वारा स्कूल को सस्ती जमीन दिए जाने की शर्तों और हाईकोर्ट के आदेश को जानने के बाद लोगों ने स्कूल में अपने बच्चों को दाखिला दिलाने की कोशिशें शुरू कीं लेकिन अधिकांश स्कूलों ने इस सबके बावजूद बच्चों को दाखिला नहीं दिया। इसके बाद लोगों ने बड़ी संख्या में उप शिक्षा निदेशक के पास इन स्कूलों की शिकायत की और कुछ ही दिनों बाद उप शिक्षा निदेशक द्वारा शिकायत पर की गई कार्रवाई की जानकारी सूचना के अधिकार के तहत मांगी। इन आवेदनों ने उप शिक्षा निदेशक पर इतना दबाव बना दिया कि उन्हें ऐसे बच्चों के दाखिले सुनिश्चित कराने को मजबूर होना पड़ा। लेकिन इसके लिए बहुत बार लोगों को उप शिक्षा निदेशक के यहां आरटीआई आवेदन जमा कराने में भी कई तरह की दिक्कतों का सामना पड़ा और दर्जनों मामलों में अपील भी करनी पड़ी।

इन तमाम दिक्कतों के बावजूद बच्चों के दाखिले हुए हैं। हालांकि कई गैर सरकारी संस्थाओं ने भी इसमें अहम भूमिका निभाई है। `आई एस एस टी ´ संस्था की अमिता जोशी बताती हैं कि मयूर, अहलकोन सहित अनेक पब्लिक स्कूलों ने पहले फ्रीशिप कोटे के तहत दाखिले के फार्म देने से ही मना कर दिया। आरटीआई आवेदनों का भी उप शिक्षा निदेशक के यहां से कोई जवाब नहीं मिला लेकिन अपील करते ही शिक्षा विभाग में खलबली मच गई। मयूर पब्लिक स्कूल ने शिक्षा निदेशालय कें आदेश के बाद दाखिले के लिए झुग्गियों में फार्म भिजवा दिए। इसके बाद 9 बच्चों का दाखिला हुआ।

और सफलता का यह सिलसिला आज भी जारी है। ग्रीन फील्ड, नूतन विद्या मंदिर, हंसराज, फ्लोर डेल, ग्रीनवे, सिद्धार्थ इंटरनेशनल, अर्वाचीन, मयूर, बालभवन, मदर टेरेसा, प्रीत, यूनिवर्सल, विवेकानंद, नेशनल विक्टर आदि पब्लिक स्कूलों में दाखिले हुए हैं और अब भी हो रहे हैं। इस संबंध में हाईकोर्ट में याचिका डालने वाले अधिवक्ता अशोक अग्रवाल का कहना है कि साल 2008 में पब्लिक स्कूलों में 10 हजार गरीब बच्चों के दाखिल हुए हैं। उनका कहना है कि इस कोटे के तहत हर साल 40 हजार बच्चों का पब्लिक स्कूल में दाखिला हो सकता है। लेकिन लोगों में जागरूकता की कमी के चलते ऐसी सीटें नहीं भर पा रही हैं।

सीमा पुरी के रहने वाले आरटीआई कार्यकर्ता रामआसरे बताते हैं कि यदि सूचना का अधिकार नहीं होता तो दिल्ली के हजारों गरीब बच्चों के दाखिले नहीं हो पाते। रामआसरे स्वयं एक पुनर्वास बस्ती में रहते हैं और उनके बच्चे हंसराज पब्लिक स्कूल में पढ़ते हैं। पिछले साल उनके बच्चे यश ने अपनी कक्षा में चौथा स्थान हासिल किया था। उनका कहना है कि गरीब परिवारों के बच्चों किसी मायने में अमीरों के बच्चों से कमतर नहीं हैं। यदि मौका मिले तो झुग्गी झोपड़ियों में रहने वाले बच्चे भी अच्छा कर सकते हैं और दिल्ली के अनेक बच्चों ने इसे साबित करके दिखाया भी है।
(अपना पन्ना के अप्रैल अंक में प्रकाशित)

