गुरुवार, 11 दिसंबर 2008

एक्सक्लूसिव न्यूज मिलती है सूचना के अधिकार से

विभव कुमार

मई 2008 में एनडीटीवी के एनसीआर चैनल पर सूचना के अधिकार पर आधारित एक साप्ताहिक प्रोग्राम शुरु किया गया, जिसमें उन कहानियों को दिखाया जाता है और उस पर चर्चा की जाती है जहां सूचना के अधिकार के इस्तेमाल करने से परिस्थितियां बदल गई हों। प्रोग्राम का नाम है `फाइट फॉर योर राईट्स`। किसी निजी टीवी चैनल द्वारा सूचना के अधिकार के प्रचार प्रसार के लिए एक घंटे का साप्ताहिक प्रोग्राम दिखाया जाना अपने आप में एक ऐतिहासिक कदम है। लेकिन उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात है कि इस प्रोग्राम के एंकर हैं अरविंद केजरिवाल। मुझे ये जिम्मेदारी दी गई कि प्रोग्राम के लिए आवश्यक कंटेंट इकट्ठी करने के लिए दिल्ली के विभिन्न विभागों में सूचना के अधिकार का आवेदन करूं।

हमने दिल्ली की अलग अलग कॉलोनियों के पिछले तीन सालों में दिल्ली नगर निगम द्वारा कराये गये विकास कार्यों का विवरण सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त किया। इन सूचनाओं को हम सम्बंधित कॉलोनी के निवासियों, सम्बंधित अधिकारियों तथा जन जन प्रतिनिधियों के बीच इसे रखते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में मैने देखा कि प्रोग्राम के प्रसारण के बाद दिल्ली के अन्य भागों से भी लोग हमसे संपर्क करने लगे। वो भी अपनी कॉलोनी के विकास कार्यों से सम्बंधित सूचनाएं निकालना चाहते है। इससे हमारा उत्साह और भी बढा। पहले एपीसोड के बाद हमें बताया गया कि एनसीआर चैनलों पर प्रसारित होने वाले प्रोग्रामों की होड में फाइट फॉर योर राईट्स पहले नंबर पर पहुंच गया है।

शुरुआती एक दो एपिसोड में तो एमसीडी के अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को बुलाने में कोई खास परेशानी नहीं हुई, लेकिन तीसरा एपिसोड जिसकी रिकॉर्डिंग पूर्वी दिल्ली के सुंदर नगरी में की गई वहां के इंजीनियर ने आखिरी समय में आने से मना कर दिया। सबसे ज्यादा परेशानी तो राजेंद्र नगर में हुई। रिकॉर्डिंग की सारी तैयारी हो जाने के बाद वहां के इंजीनियर, निगम पार्षद और विधायक सभी ने आने से मना कर दिया क्योंकि वहां के कामों में सबसे ज्यादा गडबडियां पकडी गई थीं। साथ ही विधायक ने अपने लोगों को भेज कर रिकॉर्डिंग के बीच में ही हंगामा खडा कर दिया। बडी मशक्कत के बाद किसी तरह रिकॉर्डिंग पूरी की गई।
इसी तरह दिल्ली से गायब हो रहे बच्चों की खतरनाक तरीके से बढ़ती संख्या और इस मामले में दिल्ली पुलिस की नाकामयाबी को लेकर जो प्रोग्राम किया गया उसमें दिल्ली सरकार तथा केंद्र सरकार की ओर से कोई नहीं आया। किसी तरह आखिरी समय में दिल्ली पुलिस के प्रवक्ता राजन भगत फोन पर बातचीत करने को तैयार हुए।
मेरे समझ में नहीं आ रहा कि जो नेता मीडिया का अटेंशन पाने के लिए अजीबो गरीब हरकतें करते रहते हैं वही सूचना के अधिकार का नाम सुनते ही बहाने बाजी क्यों शुरु कर देते हैं? भलस्वा जहांगीरपुरी से कांग्रेस के विधायक, जिनको इस बार टिकट नहीं मिल पाया है, ने यहां तक कह दिया कि आप और किसी प्रोग्राम में बुला लीजिए लेकिन इस बार माफ कर दीजिए। बाद में दिल्ली नगर निगम के कुछ अधिकारियों ने बताया कि सूचना के अधिकार से निकली गडबड़ियों के संबंध में अरविंद जिस तरह से सवाल पूछते है उसका कोई जवाब तो होता नहीं। अधिकारी और नेता इन सवालों से बचने के लिए कार्यक्रम में आने से ही मना कर देते हैं। लेकिन इन सब के बावजूद डॉ। हर्ष वर्धन एक ऐसे नेता हैं जिन्हे हमने जब भी बुलाया वो आये और ना सिर्फ सरकार की बल्कि अपनी पार्टी की नीतियों पर भी बेबाक टिप्पणियां कीं।

