गुरुवार, 27 जनवरी 2011

चोरी भी और सीनाज़ोरी भी

एक और विसिल ब्लोअर को दबाने कि कोशिश
सतीश कुमार 
दिल्ली विश्वविद्यालय के इंस्टीच्युट ऑफ होम इकोनोमिक्स में एक नया घोटाला सामने आया है। कॉलेज बिल्डिंग को किराये पर देकर उससे होने वाली आमदनी कॉलेज की देखरेख कर रहे ट्रस्ट ने अपने खाते में जमा करा लिया। इस घोटाले का खुलासा किया है कॉलेज के ही एक लेब अस्सिसटेंट सतीश कुमार ने। सतीश ने कॉलेज प्रशासन से आरटीआई के तहत कॉलेज परिसर में किराये पर चल रहे एक निजी संस्थान के सम्बंध् में सूचना मांगी।
आरटीआई के तहत मिली सूचना से पता चला है कि वर्ष 1999 में कॉलेज परिसर का एक हिस्सा एक निजी संस्था नेशनल इंस्टीच्युट ऑफ फैशन डिजाइन (एनआईएफडी) को किराये पर दिया गया। पहले तो किराये के रूप में कॉलेज को हर महीने 1 लाख रूपये की राशि मिलती रही। लेकिन बाद में एनआईएफडी ने कॉलेज का कुछ और हिस्सा भी किराये पर ले लिया, जिससे किराया हर महीने 1.70 लाख रफपया हो गया। किराये से होने वाली यह आमदनी कॉलेज के खाते में न जाकर कॉलेज चला रहे ट्रस्ट के खाते जा रहा है।
सतीश ने कॉलेज से मिली इस सूचना के आधार पर यूजीसी से आरटीआई के तहत इंस्टीच्युट ऑफ होम इकोनोमिक्स द्वारा जमा किये गये वार्षिक रिपोर्टों की प्रति भी मांगी। वार्षिक रिपोर्ट से पता चला कि कॉलेज ने कभी भी किराये से होने वाली लाखों की कमाई का जिक्र उसमें किया ही नहीं। सतीश का कहना है कि मेरे आरटीआई आवेदन का यह असर तो हुआ है कि आवेदन करने के कुछ ही घंटो के भीतर कॉलेज परिसर से एनआईएफडी के बोर्ड हटा दिये गये। लेकिन साथ ही मुझे बार बार धमकी दी जा रही है कि इस मामले को आगे ना बढाये नहीं तो नौकरी से निकाल दिया जयेगा। पूर्व प्रधनाध्यपिका एस.मलहान ने मुझे बुलाकर ऑफर दिया कि जितना पैसा चाहिए ले लो लेकिन मामले को यहीं खत्म करो।
सतीश का कहना है कि यूजीसी के नियमों के अनुसार कॉलेज को किराये से होने वाली आमदमी अपने वार्षिक रिर्पोट में दिखाना पड़ता है क्योंकि यह कॉलेज के लिए आय का श्रोत होता है। जब इस पूरे मामले की शिकायत दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपती और यूजीसी से की गई तो वो इसकी जांच कराने की जगह कॉलेज का बचाव करने में जुट गये। सतीश बताते है कि जो शिकायत उन्होंने कुलपती और यूजीसी से की थी उसे कॉलेज के ही प्रधनाध्यापक के पास जांच के लिए भेज दिया गया। बाद में कुलपती कार्यलाय और यूजीसी दोनों ही जगह से उन्हें बताया गया कि चूंकि कॉलेज भवन के निर्माण में ट्रस्ट का आधा पैसा लगा है इसलिए ट्रस्ट किराये से होने वाली आमदनी का उपयोग कर सकता है।
यूजीसी और कुलपती के इस जवाब से निराश सतीश ने इसकी शिकायत अब सीवीसी और मानव संसाधन मन्त्रालस से किया है। सतीश कहते है ``मैंने तो यह लड़ाई यह सोचकर शुरू की थी कि जिस पैसे का उपयोग छात्रों के हित के लिए किया जाना चाहिए वो कुछ लोगों के स्वार्थपूर्ति के लिए किया जा रहा है। पिछले 11 वर्षों में 3 करोड़ से ज्यादा राशि का गबन किया जा चुका है और अगर तुरन्त कोई कार्यवाई नहीं की गई तो यह राशि बढती ही जा रही है। मुझे अपनी नौकरी की चिन्ता के साथ इस बात की ज्यादा चिन्ता है कि अगर इस मामले में कार्यवाई नही हुई तो आगे कोई और इस तरह के भ्रष्टाचार को सामने लाने की हिम्मत नहीं करेगा। मैं पाठकों से यह अपील करना चाहता हुं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ इस लडाई में मेरा साथ दें ताकि दोषियों के खिलाफ सख्त कार्यवाई हो सके।´´

कोई टिप्पणी नहीं: