सोमवार, 30 जून 2008

एसएससी को मजबूत करे केन्द्र- केन्द्रीय सूचना आयोग

अजीब विडंबना है कि केन्द्र सरकार के कर्मचारियों का चयन करने वाला कर्मचारी चयन आयोग स्वयं कर्मचारियों की कमी से जूझ रहा है। यह बात किसी और ने नहीं बल्कि खुद एसएससी ने एक आरटीआई अर्जी के जवाब में स्वीकार की है। मामला जब केन्द्रीय सूचना आयोग के पास पहुंचा तो उसने केन्द्र सरकार को सिफारिश की कि वह कर्मचारियों की कमी से जूझ रहे कर्मचारी चयन आयोग को मजबूत करे। ताकि सूचना के अधिकार को ठीक से क्रियािन्वत किया जा सके। आयोग ने इस कमी को दूर करने के लिए अपनी सिफारिशें डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनल एंड ट्रेनिंग को भेज दी हैं।
सूचना आयोग ने यह सिफारिशें आरटीआई की एक अपील की सुनवाई के बाद दीं। अहमदाबाद निवासी दौलत जमनादास नाजरा ने अपनी एक आरटीआई अर्जी से कर्मचारी चयन आयोग से पूछा कि वह तीन दशकों में दिए गए वर्गीकृत विज्ञापनों की संख्या बताए। एसएससी ने यह विज्ञापन अपर डिवीजन क्लर्क और अन्य नियुक्तियों के संदर्भ में दिए थे। आयोग ने जमनादास नाजरा की अर्जी में पूछी गई सूचनाएं उपलब्ध नहीं कराईं और इसके पीछे तर्क दिया कि संसाधनों और कर्मचारियों की कमी के चलते वह सूचना देने में असमर्थ है। एसएससी के इस तर्क से असंतुष्ट नाजरा ने अन्तत: केन्द्रीय सूचना आयोग में अपील की। प्रमुख सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्ला में उनके मामले की सुनवाई के बाद सरकार को सुझाव दिया है कि वह एसएससी को मजबूत करने की दिशा में कदम उठाए।

आरटीआई ने दिलाया बलात्कार पीड़िता को न्याय

कई जगह न्याय की गुहार लगाने के बाद गुजरात में जब एक बलात्कार पीड़िता को न्याय नहीं मिला तो उसने सूचना के अधिकार कानून का इस्तेमाल करते हुए प्रश्न किया कि उसे कब न्याय मिलेगा ? इस 15 साल की लड़की का बलात्कार पिछले साल फरवरी में उस वक्त हुआ जब वह दक्षिण गुजरात के उमरपाडा ताल्लुक में कक्षा 8 में पढ़ रही थी। बलात्कार के बाद लड़की गर्भवती हो गई और उसने एक लड़के को जन्म दिया जिसकी 15 दिन के बाद मृत्यु हो गई। लड़की ने न्याय के लिए पुलिस का दरवाजा खटखटाया, लेकिन पुलिस के यहां से उसे निराशा ही हाथ लगी। हर जगह से निराश और हताश हो चुकी इस लड़की ने अन्तत: आरटीआई का इस्तेमाल किया और 23 जनवरी 2008 में मंगरोल में आरटीआई दायर की।
आरटीआई अर्जी में पीड़िता ने मंगरोल के सब इंस्पेक्टर और उमरपाडा चौकी के सहायक सब इंस्पेक्टर से पिछले साल 10 अक्टूबर में की गई शिकायत की प्रगति रिपोर्ट मांगी। साथ ही उसने उन सभी अधिकारियों की जानकारी मांगी जिनके पास उसका मामला लंबित रहा। पुलिस से जवाब न मिलने पर पीड़िता ने गुजरात सूचना आयोग का दरवाजा खटखटाया। 16 मई को गुजरात सूचना आयोग ने निर्णय दिया कि पीड़िता को दस दिनों के भीतर नि:शुल्क सूचनाएं उपलब्ध कराई जाएं। साथ की आयोग प्रश्न किया कि सूचना न देने पर क्यों न दोषी व्यक्ति पर जुर्माना लगाया जाए। आयोग के निर्णय के बाद 29 मई को पिछले साल 10 अक्टूबर को की गई शिकायत को आधार बनाकर पुलिस ने पीड़िता की शिकायत दर्ज की ।
सुनवाई के दौरान पीड़िता ने अपनी आवाज उठाते हुए मंगरोल के इंस्पेक्टर से प्रश्न किया कि वह अधिकारी कहां है जिसने बंदूक दिखाकर उसे घर आकर धमकी दी थी। लड़की ने स्थानीय पुलिस पर आरोप लगाया कि उसका केस दबाने के लिए उसने बलात्कारी से 50 हजार रूपये की घूस ले रखी है। पुलिस ने जान बूझकर उसका केस दबाने की कोशिश की है और पुलिस की एफआईआर में भी उसके बलात्कार की गलत तारीख दर्ज है। सूचना आयोग में मामले की सुनवाई के बाद गृह विभाग के अधिकारियों ने आरोपियों को तुरंत गिरफ्तार करने के आदेश दे दिए हैं।