प्रोग्राम को मिल रही लोकप्रियता को देखते हुए हमने कुछ एपिसोड दिल्ली के विधान सभा चुनावों को ध्यान में रख कर बनाए। इसके लिए कुछ विधायकों द्वारा उनके विकास निधि से बनी सड़कों में प्रयोग की गई सामग्री के नमूने सूचना के अधिकार के तहत उठाये और उनकी जांच श्री राम लेबोरेटरी में कराई। चौकाने वाला तथ्य यह है कि उठाये गये 12 नमूनों में एक भी पास नहीं हो सका। इन नमूनों को उठाने के लिए मैने दिल्ली नगर निगम में सूचना के अधिकार का आवेदन किया। मेरे आवेदन करने के दूसरे ही दिन दिल्ली नगर निगम के एक जूनियर इंजीनियर का फोन आया कि आपको जो भी सूचना चाहिए ऐसे ही ले जाइये सूचना के अधिकार का आवेदन करने की क्या आवश्यकता है। मैने सोचा चलो यहां तो नमूने आसानी से मिल जायेंगे। लेकिन जब हमलोग उनके ऑफिस में पहुंचे तो उनका रंग ही बदला हुआ था, पहले तो उन्होंने इधर उधर की ढेर सारी समस्याएं बताई कि वो कितनी विषम परिस्थितियों में काम करतें हैं। फ़िर हमे ऑफर दिया कि जो सूचनाएं चाहिए ले जाइए लेकिन नमूना मत उठाइये। काफी बहस के बाद मैने ये प्रस्ताव रखा कि आप हमें वो सड़क बता दें जो आपके हिसाब से सबसे बढ़िया बनी है हम उसी सड़क का नमूना उठा लेंगें। इस पर उनका जवाब सुनकर मैं दंग रह गया। उनके अनुसार पूरी दिल्ली में किसी भी सड़क का नमूना पास नहीं हो सकता। किसी तरह उन्हें समझा बुझा कर हमने नमूना तो उठा लिया, लेकिन इसके लिए उन्होंने हमसे यह आश्वासन लिया कि नमूने फेल होने पर हम आगे कोई कारवाई नहीं करेंगे और हमसे ये वादा किया अब आगे वो कभी भी इस तरह की गलती नहीं करेंगे। इस तरह की कई और भी घटनाएं होती रहीं। एक बार तो हमारे एक साथी के घर एक राशन दुकानदार 50000 रुपये कैश लेकर पहुंच गया कि इसे रख लीजिए लेकिन सूचना के अधिकार के तहत कोई सूचना मत मांगिए। उसका ऑफर था कि ये तो शुरुआत है, यदि वो उनकी बात मान ले तो आगे भी उनकी सेवा करते रहेंगे।

इस तरह अब तक फाइट फॉर योर राईट्स के 27 एपिसोड प्रसारित किये जा चुके हैं। प्रत्येक एपीसोड अपने आप में एक्सक्लूसिव रहा है। इस नये प्रयोग से यह तो सिद्ध हो गया है कि अगर सूचना के अधिकार का प्रयोग करके कोई न्यूज निकाली जाती है तो वो एक्सक्लूसिव तो होती ही है साथ ही टीआरपी भी बढाती है।

(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता है और एनडीटीवी से जुड़े हैं)