छोटी उमर के बुलंद हौसले

दिल्ली के पब्लिक स्कूलों में गरीब-गुरबत बच्चों का दाखिला टेढ़ी खीर है लेकिन सरकारी स्कूल भी इस मामले में कुछ कम नहीं हैं। दिल्ली सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के तहत छात्रों को मिलने वाली छात्रवृत्तियां भी कई बार जरूरतमंदों तक पहुंचने से पहले या तो दम तोड़ देती हैं। लेकिन इन्हीं सरकारी स्कूलों की लड़कियों ने सूचना कानून का इस्तेमाल कर भ्रष्ट शिक्षा व्यवस्था की कुम्भकर्णी नींद को तोड़ने का काम किया है। पेश है अपना पन्ना की एक रिपोर्ट:-

बंटी छात्रवृति
दिल्ली के कल्याणपुरी राजकीय उच्चतर माध्यमिक कन्या विद्यालय के बच्चों की छात्रवृत्तियों की रकम स्कूल प्रशासन हड़पने के फिराक में था। लेकिन स्कूल की ही छात्रा सुनीता ने सूचना के अधिकार का सहारा लेकर स्कूल प्रशासन के इरादों पर पानी फेर दिया। सुनीता ने न केवल अपनी बल्कि स्कूल की सभी छात्राओं को छात्रावृत्ति दिलाकर ही चैन की सांस ली।
मामला कुछ इस तरह है। स्कूल की तमाम छात्राओं के परिजनों से हस्ताक्षर करवा लेने के चार महीने बाद भी छात्रवृत्तियां आबंटित नहीं की गई थीं। सुनीता ने सूचना के अधिकार के जरिए अधिकारियों से जवाब तलब किया। आवेदन ने असर दिखाया और दो दिन बाद ही अधिकारी स्कूल में इस संबंध में जांच करने आए। इस बीच प्रिंसिपल ने छात्राओं को नाम काटने की धमकी देते हुए कहा कि वह अधिकारियों के सामने छात्रवृत्ति मिलने की बात कहें। अधिकारियों ने जब छात्राओं से इस बारे में पूछा तो उन्होंने अपनी प्रिंसिपल के कहे अनुसार जवाब दिए लेकिन सुनीता ने ऐसा नहीं किया। अधिकारियों के सामने उसने बेबाकी से प्रिंसिपल की शिकायत की और उसका काला चिट्ठा अधिकारियों के सामने रख दिया। सुनीता को इस तरह बोलते देख बाकी छात्राओं में भी उत्साह जगा और उन्होंने भी सब कुछ साफ-साफ बता दिया। इसके कुछ दिनों बाद स्कूल की सभी छात्राओं को छात्रवृत्तियां वितरित कर दी गई।

अफरीदा ने पाया दाखिला
आजमगढ़ से पढ़ाई के सपने संजोकर दिल्ली आई अफरीदा बानो के सपने उस वक्त बिखरने लगे जब कोंडली के दो और दल्लूपुरा के एक स्कूल ने उसे दाखिला देने से मना कर दिया। नौंवी कक्षा में दाखिले के लिए उसने अपने पिता सनीफ अहमद के साथ अनेक चक्कर काटे लेकिन स्कूल ने जैसे दाखिला न देने की कसम खा ली थी। उप शिक्षा अधिकारी को दाखिले के लिए प्रार्थना पत्र भेजा और वहां से स्कूल को दाखिला करने के निर्देश मिले। लेकिन स्कूल ने इस बार भी यह कहकर दाखिला देने से मना कर दिया कि कोई सीट खाली नहीं है। तब जाकर सनीफ ने सूचना के अधिकार का सहारा लिया। उपशिक्षा निदेशक कार्यालय आवेदन दाखिल कर उन्होंने निम्न प्रश्न पूछे-
-मेरी शिकायत की डेली प्रोग्रेस रिपोर्ट बताएं और यह किस अधिकारी के पास है, उसका नाम पद और फोन नंबर बताएं
-मेरी बेटी का एडमिशन कब तक हो पाएगा, तारीख बताएं
-शिक्षा अधिकारी द्वारा निर्देश दिए जाने के बावजूद प्रधानाचार्य ने प्रवेश देने से इंकार कर
दिया। क्या यह शिक्षा सम्बन्धी कानून का खुला उल्लंघन नहीं है?
-कृपया यह बताएं कि शिकायत में उल्लखित तीनों सरकारी विद्यालयों में कक्षा नवीं के लिए कितने सेक्शन हैं तथा प्रति सेक्शन कितने बच्चों को प्रवेश दिया गया है, कृपया प्रवेश रजिस्टर की कॉपी दें।
आवेदन में पूछे गए सवालों का असर ये हुआ कि उपशिक्षा निदेशक कार्यालय हरकत में आया है और अफरीदा बानो का शीघ्र दाखिला हो गया। यह दाखिला आध सत्र बीत जाने के बाद यानि अक्टूबर माह में किया गया।

