गुरुवार, 16 अक्टूबर 2008

सूचना आयुक्त ने भी नहीं दिलवाई सूचना

जब सूचना दिलवाने के जिम्मेदार आयुक्त ही सूचना दिलाने में असमर्थ हों तो बेचारे आवेदक कहां जाएं? ऐसे ही एक आवेदक हैं दिल्ली के गोपालदास, जिन्हें केन्द्रीय सूचना आयुक्त ओ पी केजरीवाल ने सूचना दिलवाने के स्थान पर उच्च अधिकारियों से बात करने की सलाह देकर अपनी जिम्मेदारियों से कन्नी काट ली है। दिल्ली दूरदर्शन केन्द्र में लाइटिंग असिसटैंट के पद पर कार्यरत गोपालदास ने योग्यताओं के बावजूद तरक्की न मिलने पर आरटीआई के तहत इसका कारण जानना चाहा था। लेकिन न तो उन्हें अधिकारियों से इसका संतोषजनक जवाब मिला और न ही सूचना आयुक्त के दरबार से।

दरअसल गोपालदास का 1998 में प्रमोशन होना था और वह इस योग्य भी थे, लेकिन दूरदर्शन दिल्ली केन्द्र ने उन्हें प्रमोशन नहीं दिया। 1999 में दूरदर्शन मुख्यालय, मंडी हाउस ने एक आदेश भी जारी किया जिसमें कहा गया कि जो लाइटिंग असिसटैंट योग्य एवं प्रशिक्षण प्राप्त हैं उन्हें तरक्की दी जाए। मुख्यालय के आदेश के बाद भी गोपालदास को तरक्की नहीं मिली जबकि उनके अनेक जूनियरों को तरक्की दे दी गई। 2006 में उन्होंने पहले दूरदर्शन मुख्यालय और पिफर दिल्ली केन्द्र से आरटीआई के जरिए कुल पांच प्रश्न पूछे। चार प्रश्नों के जवाब तो मिल गए लेकिन उस प्रश्न का संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया जिसमें पूछा गया था कि क्यों दूरदर्शन मुख्यालय के आदेश के बाद भी उनको तरक्की नहीं दी गई।

अपीलीय अधिकारी से भी संतोषजनक जवाब न मिलने पर मामला केन्द्रीय सूचना आयोग में ओ पी केजरीवाल के यहां पहुंचा। आयुक्त ने इस बाबत जब दूरदर्शन दिल्ली केन्द्र के निदेशक और मुख्यालय के डायरेक्टर जनरल से स्पष्टीकरण मांगा तो उन्होंने कहा कि हमारे पास जो सूचना उपलब्ध थी, दे दी। तब सूचना आयुक्त ने प्रमोशन से जुडे़ दस्तावेजों के निरीक्षण की अनुमति आवेदक को दी। लेकिन जब आवेदक निरीक्षण करने गए तो वहां से मुख्य दस्तावेज गायब थे। उनके सामने दो फाइलें रख दी गईं और कहा गया कि जो चाहिए ले लो। जानकारी न मिलने पर जब ओ पी केजरीवाल के यहां शिकायत की गई तो उन्होंने जवाब दिया कि आप उच्च अधिकारियों से इस सिलसिले में बात करें, हम कुछ नहीं कर सकते। गोपालदास ने सूचना आयुक्त पर भेदभाव का आरोप लगाते हुए कहा कि प्रारंभ में दूरदर्शन से जुड़े रहने के कारण उनकी सहानुभूति दूरदर्शन के अधिकारियों से अधिक थी। इसी कारण अधिकारियों के साथ नरमी बरती गई।


गैर अनुदान प्राप्त कॉलेजों को देनी होगी सूचना

गैर अनुदान प्राप्त प्राईवेट मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेज अब सूचना के अधिकार से नहीं बच पाएंगे। महाराष्ट्र में नागपुर और अमरावती क्षेत्र के सूचना आयुक्त विलास पाटिल ने अपने एक अहम पफैसले में सभी प्राईवेट मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों को सूचना कानून के तहज सूचना देने को अनिवार्य बताया है। यह आदेश यशवंतराव चवन इंजीनियरिंग कॉलेज के प्रिंसिपल एवं अपीलीय अधिकारी और जन सूचना अधिकारी के ख़िलाफ़ राजकुमार भोयर द्वारा की गई शिकायत की सुनवाई के बाद दिया गया है।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए दो फैसलों को आधार बनाते हुए पाटिल ने कहा- सभी प्राईवेट इंजीनियरिंग और मेडिकल संस्थान विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, अखिल भारतीय तकनीकि शिक्षा परिषद और मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया द्वारा संचालित होते हैं। इस कारण वे सूचना देने को बाध्य हैं। अब तक यह प्राईवेट कॉलेज सूचना ने देने के पीछे तर्क देते थे कि उन्हें न तो सरकार द्वारा संचालित किया जाता है और न ही उन्हें सरकारी अनुदान प्राप्त होता है, इसलिए वे सूचना कानून के दायरे से बाहर हैं। लेकिन सूचना आयुक्त के इस फैसले ने उनकी मंशा पर पानी फेर दिया है।


सुधर जाइए रजिस्ट्रार साहब!

जुर्माने पर जुर्माना लगने के बाद भी गुजरात विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार एवं लोक सूचना अधिकारी सुधरने का नाम नहीं ले रहे हैं। आरटीआई आवेदनों की अनदेखी करने पर सितंबर माह में उन पर तीन जुर्माने लगे हैं। 10,25,25 हजार के तीनों जुर्मानों की राशि उनके वेतन से वसूली जाएगी। हाल ही में रजिस्ट्रार पर संस्कार ऐजुकेशन ट्रस्ट के प्रदीप जेसवाल के आवदेन का जवाब न देने पर 25 हजार का जुर्माना लगा है। जेसवाल ने ट्रस्ट द्वारा संचालित विभिन्न कॉलेजों का गुजरात विश्वविद्यालय में जमा किए गए धन का ब्यौरा मांगा था। आयोग के समक्ष जेसवाल ने बताया कि आवेदन दाखिल करने के बाद वे दो बार रजिस्ट्रार से मिले और उन्हें सूचना देने को कहा लेकिन अब तक सूचना नहीं दी गई। रजिस्ट्रार ने अपना बचाव करते हुए दलील दी कि अधिक कार्यभार और परीक्षा प्रारंभ होने के कारण वे सूचना नहीं दे पाए। उन्होंने यह भी कहा कि विश्वविद्यालय में अनेक कॉलेज धन जमा करते हैं। इस कारण रिकॉर्ड ढूंढ़ने में काफ़ी वक्त लगता है। आयोग ने इन दलीलों को सिरे से खारिज करते हुए उन्हें 25 हजार रूपये जुर्माने के रूप में दो किश्तों में भरने के आदेश दिए। साथ ही चेतावनी दी कि यदि वह ऐसे ही कानून की अवहेलना करते रहे तो सर्विस रूल्स के तहत उनके खिलापफ अनुशासात्मक जांच के आदेश दिए जा सकते हैं।

इससे पहले आयोग ने रजिस्ट्रार पर 25 हजार जुर्माना पंकज श्रीमाली की अपील की सुनवाई के बाद लगाया था। श्रीमाली ने अपने आवेदन में विश्वविद्यालय की दाखिला प्रक्रिया, चयन समिति की कार्यप्रणाली, विशेष मामलों में दिए गए दाखिलों से जुडे़ 21 प्रश्न आवेदन में किए गए थे। लोक सूचना अधिकारी से जवाब न मिलने पर आयोग में इसकी शिकायत की गई। रजिस्ट्रार ने यहां तर्क दिया कि पूछे गए 21 प्रश्नों की विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों से जानकारी लेने में कापफी समय लगता है। साथ ही कहा कि प्रशासनिक कार्यभार और बहुत सी जायज परेशानियों के कारण भी समय पर सूचनाएं नहीं दी जा सकीं। रजिस्ट्रार की यह दलील आवेदन दाखिल करने के 16 महीने बाद दी गई थी। यहां भी आयोग ने उनकी दलीलों को कमजोर पाया और उन्हें 25 हजार रूपये भरने के आदेश दिए थे। इसी माह एक अन्य मामले में भी गुजरात विश्वविद्यालय के ही आर्ट्स फेकेल्टी के डीन प्रदीप प्रजापति की अपील की सुनवाई के बाद रजिस्ट्रार पर 10 हजार का जुर्माना लग चुका है।