स्वतंत्र भारत का सबसे अनोखा कानून

चेतन चौहान

अक्टूबर 2005 में लागू होने के बाद सूचना के अधिकार कानून ने एक लंबा सफर तय किया है। नौकरशाहों के तमाम अडंगों के बावजूद सरकारी कार्यालयों में अब बेधड़क आरटीआई आवेदन जमा हो रहे हैं। इस कानून ने शासन की कार्यप्रणाली में बदलाव तो लाया ही है, साथ ही नौकरशाहों को भी अब एहसास हो गया है कि जनता उनकी कार्यप्रणाली पर उंगली उठा सकती है। पत्रकारीय बैठकों के दौरान कई नौकरशाहों ने मुझसे कहा कि आरटीआई के चलते वे अब फाइलों में लिखने से पहले दस बार सोचते हैं क्योंकि ये फाइलें अब जनता देख सकती है।
यह काफी दुखद है कि लगभग सभी नौकरशाहों के बीच आरटीआई को लेकर एक आम सहमति है कि यह कानून बेकार है और इसे खत्म कर दिया जाना चाहिए। दुर्भाग्यवश कई सारे नेता भी इससे सहमत दिख रहे हैं। लेकिन आरटीआई कार्यकर्ताओं और मीडिया को धन्यवाद, जो ऐसे नापाक इरादों को सपफल नहीं होने दे रहे हैं।
मैं अपने उन सभी पत्रकार साथियों को प्रशंसा करता हूं जो सरकारी विभागों से महत्वपूर्ण सूचनाएं एकत्र करने के लिए आरटीआई का इस्तेमाल कर रहे हैं। हालांकि हमेशा की तरह नौकरशाही रवैए के चलते मेरे लिए सूचना पाना कोई आसान काम नहीं रहा है। फ़िर भी, मीडिया में होने का फायदा मुझे मिला है जो आम नागरिकों को नहीं मिलता।
तीन साल पहले जब आरटीआई कानून लागू हुआ, मैंने वन एवं पर्यावरण मंत्रालय में दो आवेदन जमा किए। सिर्फ आवेदन जमा करने में मुझे एक दिन का समय लगा। कुछ इसी तरह का अनुभव मानव संसाधन विकास मंत्रालय के साथ भी रहा। लेकिन अब चीजें बदल रही हैं। मेरे विचार से आरटीआई आवेदन जमा करने का सबसे अच्छा तरीका है डाकघर का इस्तेमाल करना। इसमें 10 रूपये का आईपीओ लगाकर आवेदन को सीधे विभाग के पते पर पोस्ट कर दें। अब तक दो दर्जन से ज्यादा आवेदन मैने इसी तरह जमा किए हैं लेकिन इस प्रक्रिया की भी अपनी सीमा है। पहले तो आपको यह पता ही नहीं होता कि अमुक विभाग में आपका आवेदन पहुंचा भी है या नहीं क्योंकि अमूमन सरकारी विभाग इसका कोई जवाब नहीं देते। कुछ सरकारी विभाग मसलन, उत्तर प्रदेश राज्य सरकार भवन ने आवेदन पहुंचने की जानकारी मुझे दी लेकिन योजना आयोग और सूचना एंव प्रसारण मंत्रालय की तरह अन्य कई विभागों ने कभी भी इस तरह की जानकारी मुझे नहीं दी।
मेरे हिसाब से सरकारी विभागों में एक ऐसा तंत्र बनाया जाना चाहिए जिससे ईमेल के जरिए आरटीआई आवेदन जमा किए जा सकें और सूचना भी आवेदक को ईमेल के जरिए पहुंचाई जा सके। हालांकि यह अभी दूर की कौड़ी ही लगता है।
आरटीआई को लेकर जो मेरा अनुभव है उससे यही पता चलता है कि स्वतंत्र भारत में बने सभी कानूनों में यह कानून सबसे अनोखा है जिसने आम आदमी को सवाल पूछने की अद्भुत ताकत दी है। यहां तक की पत्रकारों को भी आरटीआई के तौर पर एक ऐसा हथियार मिला है जिसकी बदौलत नौकरशाहों के क्रियाकलापों पर सवाल उठाया जा सके।