यूजीसी का आदेश: पर्यावरण शिक्षा अनिवार्य

गिरीश चन्द्र करगेती
पर्यावरण संरक्षण का कार्य विभिन्न व्यक्तियों और संस्थाओं द्वारा लंबे समय से किया जा रहा है लेकिन अब तक सफलता नहीं मिली है। इसी क्रम में वरिष्ठ अधिवक्ता एवं पर्यावरणविद एम सी मेहता ने भारत के समस्त विद्यालयों, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय एवं अन्य शिक्षण संस्थानों में पर्यावरण का अनिवार्य पाठ्यक्रम लागू करने के लिए एक याचिका (संख्या 860/१९९१) उच्चतम न्यायालय में दाखिल की ताकि बचपन से ही विद्यार्थियों के मन में पर्यावरण संरक्षण की सोच विकसित हो सके। उच्चतम न्यायालय ने 18 दिसंबर 2003 में इस याचिका पर ऐतिहासिक निर्णय सुनाया जिसके अन्तर्गत एआईसीटीई, एनसीईआरटी, यूजीसी को पर्यावरण का अनिवार्य पेपर 2004-05 सत्र से लागू करने का आदेश दिया और पालन न करने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की बात कही। उच्चतम न्यायालय के पूर्ण आदेश मिलने से पहले ही विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने उच्चतम न्यायालय के अंतरिम आदेश का पालन करते हुए भारत के समस्त विश्वविद्यालयों और संस्थानों को सिक्स मंथ मोड्यूल सिलेबस पफॉर इनवायरमेंट स्टडीज इन अंडरग्रेजुएट्स कोर्सेस में लागू करने का आदेश अपने पत्र डी ओ संख्या एफ13-1/2000 (एफए /ईएनयू/सीओएस-एफ) 23 जुलाई 2003 को प्रेषित किया और पत्र में वर्तमान सत्र में पेपर लागू करने का आदेश भी दिया।
लेकिन सूचना के अधिकार का इस्तेमाल करने पर ये पता चला कि अब तक मात्र 94 विश्वविद्यालय और संस्थानों में ही यह पेपर लागू हुआ था। अप्रैल 2007 में जानकारी मांगी गई थी कि कितने विश्वविद्यालयों और संस्थानों ने छह माह का अनिवार्य पेपर लागू किया है। मई 2007 में यूजीसी ने उत्तर दिया कि भारत में 94 विश्वविद्यालयों और संस्थानों ने उच्चतम न्यायालय के आदेश का पालन करते हुए अनिवार्य पर्यावरण का पेपर लागू किया और 268 विश्वविद्यालयों एवं संस्थानों ने 2007 तक इसे लागू नहीं किया। पेपर लागू न करने पर कार्रवाई के बारे में पूछने पर यूजीसी ने समस्त संस्थानों को जुलाई 2003 का पत्र अनुस्मारक के रूप में प्रेषित किया ताकि तुरंत पेपर लागू किया जा सके।

इस क्रम को आगे बढ़ाते हुए जुलाई 2007 में पुन: आरटीआई आवेदन डालकर पेपर लागू न करने वाले संस्थानों के विरुद्ध की गई कार्रवाई की स्थिति जाननी चाही। यूजीसी ने जवाब दिया कि पुन: अनुस्मारक भेजा गया है और उच्चतम न्यायालय की अवमानना तथा सख्त कार्रवाई की स्थिति के संदर्भ में उन्होंने लिखा कि आयोग अपने वकील से संपर्क बना रहा है। कुछ समय बाद मई 2008 को यूजीसी के वकील के पत्र की प्रति और अप्रैल 2008 तक कितने संस्थानों ने पेपर लागू किया है, की सूचना मांगी गई। जवाब में यूजीसी के वकील अमितेश कुमार के पत्र की प्रति और कुछ विश्वविद्यालय और संस्थानों की सूची दी गई जिन्होंने पेपर लागू कर दिया था। वकील के पत्र में संयुक्त सचिव को सुझाव दिया गया था कि जो संस्थान आदेश नहीं मान रहे हैं उनका अनुदान रोक लिया जाए। और इस संदर्भ में मेमो भी जारी करे। इसके बाद यूजीसी ने भारत के समस्त संस्थानों को अंतिम मेमो भेजा और स्पष्ट किया कि पर्यावरण का पेपर लागू न करने की स्थिति में वार्षिक अनुदान रोक लिया जाएगा।
जाहिर है यह आरटीआई का ही कमाल था कि यूजीसी को इस मामले पर रूख अपनाना पड़ा। और इसका नतीजा ये निकला कि अब देश के सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में छात्रों को पर्यावरण का पाठ पढ़ाया जाएगा।