निदेशक की नियुक्ति में अनियमितता का खुलासा

सूचना के कानून माध्यम से नियुक्तियों में हो रहीं धांधलियों के एक के बाद एक खुलासे हो रहे हैं। इस कानून का इस्तेमाल करते हुए सामाजिक कार्यकर्ताओं ने पुणे की एक सरकारी परिवहन संस्था के निदेशक की नियुक्ति में हुई अनियमितताओं का खुलासा किया है। दरअसल बाबा साहेब गोलांडे को पुणे महानगर परिवहन महामंडल लिमिटेड पीएमपीएमएल के प्रबंधन बोर्ड का निदेशक बनाया गया है। माना जा रहा है उन्होंने यह पद अपनी राजनैतिक पहुंच के चलते हासिल की।
पी एम पी एम एल पर आरोप है कि उसने निदेशक की नियुक्ति कर अपने ही चयन के मापदंडों का उल्लंघन किया है। इन अनियमितताओं का खुलासा आरटीआई कानून के तहत दायर एक अर्जी से हुआ है। यह याचिका सामाजिक कार्यकर्ता विवेक वेलांकर, सुजीत पटवर्धन, जुगल रथी, संदीप खडदेकर, विजय कंभर और प्रशांत इमामदार द्वारा दायर की गई थी। अर्जी के जवाब में कहा गया कि निदेशक पद के लिए बाबा साहेब गोलांडे का नाम निगम आयुक्त प्रवीन सिंह परदेशी और दिलीप बंध ने प्रस्तावित किया था। गौरतलब है कि निदेशक के पद के लिए पी एम पी एम एल ने एक विज्ञापन दिया था। विज्ञापन के 11 आवेदन प्राप्त हुए जिनमें 8 आवेदनों को उसी समय निरस्त कर दिया। मात्र तीन आवेदनों को ही निदेशक पद योग्य माना गया। और इन तीनों उम्मीदवारों में भी राजनैतिक पहुंच वाले को नियुक्त किया गया। अन्य उम्मीदवारों का न तो साक्षात्कार किया गया और न ही उनके आवेदन पर विचार किया गया। सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मुख्यमंत्री और शहरी विकास सचिव से इस मामले में दखल देने की मांग की है। साथ ही नियुक्त किए गए निदेशक को भी बर्खास्त करने को कहा है।


मुंबई में शुरू होगा आरटीआई पाठ्यक्रम

भारत के बार काउंसिल से मान्यता प्राप्त मुंबई के के सी लॉ कॉलेज में शीघ्र ही सूचना के अधिकार के दो पाठ्यक्रम शुरू होने वाले हैं। यह पाठ्यक्रम शुरू होने के साथ ही कॉलेज देश में इस प्रकार का पहला लॉ संस्थान बन जाएगा। इसी साल जुलाई सेशन से शुरू होने वाला यह पाठ्यक्रम फाउंडेशन और एडवांस स्तर पर शुरू किया जाएगा।
फाउंडेशन स्तर पर शुरू किए गए कोर्स में कानून के इतिहास, इसके प्रावधानों और आरटीआई मामलों के अध्ययन की पढ़ाई की जाएगी जबकि एडवांस स्तर पर सूचना प्राप्त करने की उन विधियों और तरीकों को बताया जाएगा जिसमें सरकार के मना करने के बावजूद सूचना हासिल की जा सकें। सूचना न देने की सरकारी विभागों की बहानेबाजी से निपटने के तरीके एडवांस कोर्स में बताए जाएंगे।
कोर्स की कक्षाएं पांच सेशनों में चलेंगी और हर सेशन तीन घंटे का होगा। फाउंडेशन और एडवांस कोर्स का शुल्क 2000 रूपये निर्धारित किया गया है। आरटीआई कार्यकर्ता शैलेश गांधी और सूचना आयुक्त वीवी कुवलेकर छात्रों को इस कानून के विषय में जानकारी देंगे।


सड़क निर्माण में हुई धांधली

सड़क निर्माण में हो रही धांधली का जीता जागता उदाहरण रायपुर के दरियाबंद क्षेत्र में देखने को मिला। इस क्षेत्र के कोसनी, फुलकर्रा, बावनडिग्गी और गजरा गांव में आपदा राहत के अन्तर्गत ग्राम पंचायत को सड़कें बनवानी थी, लेकिन यहां न तो सड़कें बनीं और जो सड़कें थीं, उन्हें भी बदतर हालात में पाया गया। आरटीआई के तहत जब सड़कों के बारे में सूचनाएं मांगी गईं तो यह तथ्य सामने आए।
जांच में पता चला कि सड़कें अपने मापदंड के अनुसार नहीं बनी हैं। सड़कों की चौड़ाई निर्धारित सीमा से कम है और उनमें लाल मिट्टी भी कम डाली गई है। इस मामले में जब सरपंच से पूछा गया कि तो उन्होंने कमीशन देने की बात कबूल की। साथ ही मस्टर रोल में भी फर्जी इंट्री पाई गई है। जो लोग काम में अक्षम और गांव में नहीं है उनकी इंट्री भी मस्टर रोल में दिखाई गई है। बहुत से मजदूरों ने काम न करने की बात स्वीकार है जबकि कागजों में उन्हें काम में दिखाया गया है।
दरियाबंद के आशीष शर्मा ने इस मामले में पंचायतों से विवरण निकलवाने के लिए आरटीआई दायर की। इस आरटीआई का असर यह हुआ कि इन प्रस्तावित सड़कों का निर्माण कार्य शुरू हो गया। साथ ही अधिकारियों ने इसमें की गई धांधली के जांच के आदेश भी दे दिए हैं।