एक बार मैंने मानव संसाधन विकास मंत्रालय में मिड डे मील के बारे में सूचना मांगने के लिए एक आवेदन जमा किया। शुरू में अधिकारियों ने मुझे टालना चाहा लेकिन यह बताने पर कि समय पर सूचना नहीं देने के कारण उन्हें दंडित भी होना पड़ सकता है, समय पर जानकारी उपलब्ध करा दी गई। हालांकि यह सूचना इतनी ज्यादा थी कि मानो मुझ पर एक बोझ डाल दिया गया हो। अधिकारियों ने मुझसे सैकड़ों पृष्ठों की सूचना देने के बदले 10 हजार रूपये जमा कराने को कहा। जब मैंने सारी सूचनाएं सीडी, फ्लोपी, या डिस्क में मांगी तो उन्होंने फ़िर से आवेदन करने को कहा। मैंने ऐसा किया भी। फ़िर अगले 4 दिनों के बाद उन्होंने मुझसे 50 रूपये जमा करने को कहा। मेरे यह पूछने पर कि महज 50 रूपये जमा करने के लिए 4 दिन का समय क्यों लिया गया तो लोक सूचना अधिकारी ने जवाब दिया कि इसके लिए सचिव की अनुमति लेनी होती है। लेकिन सवाल ये उठता है कि जब कानून में इलेक्ट्रोनिक तरीके से सूचना उपलब्ध कराने की बात स्पष्ट है तो इसके लिए सचिव से अनुमति लेने की बात कहां तक जायज है। जबकि लोक सूचना अधिकारी मुझे सूचना उपलब्ध कराने के लिए ऑथराइज था।
यहां ये बताना भी महत्वपूर्ण है कि सूचना अधिकारी सूचना देने के लिए ऑथराइज तो है ही स्वतंत्र भी है। मतलब इसके लिए लोक सूचना अधिकारी को अपने वरिष्ठ अधिकारियों से अनुमति लेने की जरूरत नहीं। बावजूद इसके लगभग सभी सरकारी विभागों के लोक सूचना अधिकारी सूचना उपलब्ध कराने से पहले अपने वरिष्ठ अधिकारियों की अनुमति लेना कभी नहीं भूलते।
अपने व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर मैं यह कह सकता हूं कि लोक सूचना अधिकारियों को पूरी स्वायत्तता मिलनी चाहिए। साथ ही उनका एक अलग कैडर भी बनाया जाना चाहिए ताकि सूचना मुहैया कराने में कोई देरी न हो। इसके अलावा उन्हें समय-समय पर प्रशिक्षण की भी जरूरत है।
दो मंत्रालयों के मेरे अनुभवों से यह साबित होता है कि जो सूचना अधिकारी जितनी जल्दी सूचना मुहैया कराता है उतनी ही जल्दी उसे पद से हटा भी दिया जाता है। परिणामस्वरूप नए सूचना अधिकारी को पुराने आरटीआई आवेदन के बारे में कोई जानकारी भी नहीं होती। नतीजा एक बार फ़िर बेवजह की देरी और अन्य परेशानियां। कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग को ऐसे आदेश जारी करने चाहिए जिससे सूचना अधिकारी का कार्यकाल तय किया जा सके।
मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण है आरटीआई का इस्तेमाल। हम जितना ज्यादा कानून का इस्तेमाल करेंगे, उतना ही ज्यादा सरकार को जवाबदेह बना सकेंगे। लेकिन मैं यह भी कहना चाहूंगा कि आरटीआई कार्यकर्ता लोगों की व्यक्तिगत समस्याओं के लिए आरटीआई इस्तेमाल करने के लिए उत्साहित न करें। यह कानून जन मुद्दों को सामने लाने के लिए बनाया गया है और इसका इस्तेमाल भी इसी के लिए होना चाहिए।