(अपना पन्ना के अप्रैल अंक में प्रकाशित)

शनिवार, 4 अप्रैल 2009

कैसी प्लानिंग, कैसा मैनेजमेंट...

शशि शेखर
दागदारों ने बना दिया है शिक्षा को धंधा एक तरफ जर्मनी में वांटेड है एमिटी के निदेशक चौहान बंधु और इनके ख़िलाफ़ इंटरपोल से जारी है रेड कॉर्नर नोटिस तो दूसरी और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ प्लानिंग मैनेजमेंट (आईआईपीएम,दिल्ली) के खिलाफ वित्त मंत्रालय में कर चोरी की शिकायत तो है ही इसके साथ कई और आरोपों से भी घिरा है ये संस्थान। अपना पन्ना के अंक में आरटीआई की मदद से इन शिक्षण संस्थानों की खबर लेती ये रिपोर्ट:
एमिटी--
भारतीय संस्कृति में गुरु को गोविंद यानि भगवान से भी ऊंचा दर्जा प्राप्त है और शिक्षण संस्थानों का महत्व किसी मंदिर से ज्यादा। लेकिन बाजारवाद के दौर में जब शिक्षा के इसी मंदिर को दुकान बनाकर गुरु खुद दुकानदार बनकर जाएं और फ़िर नैतिकता की बात करे, तो इसे क्या कहेंगे? कुछ ऐसा ही मामला दिल्ली और एनसीआर में फल-फूल रहे निजी शिक्षण संस्थानों का है जो हजारों बच्चों और उनके मां-बाप को सुनहरे भविष्य का सपना दिखाते हैं जबकि खुद सपनों के इन सौदागरों का भूत और वर्तमान इतना दागदार है जिसे जानना देश का भविष्य कहलाने वाले बच्चों और उनके अभिभावकों के लिए बेहद जरुरी है। अपना पन्ना के पास सूचना का अधिकार कानून की मदद से निकाले गए जो दस्तावेज हैं उससे इन शिक्षण संस्थानों और इसके निदेशकों की असलियत का साफ-साफ पता चलता है।

राज्य सभा में पूछे गए एक प्रश्न का हवाला देते हुए सूचना कानून के तहत विदेश और गृह मंत्रालय से एमिटी के निदेशक अशोक कुमार चौहान और अरुण कुमार चौहान के संबंध में कुछ सवाल पूछे गए थे। सीबीआई की तरफ से उपलब्ध कराए गए दस्तावेज के मुताबिक चौहान बंधुओं का नाम जर्मनी के वांटेड की लिस्ट में शामिल है और इनकी गिरफ्तारी के लिए बकायदा इंटरपोल ने रेड कॉर्नर नोटिस भी जारी किया हुआ है। इसके अलावा इनके प्रत्यर्पण के लिए जर्मनी ने भारत सरकार से अनुरोध भी किया है। हालांकि अब तक इस पर कोई कार्रवाई नहीं हो सकी है। वजह, 2005 में चौहान बंधुओं ने देश के अंदर अपने खिलाफ आपराधिक मामला नहीं चलाए जाने के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय में एक रिट याचिका दायर की थी और उच्च न्यायालय ने प्रत्यर्पण संधि की धारा (६) के मुताबिक देश के अंदर इनके खिलाफ आपराधिक मामला नहीं चलाने का अंतरिम आदेश 31-05-2005 को दे दिया।