नेत्रहीन ग्रामीण ने खोली पंचायत की पोल

राजकोट जिले के रंगपुर गांव के 26 साल के रत्ना आल नेत्रहीन जरूर हैं लेकिन उन्हें वह सब गड़बिड़यां दिखाई देतीं हैं जो गांव के अन्य लोगों को नहीं दिखतीं। दसवीं कक्षा तक पढ़ाई करने वाले रत्ना आल सूचना के अधिकार के माध्यम से ग्राम पंचायत द्वारा विकास कार्यों में की गई गड़बिड़यों की पिछले दो सालों से पोल खोल रहे हैं। जो पंचायत रोड़ के मरम्मत, वृक्षारोपड़ आदि विकास कार्यों के दावे करती थी, उसे रत्ना आल ने सूचना कानून के जरिए झूठा साबित किया है। उनके द्वारा सूचना कानून के तहत निकलवाए गए दस्तावेज इस तथ्य की पुष्टि करते हैं। ग्राम पंचायत ने दावा किया था कि उसने 27187 रूपये वृक्षारोपड़, 18503 रूपये सड़क मरम्मत पर व्यय किए गए हैं, जिन्हें वास्तव में कभी खर्च ही नहीं किया गया।
रत्ना ने जब सबसे पहले सूचना कानून के तहत पंचायत से सवाल पूछे तो पंचायत ने उसे बेइज्जत करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। बाद में दस्तावेजों को लेकर वे कई अधिकारियों से भी मिले लेकिन किसी ने उनकी ओर ध्यान नहीं दिया। रत्ना को इस बात को लेकर बड़ा दुख रहता है कि विकास के नाम पर गांवों में आने वाला धन यहां नहीं पहुंच पाता और ग्रामीणों को जन सुविधाओं के अभाव में जीवन गुजारना पड़ता है। गांव की महिलाएं गर्मियों में जब पानी लाने के लिए दो किलोमीटर पैदल चलकर जाती हैं, तो रत्ना को बड़ी तकलीफ होती है। सूचना कानून को अपने हक की लड़ाई का औजार मानने वाले रत्ना कहते हैं कि मैं अँधा जरूर हूं लेकिन मेरी दृष्टि साफ़ है।

नेताओं के रिश्तेदारों में बंटा किसानों का राहत पैकेज

विदर्भ क्षेत्र के किसान जहां एक तरफ़ गरीबी और भुखमरी के चलते आत्महत्या करने को विवश हैं, वहीं दूसरी तरफ़ उनके नाम पर आने वाला राहत पैकेज नेताओं और अधिकारियों के रिश्तेदारों में बांटा गया है। मामला विदर्भ क्षेत्र के यवतमाल जिले का है जहां प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री की ओर से गरीबी रेखा से नीचे और आत्महत्या करने वाले किसानों के परिजनों को मिलने वाले पैकेज की सांसदों और विधायकों के बीच जमकर बंदरबाट हुई है। यह खुलासा जिले के सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार विलास वानखेडे़ द्वारा दायर आरटीआई आवेदन के जवाब से हुआ है।
वानखेडे़ ने जिले के एनीमल हसबेंडरी डिपार्टमेंट से राहत पैकेज के लाभार्थियों का विवरण मांगा था। किसानों को मिलने वाले इस विशेष पैकेज में गाय या भैंस की खरीद पर 50 प्रतिशत छूट का प्रावधान था। विभाग से जानकारी मिली कि भूतपूर्व कांग्रेस सांसद उत्तमराव पाटिल और उनके परिवार के सदस्यों ने इस पैकेज के तहत 10 गाय हासिल कीं। क्षेत्र के विधायक डिगरास संजय देशमुख की पत्नी और मां को एक-एक गाय मिली। नागपुर जिले के पूर्व गार्जियन मंत्री शिवाजी राव मोघे के सम्बन्धियों को आठ गाय हासिल हुईं। इसी तर्ज पर वाणी के पूर्व विधायक वामाराव कसावर के 4 सम्बन्धियों को 8 गाय मिलीं, जबकि कांग्रेस नेता सुरेश लोंकर के रिश्तेदारों ने 6 गाय हासिल कीं। सबसे हैरानी की बात है जिस ठेकेदार अमोल क्षीरसागर ने गायों की आपूर्ति की, वह खुद लाभार्थियों में शामिल है। ये पशु तात्कालीन जिला कलेक्टर हर्षदीप कांबले के कार्यकाल में आबंटित किए गए थे। सभी लाभार्थियों का चयन चार सदस्यीय चयन समिति ने किया था और हर्षदीप कांबले समिति के प्रमुख थे।
हालांकि मामले को तूल पकड़ता देख मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख ने मामले की उच्चस्तरीय जांच के आदेश दे दिए हैं। लेकिन इस घोटाले से सरकार की जमकर आलोचना हो रही है क्योंकि लाभ पाने वाले सभी नेता कांग्रेस, एनसीपी और उनकी सहयोगी पार्टियों के हैं।

दिल्ली में तीन साल में लापता हुए 8942 बच्चे

देश की राजधानी दिल्ली में सितंबर 2004 से अगस्त 2007 तक 8942 बच्चे लापता हुए हैं और इनमें से 2086 बच्चों को अब तक नहीं खोजा जा सका है। लापता हुए बच्चों का यह आंकड़ा दिल्ली के 10 में से सिर्फ़ 7 जिलों का है। यह जानकारी पुलिस आयुक्त कार्यालय (अपराध एवं रेलवे) ने आरटीआई आवेदन के जवाब में इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंस संस्था (आई एस एस) को उपलब्ध कराई है। संस्था ने सूचना के अधिकार के जरिए दिल्ली में गायब हुए बच्चों का ब्यौरा मांगा था।

प्राप्त जानकारी के अनुसार पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन, हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन और नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से कुल 104 बच्चे गुम हुए हैं। इनमें से 91 बच्चों के केस पुलिस रोजनामचे में दर्ज हैं जबकि 13 मामलों में प्रथम सूचना दर्ज की गई है। इनमें से 61 बच्चों को खोजा जा चुका है और मात्रा 4 अपराधी गिरफ्तार हुए हैं।

पुलिस से प्राप्त जानकारी के अनुसार बाहरी जिले से सर्वाधिक 2924 बच्चे गायब हुए हैं। इनमें से 2227 बच्चे खोजे जा चुके हैं और 697 अब तक लापता हैं। पूर्वी जिले से इन तीन सालों में 2485 बच्चों के लापता होने की जानकारी पुलिस ने दी है। इनमें से 2113 केस रोजनामचे में दर्ज हैं। पूर्वी जिले से गायब हुए बच्चों में से 1753 बच्चे खोजे जा चुके हैं और इन मामलों में 105 व्यक्तियों को गिरफ्तार किया गया है। इसी तरह उत्तर पूर्वी जिले में कुल लापता बच्चों की संख्या 2094 और मध्य जिले में यह संख्या 858 है।

पुलिस द्वारा गायब बच्चों का दिया गया यह आंकड़ा जानकारों के गले नहीं उतर रहा है। उनका कहना है कि पुलिस द्वारा उपलब्ध कराई गई यह जानकारी गायब हुए सभी बच्चों की सच्ची तस्वीर पेश नहीं करती। किरण बेदी के अनुसार बच्चों की गुमशुदगी की जितनी रिपोर्ट पुलिस थानों में दर्ज होती है उससे अधिक रिपोर्ट चाइल्ड हेल्पलाइन के पास दर्ज हैं। यह अंतर इस सच्चाई पर प्रकाश डाल रहा है कि बच्चे अधिक गुम होते हैं परंतु रिपोर्ट कम दर्ज की जाती हैं। दूसरी तरफ़ पुलिस द्वारा खोजे गए बच्चों को जो प्रतिशत बताया गया है, वह भी प्रामाणिक नहीं लगता। क्योंकि आईएसएस संस्था ने अपने सर्वे में लापता बच्चों के जितने परिजनों से बात की, उनसे पता चला कि उनके बच्चे अब तक नहीं मिले हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग एवं अन्य समाजसेवियों का भी कहना है कि दिल्ली में लापता हुए कुल बच्चों में मात्रा 35 प्रतिशत बच्चे ही खोजे जाते हैं। गुम हुए बच्चों में सर्वाधिक 12-19 साल की लड़कियां हैं तथा इनमें से 80 प्रतिशत बच्चे झुग्गी झोपडियों में रहने वाले परिवारों से हैं। संस्था की रिपोर्ट के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष 45000 बच्चे लापता होते हैं जिनमें से 11000 बच्चे कभी नहीं मिलते।


शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2008

सूचना देने के सम्बन्ध में हाईकोर्ट ने दिया मुख्यमन्त्री कार्यालय को आदेश
(डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर)
इलाहाबाद हाईकोर्ट, उत्तर प्रदेश की लखनऊ पीठ ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष से एक लाख रुपये से अधिक की धनराशि प्राप्त लाभार्थियों के बारे में जानकारी सूचना का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत दी जा सकती है। पीठ ने अपने फैसले में यह भी कहा कि मुख्यमन्त्री विवेकाधीन कोष वास्तव में जनता का कोष है। ऎसी स्थिति में जनता को यह जानने का हक़ है कि इस कोष से किसकी सहायता की जा रही है। जनहित में यह जानकारी देने में कोई बाधा नहीं है। न्यायमूर्ति श्री प्रदीपकांत और न्यायमूर्ति श्री श्रीनारायण शुक्ल की खंडपीठ ने यह फैसला जन सूचना अधिकारी की ओर से दायर याचिका को खारिज करते हुए सुनाया।
मुख्यमन्त्री विवेकाधीन कोष से लाभार्थियों की सूची देने के सम्बन्ध में यह फैसला उत्तर-प्रदेश कांग्रेस कमेटी के मुख्य प्रवक्ता अखिलेश प्रताप सिंह द्वारा सूचना अधिकार अधिनियम के अंतर्गत मांगी गई सूचना से उत्पन्न मामले से सम्बंधित था। प्रदेश कांग्रेस कमेटी के मुख्य प्रवक्ता अखिलेश प्रताप सिंह ने दिनांक 12 जून 2007 को सूचना का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत मुख्यमंत्री कार्यालय से इस सम्बन्ध में सूचना मांगी कि दिनांक 28 अगस्त 2003 से 31 मार्च 2007 तक की अवधि में मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष से एक लाख रुपये से अधिक की धनराशि पाने वाले व्यक्तियों की सूची उपलब्ध कराई जाए।
मुख्यमंत्री कार्यालय ने अखिलेश प्रताप सिंह के आवेदन-पात्र को दिनांक 19 जुलाई 2007 को अन्तिम रूप से निस्तारित करते हुए वांछित सूचना उपलब्ध कराने से इनकार कर दिया। कार्यालय के जन सूचना अधिकारी ने सूचना का अधिकार अधिनियम की विविध धाराओं का जिक्र करते हुए इस आवेदन की सूचना को देने से इनकार किया था। मुख्यमंत्री कार्यालय से सूचना प्राप्ति की अस्वीकृति के पश्चात् अखिलेश ने सूचना प्राप्ति हेतु राज्य सूचना आयोग के समक्ष अपील की। मामले की सुनवाई करने के पश्चात् दिनांक 12 दिसम्बर 2007 को आयोग द्बारा मुख्यमंत्री कार्यालय को आदेश दिया गया कि आवेदनकर्ता को वांछित सूचना उपलब्ध करा दी जाए।
आयोग द्वारा आदेश पारित किए जाने के बाद अखिलेश सिंह के आवेदन पर पुनर्विचार करते हुए मुख्यमंत्री कार्यालय से दिनांक 12 जनवरी 2008 को एक पत्र अखिलेश को भेजा गया। इस पत्र के माध्यम से अखिलेश को 336 पृष्ठों की सूचना देने के लिए 15 रुपये प्रति पृष्ठ की दर से 5040 रुपये जमा करने को कहा गया। अखिलेश द्वारा इस पत्र के प्रत्युत्तर में दिनांक 18 जनवरी 2008 को आयोग में पुनः अपील की, जिसमें उन्हों ने अधिनियम की धारा 7 की उपधारा 6 का उल्लेख किया। इस धारा के अनुसार 30 दिन के भीतर ही सूचना उपलब्ध कराने की दशा में ही छाया-प्रति का शुल्क लिया जा सकता है। 30 दिन की समयावधि बीत जाने के पश्चात् सूचना (छाया-प्रति) निःशुल्क प्रदान की जाती है। इस धारा के आधार पर अखिलेश सिंह ने सूचना की छाया-प्रति निःशुल्क दिए जाने की अपील की। मामले की सुनवाई के पश्चात तुंरत ही मुख्यमंत्री कार्यालय को आदेशित किया गया कि वह सूचना उपलब्ध कराये। इस आदेश के बाद मुख्यमंत्री कार्यालय के जन सूचना अधिकारी ने राज्य सूचना आयोग से इस आदेश पर पुनर्विचार करने का अनुरोध किया।
मामले की पुनः सुनवाई करते हुए सूचना आयोग ने दिनांक 15 फरवरी 2008 को अन्तिम रूप से मुख्यमंत्री कार्यालय को आदेश दिया कि मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष से एक लाख रुपये से अधिक की धनराशि प्राप्त करने वाले लाभार्थियों की सूची अखिलेश सिंह को प्रदान की जाए।
आयोग द्वारा इस पूरे मामले में मुख्यमंत्री कार्यालय को तीन बार आदेश दिए गए. मुख्यमन्त्री कार्यालय के जन सूचना अधिकारी द्वारा आयोग द्वारा दिए गए इन तीनों आदेशों ( दिनांक 12 दिसम्बर 2007, दिनांक 12 जनवरी 2008 तथा दिनांक 15 फरवरी 2008 को दिए गए उक्त आदेशों) को चुनौती देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में एक याचिका दायर की गई। न्यायलय ने पूरे मामले की सुनवाई के पश्चात् यह याचिका खारिज करते हुए मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष से एक लाख रुपये से अधिक की धनराशि प्राप्त करने वाले लाभार्थियों की जानकारी जनहित में देने का आदेश मुख्यमंत्री कार्यालय को दिया। अखिलेश प्रताप सिंह के अधिवक्ता सी0 बी0 पाण्डेय ने बताया कि न्यायलय ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि इसमें किसी तरह की 'मेरिट' नहीं है और यह सूची उपलब्ध कराने में किसी तरह की बाधा नहीं है। जनता के धन से बने मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष से एक लाख रुपये से अधिक की धनराशि प्राप्त करने वाले लाभार्थियों की सूची जनहित में देने का आदेश न्यायलय द्वारा सरकार (मुख्यमंत्री कार्यालय) को दिया गया।