(लेखक हिन्दुस्तान टाइम्स से जुडे़ हैं)

आम लोगों का ब्रम्हाश्त्र है सूचना का अधिकार

रामजोशी

सूचना के अधिकार को मैनें निजी तौर पर अपने लिए इस्तेमाल नहीं किया है या यूं कह सकते हैं कि दुनियादारी के संघर्ष से अभी मेरा पाला नहीं पड़ा है। मगर इस कानून के बारे में मैनें बताया बहुत लोगों को है। कई जगह तो मैनें अपने साथियों के लिए इसका इस्तेमाल किया है। मजेदार बात यह है कि उसका असर भी तुरतपफुरत देखने को मिला।
मेरे एक मित्र सुजीत वाजपेयी को गाजियाबाद विकास प्राधिकरण में उन्हें अपने एक मकान की रजिस्ट्री करानी थी। पत्रकार होने के नाते हमें यह घमंड का था कि हमारा काम यूं ही हो जाएगा। लेकिन जब जीडीए के बाबुओं ने हमें नाच नचाया तो पत्रकारिता का सारा भूत ही उतर गया। काम भी न होय और उस पर ईमानदारी का चस्पा। सचिव से लेकर पुलिस इंस्पेक्टर तक ही सिफारिश लगवा डाली, मगर बाबू की बाबूगिरी के आगे सारे पानी भरते नजर आए। काफी भागदौड़ के बाद रजिस्ट्री हो गई। हमने चैन की सांस ली।
रजिस्ट्री के बाद पता चला कि हमने मकान की कुल कीमत से 32 हजार रूपये अधिक जमा करा दिए हैं। यह भी बाबू की ही करामात थी, क्योंकि कुल रकम का उस हिसाब बाबू ने खुद कई बार लगाया था। बाबू हमसे यहां भी पैसे ऐंठना चाहता था। अब बात आई ज्यादा जमा हो गई रकम को वापस लेने की। इस पर भी बाबू ने कई चक्कर कटवाए।
आखिर मैनें थक हारकर सूचना के अधिकार के तहत एक आवेदन तैयार किया और उक्त रकम के बारे में पूरी जानकारी मांग डाली। आरटीआई डालने के तीन दिन बाद बाबू का फोन आता है- भाई साहब आपने यह क्या किया। मैं तो खुद ही आपका चैक बनवाने के लिए भागदौड़ कर रहा था। आखिर में ठीक 15 दिन के बाद वाजपेयी जी को उनका चैक मिल गया। इसी तरह मैनें अपने एक मित्र को उनके पिता के लिए इलाज के दौरान एक अस्पताल द्वारा की गई लापरवाही के बारे में लापरवाही डलवाई। वह भी अपने संघर्ष में काफी हद तक कामयाब हो चुके हैं।

(लेखक दिल्ली प्रेस में उपसंपादक है)

जन सूचना अधिकार : एक अचूक हथियार

प्रदीप श्रीवास्तव

एक पत्रकार होने के नाते प्रतिदिन भ्रष्टाचार, भ्रष्टाचारियों को करीब से देखने और जानने का मौका मिनता है। कार्यों को किस तरह टाल कर रिश्वत ली जाती है इसका एक उदाहरण देना चाहूंगा। गोरखपुर महानगर के एक व्यक्ति ने अपना मकान बनाने के लिए एक नक्शा पास कराने के लिए गोरखपुर विकास प्राधिकरण में आवेदन किया। नियम है कि यदि कोई आपत्ति नहीं है तो एक माह के भीतर नक्शा पास हो जाना चाहिए। यदि कोई आपत्ति है तो उसकी लिखित सूचना आवेदक को देना चाहिए लेकिन रिश्वत न मिलने के कारक एक साल तक न तो नक्शा पास किया गया और न ही इस बारे में आवेदक को कोई सूचना दी गयी। आवेदक ने अमर उजाला को अपनी पीड़ा से अवगत कराया।
मैने इस मामले की खोजबीन शुरू की तो मालूम पड़ा कि जिस क्षेत्र में नक्शा पास होना है उस क्षेत्र में उसकी आराजी नम्बर और उसी प्लाट के आस-पास के प्लाटों पर मकान बनाने के लिए आध दर्जन नक्शा पास कर दिया गया है। छह नक्शे पास हो गए तो सातवें पर आपत्ति क्या है, मैने जीडीए अधिकारियों से पूछा। काई अधिकारी ऑन द रिकार्ड कुछ बोलने को तैयार नहीं हुआ तो मैने सूचना अधिकार अधिनियम के तहत नक्शा न पास होने का कारण पूछा। जीडीए ने उत्तर दिया कि उक्त भूमि का ले आउट स्वीकृत नहीं है इसलिए वहां नक्शा पास नहीं हो सकता है। इसके बाद मैने पूछा कि यदि ले आउट नहीं स्वीकृत है तो छह नक्शे पास कैसे हो गए। मैने अलग से पत्र तैयार किया और पूछा कि पास हुए छह नक्शों पर किन अधिकारियों के हस्ताक्षर हैं, किन नियमों के तहत उन्हें पास किया गया है और सातवें नक्शे को पास करने में उन नियमों का पालन क्यों नहीं किया जा रहा है। मामला फंसता देख जन सूचना अधिकारी ने तय समय सीमा में कोई उत्तर नहीं दिया। मैने अपील की तो सुनवाई के बाद मुझे उत्तर देने को कहा गया लेकिन उत्तर देने के पहले नक्शे को पास कर दिया गया। बाद में मुझे उत्तर दिया गया। मेरी इस कवायद का फायदा यह हुआ कि उस क्षेत्र में जितने भी लोगों का नक्शा इस तरह से फंसा हुआ था वह सभी पास कर दिया गया और किसी से रिश्वत की मांग नहीं की गयी।
सूचना मांगने से पहले हमें शब्दों पर विशेष ध्यान देना चाहिए। हमें यह याद रखना चाहिए कि अधिकतर विभाग सूचना देने में आनाकानी करते हैं और शब्दों को अपने हिसाब से अर्थ लगाकार सूचनाएं नहीं देते हैं। कोशिश करें कि सूचना मांगने का पत्र लिखने से पहले किसी जानकार से समझ लें और सूचना न मिलने की दशा में अपील जरूर करें। यदि आप सूचना लेने की जिद कर लेंगे तो वह सूचना हर हाल में आपको उपलब्ध करायी जाएगी और आपका वाजिब काम किसी भी दशा में नहीं रूकेगा।