दरअसल ये पूरी कहानी 90 के दशक में शुरु होती है जब चौहान बंधु जर्मनी में रहा करते थे और एकेसी बिजनेस ट्रस्ट चलाते थे। इस ट्रस्ट के अंतर्गत लगभग 40 कंपनियां काम कर रही थीं। साल 1993-1994 के दौरान चौहान बंधुओं पर जर्मनी के कुछ बैंकों से धोखाधडी कर लेने का आरोप लगा और जिसके चलते उन बैंकों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। इसके बाद दोनों ने भारत आ कर शिक्षा के क्षेत्र में हाथ आजमाने का फैसला किया। और आज एमिटी नाम से दर्जनों स्कूल,कॉलेज दिल्ली और एनसीआर में चल रहे हैं।

आईआईपीएम,दिल्ली-
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ प्लानिंग मैनेजमेंट यानि आईआईपीएम जो अपने विज्ञापनों के माध्यम से छात्रों को आईआईएम से हट कर सोचने को कहती है और जिसके पाठ्यक्रम का नाम भले ही एमबीए हो (एमबीए डिग्री के साथ एक तारा भी चमकता दिखाई देता है,जिसका विशेष अर्थ कहीं कोने में लिखा होता है) लेकिन पढ़ाई प्लानिंग और इंटरप्रेन्योरशिप की होती है। सूचना का अधिकार कानून के इस्तेमाल से निकाले गए दस्तावेज के अनुसार आईआईपीएम का कोई भी पाठ्यक्रम यूजीसी (विश्व विद्यालय अनुदान आयोग) और एआईसीटीई से मान्यताप्राप्त नहीं है। सूचना कानून के तहत दिए अपने जवाब में यूजीसी ने माना है कि संस्थान द्वारा चलाए जा रहे कोर्स के संबंध में उसे शिकायत मिली है और इसके बारे में कारण बताओ नोटिस भेजे जाने की तैयारी की जा रही है।

इसके अलावा आईआईपीएम पर वर्ष 2005-06, 2006-07 के दौरान आयकर कानून, 1961 की धारा 10(23सी) के तहत छूट पाने के लिए गलत दावे करने की शिकायत भी वित्त मंत्रालय को मिली थी। जनवरी 2008 को मंत्रालय की तरफ से सूचना कानून के तहत उपलब्ध कराए गए दस्तावेज में बताया गया है कि इस मामले की जांच की जा रही है और इस शिकायत को आगे की जांच के लिए इसे आयकर महानिदेशक(छूट) के पास भी भेज दिया गया है।

शिकायतों की फेहरिश्त यहीं खत्म नहीं होती है। कारपोरेट कार्य मंत्रालय में भी आईआईपीएम के खिलाफ शिकायत पहुंची थी जहां महानिदेशक (आई एंड आर) ने अपनी प्रारंभिक जांच रिपोर्ट एकाधिकार तथा अवरोधक व्यापारिक व्यवहार आयोग (एमआरटीपी आयोग) के पास जमा करा दिया था और 3 मार्च 2008 को आयोग में इसकी सुनवाई होनी थी।

ऐसे में यह सवाल भी उठता है कि जिनके खुद के दामन पर छींटे पड़े हो और धोखाधडी, कर वंचना जैसा संगीन आरोप हो वो क्या और कैसी शिक्षा हमारे बच्चों को दे रहें होंगे? आखिर क्यों ऐसे लोगों को शिक्षण कार्य शुरु करने की इजाजत दी जाती है? शायद उदारीकरण के उस शुरुआती दौर में जब कुकरमुत्तों की तरह दर्जनों प्राइवेट शिक्षण संस्थान पनपने लगे थे, तब सरकार ने भी मानो अपनी आंखें मूंद ली थीं और बिना आगे-पीछे का कोई रिकॉर्ड देखे ऐसे संस्थानों को मंजूरी दे रही थी।

मंगलवार, 3 मार्च 2009

क्या जवाबदेही और पारदर्शिता से डरती है देश की सबसे बड़ी अदालत?

देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट सवालों के कटघरे में है। और ये सवाल खुद इस अदालत की विश्वसनीयता, आम जनता के साथ उसके रिश्ते में जवाबदेही और पारदर्शिता और उसके जजों के आचरण पर लगे धब्बों के संबंध में हैं। 26 फरवरी की सुबह सुप्रीम कोर्ट के सामने करीब 300 सामाजिक कार्यकर्ता हाथों में तख्ती, बैनर, हैंडबिल लिए ठीक सुप्रीम कोर्ट के सामने धरने पर बैठे। न कोई नारेबाज़ी, न कोई हो हल्ला, न कोई रास्ता जाम, न कोई भाषणबाज़ी। ये लोग चुपचाप करीब छह घंटे तक सुप्रीम कोर्ट के गेट पर हाथों में बैनर लिए खड़े रहे। आने जाने वाले वकीलों तथा अन्य लोगों को अपनी मांगों का एक पर्चा थमाते गए। अलग-अलग संगठनों और आंदोलनों से जुड़े ये लोग मांग कर रहे थे कि सूचना का अधिकार कानून न्यायपालिका पर भी पूरी तरह लागू हो तथा सारे जज अपनी अपनी संपत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक करें। क्योंकि अगर नेताओं और अफसरों के लिए अपनी संपत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक करना लाज़िमी है तो भला जज इससे ऊपर कैसे रह सकते हैं? जजों को भी कानून के दायरे में लाया जाना चाहिए।
हैरानी की बात है कि जिस सुप्रीम कोर्ट ने किसी समय भारतीय संविधान की धारा 19 ए में प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की व्याख्या करते हुए कहा था कि लोकतंत्र में किसी नागरिक की बोलने की आज़ादी तब तक कोई मायने नहीं रखती जब तक कि उसे जानने की आज़ादी न हो। अत: देश के हर आदमी को यह जानने का मूलभूत अधिकार है कि उसके द्वारा चुनी गई तथा उसके ही टैक्स के पैसे से काम कर रही सरकार क्या काम कर रही है। 1976 में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के इस महत्वपूर्ण फैसले ने ही सूचना के अधिकार कानून की नींव रखी और इसके बाद 2005 में इसे सुनिश्चित करता हुआ एक प्रभावशाली अधिनियम देश में लागू हुआ। सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या में आम आदमी के जानने का जो हक़ निकल कर आया था यह कानून उसी हक़ को पाने की गारंटी देता है। लेकिन जब तक सरकार से जानने की बात थी तब तक तो ठीक लेकिन इस कानून में न्यायपालिका को भी शामिल करने से कुलबुलाहट मचने लगी।
जिस सप्रीम कोर्ट ने जानने के हक़ को मूलभूत अधिकार बताया था उसी के वर्तमान मुखिया आज खुद को आम आदमी के जानने के हक़ से ऊपर बता रहे हैं। यानि कि पर उपदेश कुशल बहुतेरे की कहावत को चरितार्थ करने में लगे हैं। जब तक नेताओं की बात हो अफसरों की बात हो तो सब कुछ पारदर्शी और जवाबदेह होना चाहिए। लेकिन जैसे अपने ऊपर उंगली उठती है तो अदालतें भी बंगलें झांकने लगती हैं। सुप्रीम कोर्ट के सामने धरने पर आए लोगों का भी यही सवाल था कि आखिर अदालतें इस देश के लोगों के लिए ही तो हैं। देश के लोगों के पैसे से ही तो जजों के आलीशान गाड़ी बंगलों के खर्चे निकलते हैं। अदालत के तमाम खर्चे देश के लोग इसीलिए उठाते हैं कि कहीं अन्याय की स्थिति में उन्हें न्याय मिलेगा। लेकिन जनता के पैसे से जनता के लिए काम पाए कुछ लोग जनता से ऊपर कैसे हो सकते हैं?
इस धरने और पूरे विवाद की बुनियाद में है अदालतों में भ्रष्टाचार के बढ़ते मामले और इस सबके बावजूद अदालतों का खुद को विशेष मानते हुए जनता के प्रति जवाबदेही और पारदर्शिता से बचने की कोशिश। घटना क्रम में सबसे अहम पड़ाव आया है दिल्ली के कपड़ा व्यापारी सुभाष चंद्र अग्रवाल के सूचना के अधिकार आवेदन से। सूचना के अधिकार के करीब 1000 से ज्यादा आवेदन डाल चुके अग्रवाल सूचना के अधिकार को एक वरदान मानते हैं। अग्रवाल ने मुख्य क्या न्यायाधीश के यहां दिल्ली हाई कोर्ट के एक जज के भ्रष्टाचार की शिकायत की थी लेकिन जब कुछ नहीं हुआ तो उन्होंने सूचना के अधिकार के तहत इस बारे में जानकारी मांगी। इसी क्रम में अग्रवाल ने सूचना के अधिकार का इस्तेमाल करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट के जजों की संपत्ति का ब्यौरा मांगा। गौरतलब है कि 7 मई 1997 में पास एक प्रस्ताव के तहत जजों को अपनी तथा अपने परिवार की संपत्ति का ब्यौरा देश के मुख्य न्यायाधीश को देना होता है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के लोक सूचना अधिकारी ने सूचना के अधिकार के तहत इस ब्यौरे को सार्वजनिक किए जाने से मना कर दिया। सुभाष अग्रवाल ने इसके बाद केंद्रीय सूचना आयोग का दरवाज़ा खटखटाया। सुनवाइयों के लंबे दौर के बाद केंद्रीय सूचना आयोग ने 6 जनवरी 2009 को फैसला सुनाया और सुप्रीम कोर्ट के लोक सूचना अधिकारी को सूचना उपलब्ध करवाने को कहा। केंद्रीय सूचना आयोग के इस फैसले को मीडिया में खूब तरजीह मिली लेकिन इसके तुरंत बाद देश के मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि जजों की संपत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक नहीं किया जा सकता और केंद्रीय सूचना आयोग के पफैसले को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दे दी गई। यह एक अनोखा मामला था जब बड़ी अदालत अपनी रक्षा की दुहाई देते हुए छोटी अदालत में जा पहुंची।
देश की सबसे बड़ी अदालत अपने जजों की संपत्ति को गोपनीय रखने के लिए अपने से छोटी अदालत की शरण में गई तो लोगों की निगाह उठनी स्वभाविक थी। लोगों में चर्चा चली कि आये दिन जजों पर भ्रष्टाचार के जो आरोप लग रहे हैं उनमें दम है तभी तो यह सब छिपाने की कोशिश की जा रही है। अगर सब कुछ साफ़ साफ़ है तो यह जानकारी छिपाने के लिए इतनी हाय तौबा क्यों? खुद लोक सभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने यह मुद्दा उठाया कि जब सांसद अपनी संपत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक करते हैं तो भला जजों को इससे अलग कैसे रखा जा सकता है?
लेकिन सूचना के अधिकार को लेकर न्यायपालिका के रवैये से लोगों की नाराज़गी सिर्फ़ इस एक मामले तक सीमित नहीं है। इस कानून के लागू होने के बाद से ही अदालतों ने जिस तरह खुद को इस कानून के दायरे से ऊपर दिखाने की कोशिश की है उसने भी लोगों और अदालतों के बीच विश्वास को कम किया है। सूचना के अधिकार कानून से खुद को ऊपर स्थापित करने की कोशिश में सुप्रीम कोर्ट के अधिकारियों की ओर से पहले यह कोशिश की जा चुकी है कि उनके मामले में दूसरी अपील केंद्रीय सूचना आयुक्त के यहां दाखिल करने की जगह सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के यहां दाखिल की जाए। प्रावधानों से ऊपर देश के कई उच्च न्यायालयों में आम आदमी की हैसियत का मज़ाक उड़ाते हुए सूचना मांगने की फीस 500 रुपए कर दी गई है। यही नहीं अपील के लिए भी 50 रुपए का शुल्क रखा गया है। इसी तरह फोटोकॉपी के लिए प्रति पृष्ठ 5 रुपए की फीस कर दी है। यानि कि किसी गरीब आदमी को सूचना चाहिए तो वह आवेदन डालने की हिम्मत ही न कर सके। केंद्र और अधिकतर राज्य सरकारों के मामलों में आवेदन डालने के लिए 10 रुपए की फीस है। अपील के लिए कोई शुल्क नहीं है। साथ ही फोतोकोपी के लिए 2 रुपए प्रति पृष्ठ की फीस है। दिल्ली हाई कोर्ट में तो सूचना के अधिकार के आवेदन सुबह 11 बजे से दोपहर 1 बजे तक यानि मात्र दो घंटे ही स्वीकार किए जाते हैं।