शुक्रवार, 27 जून 2008

सुरक्षा से जुड़ी सूचना देने से किया मना

पंचकुला के एक निवासी द्वारा दायर आरटीआई अर्जी को वापस लेने के लिए दबाव डाला जा रहा है। आवेदक शक्ति पॉल शर्मा ने अपनी अर्जी में वीआईपी की सुरक्षा के लिए तैनात किए गए पंजाब पुलिस के सिपाहियों के बारे में विवरण मांगा था। आरटीआई अर्जी के जरिए उन्होंने सूचना मांगी कि किन कारणों से इन वीआईपी लोगों को सुरक्षा प्रदान की जा रही है, इनकी सुरक्षा पर कितना खर्चा आ रहा है और यह खर्चा कौन वहन कर रहा है। इसके अलावा उन्होंने प्रश्न किया कि किस के आदेश से इन वीआईपी को सुरक्षा दी जा रही है।
अधिकारियों ने श्री पॉल की अर्जी का जवाब न देते हुए कहा कि सरकारी अधिसूचना के मुताबिक सुरक्षा विंग आरटीआई के दायरे से मुक्त है। अधिकारियों के इस जवाब से असंतुष्ट शर्मा के वकील सपन धीर ने पंजाब सूचना आयोग के समक्ष दूसरी अपील दायर कर दी है।
गौरतलब है कि संविधान की धारा 21 में राज्य के सभी नागरिकों को सुरक्षा प्रदान करना और कानून व्यवस्था बनाए रखना राज्य का उत्तरदायित्व और कर्तव्य बताया गया है। साथ ही कहा गया है कि जिन लोगों को जान से मारने की धमकी मिली हो, उसे राज्य सरकार की तरफ से सुरक्षा प्रदान की जाएगी, लेकिन इसके पीछे वाजिब वजह होनी चाहिए। संविधान में सुरक्षा प्रदान करने के लिए स्टेटस सिंबल का जिक्र नहीं है, लेकिन सुरक्षा के लिए जान से मारने का धमकी का वास्तविक होना जरूरी है। यदि किसी के मांगने पर सुरक्षा तुरंत प्रदान कर दी जाती है तो सुरक्षा मांगने के कारणों की जांच करना अधिकारियों का काम है।
श्री पॉल का कहना है कि उनकी अर्जी का उद्देश्य यह जानना है कि जनता के धन को राज्य सरकार द्वारा इस प्रकार की सुरक्षा में क्यों व्यर्थ किया जा रहा है।


प्राईवेट स्कूल देते हैं राजनीतिक दलों का चंदा

बच्चों को प्राईवेट स्कूलों में पढ़ाने वाले अभिभावकों द्वारा दी जाने वाली फीस का एक हिस्सा राजनीतिक दलों के खाते में जा रहा है। सूचना के अधिकार के जरिए ऐसा ही एक खुलासा हुआ है। जिससे पता चला है कि निजी स्कूल राजनीतिक दलों को बड़ी मात्रा में चंदा देते है। यह खुलासा दिल्ली के एक सामाजिक कार्यकर्ता अफरोज आलम साहिल द्वारा चुनाव आयोग से सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई सूचना के जवाब से हुआ है। जिसमें निजी स्कूलों द्वारा कांग्रेस और बीजेपी दल को चंदा देने की बात कही गई है। चंदा की राशि पचहत्तर लाख से दस हजार के बीच है। साथ ही कुछ स्कूलों द्वारा दिए गई चेको मे कई मंत्रियों और गणमान्य के नाम केयर ऑफ के रुप में पाए गए है। दिल्ली के शिक्षा मंत्री अरविन्दर सिंह लवली के अनुसार चंदा पार्टी को डोनेशन के रुप में नहीं बल्कि रिलीफ फंडो में दिया गया है। साथ ही लवली ने कहा कि रिलीफ फंड और डोनेशन फंड में फर्क है। रिलीफ फंडो में स्कूल व अन्य सरकारी संस्था अपनी स्वेच्छा से राशि जमा करते है। इसके अलावा भाजपा के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष हर्षवर्द्धन ने कहा कि चंदा कहीं से मिले, स्कूल या व्यक्तिगत तौर पर लेकिन सार्वजनिक हित सर्वोपरि होना चाहिए। साथ ही कहा चंदे के बदले स्कूल या कंपनी के हित में निर्णय लेना गलत है।