(लेखक अमर उजाला, गोरखपुर में वरिष्ठ उप संपादक हैं)

खबरों का अहम स्रोत है आरटीआई

सोनल कैलोग

सूचना के अधिकार का बनना देश और मीडिया के लिए अब तक का सबसे उत्कृष्ट कार्य रहा है। यह शासन में पारदर्शिता और जवाबदेयता लाया है। मीडिया और जन सामन्य को इसने सरकार से उनके कार्यों और उन पर किए गए खर्चों के बारे में सवाल पूछने का हक दिया है। सरकार से कुछ भी पूछने का हक दिया है।
मैनें शुरूआत से सूचना के अधिकार को कवर किया है इसलिए मैंने इसे शुरूआती अवस्था से वर्तमान अवस्था तक जब यह तीन वर्ष पूरे कर चुका है, ठीक से देखा है। इसका विस्तार अभी भी जारी है और जनता के बीच इसकी जागरूकता को श्रेय तमाम गैर सरकारी संगठनों और कार्यकर्ताओं को जाता है, जिनकी भूमिका इस कानून को बनाने में भी अहम रही थी।
सूचना के अधिकार को इस्तेमाल करने के मेरे व्यक्तिगत अनुभव काफी अच्छे रहे हैं। कानून के तहत मैंने जितनी भी सूचना मांगी है, उनके केवल एक को छोड़कर सभी का जवाब मिला है। मैंने सबसे पहले योजना आयोग से इसके उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया के बारे में प्रश्न पूछे। मैंने पूछा था कि उन्होंने कितनी विदेश यात्राएं की हैं, उनका भुगतान किसने किया, यदि सरकार ने यात्राओं को भुगतान किया है तो इन यात्राओं पर कितना खर्च हुआ। मैंने उन अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों के नामों की जानकारी भी मांगी थी जिसमें अहलुवालिया सदस्य हैं।
एक माह के भीतर मुझे साफ और विस्तृत जवाब मिल गया। प्राप्त जानकारी के आधार पर मैंने अपने अखबार के पहले पेज के लिए स्टोरी लिखी। मैं यह भी बताना चाहूंगी कि योजना आयोग के लोक सूचना अधिकारी ने मुझे अहलुवालिया से मिलने को भी कहा। वह जानना चाहते थे कि मुझे यह सूचनाएं क्यों चाहिए। लेकिन जब उन्हें पता चला कि मैं एक पत्रकार हूं तो वे बिल्कुल दोस्ताना हो गए। मुझे यह पता नहीं चला यदि में पत्रकार न होती तो मुझसे क्या जानना चाहते?
एक अन्य बार मैंने प्रधानमंत्री कार्यालय से सूचना मांगी। कानून के तहत प्रधानमंत्री कार्यालय में आवेदन दाखिल करने की प्रक्रिया काफी अच्छी है। यहां भी मुझे 30 दिन की तय समय सीमा के भीतर जवाब विस्तारपूर्वक मिल गया।
पत्रकार होने के नाते मेरी समस्या प्रतीक्षा की अवधि है। खासकर उस वक्त जब लोक सूचना अधिकारी से जवाब नहीं मिलता। उस वक्त फोलो अप की समस्त प्रक्रिया जिसमें प्रथम अपील और द्वितीय अपील शामिल है, एक पत्रकार के लिए काफी थकाऊ होता है क्योंकि उसे हर वक्त नई कहानियां चाहिए होती हैं।
अधिकतर स्थानों से जहां मैंने सूचना के लिए आवेदन दिया, वहां से सूचना प्राप्त हुईं हैं। समस्त सरकारी विभागों में सूचना के अधिकार के आवेदन प्राप्त करने के लिए मूल आधरभूत संरचना अपनी जगह है, लेकिन एक मामले में मुझे मांगी गई सूचना का एक हिस्सा देने से मना कर दिया गया। मैंने आगे अपील इसलिए नहीं की क्योंकि इससे स्टोरी करने में काफी देर हो जाती, इसलिए जितनी सूचनाएं मिलीं थीं उनसे की मैंने स्टोरी लिख दी।
मैंने दो आवेदन सिविल एविएशन के डायरेक्टरेट जनरल के यहां जमा किए। जहां प्रवेश द्वार पर आवेदन स्वीकार किए गए लेकिन फीस जमा करने के मामले में उनसे थोड़ी बहस हुई। दोनों आवेदनों के जवाब से मैंने अपने अखबार एशियन एज के लिए दो स्टोरी लिखीं जो अखबार के पहले पेज पर छपीं।
मैनें सूचना के अधिकार की जितनी स्टोरी की हैं उनमें अधिकांश गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा विभिन्न सरकारी विभागों से प्राप्त सूचनाओं पर आधरित हैं। मैंने पाया है कि जिन लोगों ने सूचना के अधिकार को एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया है और सरकारी अधिकारी को अपने कर्तव्यों जैसे पासपोर्ट, राशन कार्ड बनाने, नरेगा एवं अन्य सरकारी योजनाओं के पालन के लिए विवश किया है। जवाबदेयता और पारदर्शिता के इसी उद्देश्य के लिए इस कानून को लाया भी गया।

(लेखिका एशियन एज में वरिष्ठ संवाददाता हैं)

सूचना के अधिकार का मेरा पहला प्रयोग

विमल चंद्र पाण्डेय


सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की सफलता की बहुत सारी कहानियां सुनने के बाद भी इसकी ताकत को मैंने खुद आजमा कर नहीं देखा था। हालांकि मैं जितने करीब से इसे देखने का सौभाग्य पा रहा था उससे ये तो साफ था कि यह कानून देश में अब तक बने कानूनों से अलग और ताकतवर है। 2006 की शुरूआत में जब मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में पत्रकारिता का द्वितीय वर्ष का छात्र था, छुटि्टयों में अपने घर बनारस जाना हुआ। यूं ही एक खयाल आया कि इस कानून का उपयोग यहां किया जाये। इस खूबसूरत शहर में ढेर सारी अनियमिततायें हैं जो इसकी पवित्रता और खूबसूरती में ग्रहण की तरह हैं। मेरे घर से थोड़ी दूरी पर चंदुआ सट्टी नाम की सब्जी मण्डी पड़ती है जहां हर समय गंदगी और गलाजतों का बोलबाला रहता है।
जब मैं घर पहुंचा तो यह गंदगी और बढ़ी हुयी दिखायी दी क्योंकि जहां यह मण्डी लगती है वहां की सड़क बुरी तरह से क्षतिग्रस्त थी। लोगों ने बताया कि इसके लिये उन्होंने अपने स्तर से बहुत कोशिशें की हैं। क्षेत्रीय नेताओं को लेकर नगर निगम तक गये हैं और हर बार ये आश्वासन लेकर लौटे हैं कि सड़क जल्दी ही बना दी जायेगी। सड़क में काम लगा भी दिया गया मगर एक दिन काम हो और दो दिन तक कोई काम न हो। जो सड़क बन भी रही थी उसे देख कर लग रहा था कि इसके बनते ही यह टूटेगी। उस क्षेत्र के लोग और मण्डी में आने वाले लोग सभी अपनी सहूलियत के हिसाब से बचा बचा कर कदम रखते हैं पर इस समस्या का समाधन कैसे हो सकता है, इसकी कोई सूरत नहीं समझ आती। सड़क न बने में थी न निर्माणाधीन में।
मैंने अपने एक दोस्त के साथ सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत एक आवेदन तैयार किया जिसमें मैंने कुछ सवाल पूछे। जैसे सड़क बनाने में किस मटेरियल का प्रयोग हुआ है, कौन कौन से अधिकारी इस परियोजना को देख रहे हैं इत्यादि। आवेदन के तीस दिन के भीतर जवाब आना होता है और मैं अपनी छुटि्टयां दस दिन में खत्म होने पर वापस चला आया। इस घटना के करीब बीस दिन बाद मेरे मोबाइल पर एक फोन आया कि आप आकर मटेरियल की जांच कर लें। मैं उस समय दिल्ली में था। मैंने अपने दोस्त को कहा कि वह जाकर मटेरियल की जांच कर ले। दोस्त ने अगले दिन मुझे बताया कि उसने अपनी क्षमता के हिसाब से जांच तो कर ली पर दरअसल उसकी जरूरत थी नहीं क्योंकि जो सड़क बनने के बावजूद टूटी हुयी थी, उस पर दुबारा काम लगा कर उसे एकदम दुरूस्त बना दिया गया है। सड़क में प्रयोग होने वाले मटेरियल की क्वालिटी अच्छी कर दी गई थी। मुझे तो इस सफलता की कुछ उम्मीद थी लेकिन मेरा दोस्त इससे बिल्कुल आश्चर्य में था। इसकी कतई उम्मीद नहीं थी कि मात्र एक आवेदन से ऐसा चमत्कार भी हो सकता है। उसके बाद उसने सूचना का अधिकार पर बहुत सारी किताबें और ब्रोशर्स पढ़े। इस समय वह इसकी गतिविधियों से बिल्कुल एलर्ट रहता है और दूसरों को इसके इस्तेमाल के बारे में बताता रहता है।

(लेखक यूएनआई से जुडे़ हैं)

मंगलवार, 2 दिसंबर 2008

सफल अभ्यर्थियों को मिले अंक सार्वजनिक दस्तावेज, आरटीआई से बताएं जाय अंक

अर्जुन कुमार बसाक
सरकारी संस्थाओं द्वारा आयोजित परीक्षाओं में सफल अभ्यर्थियों को मिले अंक सार्वजनिक दस्तावेज है। लिहाजा अभ्यर्थियों द्वारा सूचना के अधिकार (आरटीआई) अधिनियम के तहत सूचना मांगने पर उनके अंकों का खुलासा करना चाहिए।
जस्टिस जीएस सिस्तानी की पीठ ने यह टिप्पणी संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) द्वारा केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर की है।पीठ ने कहा कि एक बार जब परीक्षा हो जाती है और अभ्यर्थी को सफल घोषित कर दिया जाता है, तो उसके बाद यह सार्वजनिक दस्तावेज बन जाता है जिसका सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत खुलासा किया जा सकता है। ऐसे मामलों में अंकों को गोपनीय रखने का क्या मतलब है? सीआईसी ने आयोग को सिविल सेवा परीक्षा में सफल उम्मीदवार के अंक तीसरे पक्ष को बताने का निर्देश दिया था।
यूपीएससी की पैरवी कर रहे वकील से पीठ ने आयोग से निर्देश लेने की बात कहते हुए मामले को स्थगित कर दिया। सीआईसी ने अपने आदेश में सितंबर में आयोग से एक आरटीआई आवेदन पर सफल अभ्यर्थियों के अंकों का उस आवेदक को जानकारी देने को कहा था जो सिविल सेवा परीक्षा में सफल नहीं हो सका था और वह उन लोगों के अंक जानना चाहता था, जो परीक्षा में कामयाब हुए थे। किंतु आयोग ने यह कहते हुए अंकों का खुलासा करने से इनकार कर दिया था कि इसकी जानकारी तीसरे पक्ष को नहीं जा सकती। सीआईसी हालांकि इस दावे से संतुष्ट नहीं हुआ और आरटीआई आवेदक को अंक बताने का निर्देश दिया था। ज्ञात हो कि इससे पूर्व हाईकोर्ट ने संघ लोक सेवा आयोग को सिविल सेवा परीक्षा के प्रारंभिक टेस्ट (पीटी) में भी प्रतिभागियों को मिले कट ऑफ अंकों का खुलासा करने का आदेश दिया था। अब तक प्रतिभागियों को पीटी में मिले अंकों की जानकारी नहीं मिल पाती थी। चीफ जस्टिस की पीठ ने यह आदेश दिया था। पीठ ने आयोग की दलील खारिज कर दी थी कि अगर अंकों से संबंधित जानकारी परीक्षार्थियों को दे दी गई तो कोचिंग संस्थान इसका दुरुपयोग करेंगे। इससे छात्रों के अवसर बाधित होंगे। इस पर पीठ ने कहा था कि इससे छात्रों का कोई नुकसान नहीं होगा, बल्कि उन्हें अपनी क्षमता का पता चल सकेगा।