मंत्री भी गोपनीय रखना चाहते हैं अपनी कमाई की जानकारी
सूचना के अधिकार कानून के दायरे से बाहर आने की कुलबुलाहट सिर्फ़ अदालतों में ही दिखती हो ऐसा नहीं है। हाल ही में प्रधानमंत्री कार्यालय ने भी मंत्रियों और उनके परिवार के नाम संपत्ति के ब्यौरे को सार्वजनिक करने से मना कर दिया था। सुभाष अग्रवाल के ही सूचना अधिकार आवेदन के जवाब में प्रधानमंत्री कार्यालय ने कहा है कि ये जानकारी सूचना अधिकार कानून की धारा 8(१)(ई) तथा (जे) के तहत उपलब्ध नहीं कराई जा सकती। इन दोनों धाराओं में कहा गया है कि ऐसी सूचना जो वैश्वासिक नातेदारी (फ्रयूडिशियरी रिलेशनशिप) के तहत प्रदान की गई हो अथवा किसी की निजी सूचना हो, वह सूचना के अधिकार के तहत उपलब्ध नहीं कराई जाएगी जब तक कि इसका दिया जाना जनहित में न हो।
हुआ यूं था कि सुभाष अग्रवाल ने केबिनेट सचिव से केंद्रीय मंत्रियों तथा उनके परिजनों की संपत्ति का पिछले दो साल का ब्यौरा मांगा था। केबिनेट सचिव कार्यालय ने यह आवेदन प्रधानमंत्री कार्यालय को प्रेषित कर दिया। 19 मई 2008 को प्रधानमंत्री कार्यालय ने पहले तो यह तमाम सूचना केबिनेट सचिव कार्यालय को उपलब्ध करा दीं ताकि इन्हें सूचना के अधिकार के जवाब में आवेदक को उपलब्ध कराया जा सके। लेकिन न तो केबिनेट सचिव कार्यालय से और न ही प्रधानमंत्री कार्यालय से उन्हें कोई सूचना मिली। समय बीतने पर अग्रवाल ने केंद्रीय सूचना आयोग के पास अपील दाखिल कर दी। इसके बाद 17 दिसंबर 2008 को प्रधानमंत्री कार्यालय ने अग्रवाल को एक पत्र लिख कर सूचित किया कि उनके द्वारा मांगी जा रही सूचना कानून की धरा 8(१)(ई) तथा (जे) के तहत गोपनीय मानी गई है अत: प्रदान नहीं की जा सकती। सवाल यहां भी वही है कि ये मंत्री और उनके रिश्तेदार आखिर कितना कमाते हैं और अगर इमानदारी से कमाते हैं तो जनसेवकों को जनता से छिपाने की आवश्यकता क्या है?
खुद सूचना आयुक्त भी नहीं होना चाहते पारदर्शी
दूसरों को आदेश देना और बात है, लेकिन खुद को पारदर्शी रखने के लिए जो नैतिक ताकत चाहिए वह केंद्रीय सूचना आयोग के पास भी नहीं दिखती। अदालतों के जजों की संपत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक किए जाने का फैसला देने वाले सूचना आयुक्त भी जब खुद की बारी आती है तो कानून की आड़ में छिपने लगे हैं। उनका भी तर्क है कि कानूनन वे ऐसा करने के लिए बाध्य नहीं हैं। सूचना आयुक्त वज़ाहत हबीबुल्लाह ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया को दिए एक इंटरव्यू में कहा है कि सभी केंद्रीय सूचना आयुक्तों ने अपनी अपनी संपत्ति का ब्यौरा आयोग को दे दिया है लेकिन उसे वेबसाइट पर सार्वजनिक नहीं किया जा रहा है।
गौरतलब है कि हाल ही में नियुक्त चार नए सूचना आयुक्तों में से एक शैलेष गांधी ने अपनी संपत्ति का ब्यौरा केंद्रीय सूचना आयोग की वेबसाइट पर डाले जाने कई मांग की थी लेकिन उनका अनुरोध नहीं स्वीकार किया गया। इसके बाद शैलेष गांधी ने सूचना कार्यकर्ताओं के मध्य लोकप्रिय ईमेल ग्रुप हम जानेंगे पर अपनी करीब साढ़े पांच करोड़ रुपए की संपत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक कर दिया था। लेकिन बाकी सूचना आयुक्त अभी यह साहस नहीं दिखा सके हैं। अगर सूचना आयुक्त यह पहल करते हैं तो देश के बाकी नौकरशाहों के लिए यह एक बड़ा संदेश होगा।