गुरुवार, 11 सितंबर 2008

निगम अधिकारिओं के मोबाइल पर खर्च हुए 31 लाख

पुणे की मीरा-भयंदर नगर निगम ने पिछले 2 सालों में अपने 106 अधिकारिओं के मोबाइल पर करीब 31 लाख रूपये खर्च किए हैं। 25 लाख मोबाइल का बिल चुकाने और ६.4 लाख हैंडसेट्स खरीदने पर खर्च किए हैं। निगम हर साल अपने अधिकारिओं को हर साल नए हैन्डसेट्स भी खरीदकर देता है। प्रमोद पाटिल द्वारा दायर आरटीआई आवेदन के जवाब में यह जानकारी मिली है। क्षेत्र में नागरिक सुविधाओं की बदहाल स्थिति है और दूसरी तरफ़ निगम अधिकारिओं के मोबाइल पर जनता का पैसा पानी की तरह बहा रहा है। क्षेत्रा में न तो जल शुद्धिकरण का कोई संयत्र है और न पब्लिक लाईब्रेरी। पब्लिक टॉयलेट का भी बुरा हाल है। निगम के स्कूलों में बच्चों को समय पर नहीं मिलती। लोगों का मानना है कि यदि इस धन को नागरिक सेवाओं पर खर्च किया जाता तो कुछ समस्याएं काफ़ी हद तक हल हो सकती थीं।

निर्माण से पहले ही एनजीओ को सौंप दिया गया नंदी पार्क

गाजियाबाद नगर निगम ने आवारा पशुओं को रखने के लिए एक पार्क का निर्माण कार्य बाद में शुरू किया लेकिन उसके रखरखाव की ज़िम्मेदारी तीन महीने पहले ही एक संस्था को सौंप दी गई। सूचना के अधिकार के तहत पूछे गए सवालों के जवाब से पता चलता है कि नंदी पार्क का निर्माण कार्य तो 12 दिसंबर 2007 को शुरू हुआ लेकिन इसके रखरखाव की जिम्मेदारी तीन महीने पहले ही लखनऊ की एनजीओ समाजोत्थान सेवा संस्थान को सौंप दी गई। और पार्क के रखरखाव के लिए गाजियाबाद नगर निगम द्वारा प्रतिमाह 98200 भी खर्च किए गए।
सूचना अधिकार जागृति अभियान समिति के उपाèयक्ष एडवोकेट मनमोहन शर्मा ने नगर निगम से इस सम्बन्ध में सूचना मांगी थी।निगम द्वारा दी गई जानकारियों खुद उसकी गड़बिड़यों की पोल खोलती हैं। दी गई जानकारी के मुताबिक 15 मई 2008 तक पार्क में कुल 171 नंदी(आवारा सांड ) लाये गए हैं जिनमें 55 की मौत हो चुकी है।

बिना सूचना ८५ प्रतिशत पुलिसवाले गैर हाज़िर

सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मिली है कि दिल्ली पुलिस के जवान बिना छुट्टी लिए और बिना अपने अफसरों को बताए भी गायब हो जाते हैं। जनवरी से जुलाई 2008 तक कुल 5509 पुलिसकर्मी बिना जानकारी दिए अनुपस्थित पाए गए। अनुपस्थित होने वाले पुलिसकर्मियों में 4121 पुरूष और 1388 महिलाएं हैं। इनमें सर्वाधिक संख्या सुरक्षा शाखा की है, जहां 59 महिलाओं सहित 2242 पुलिसकर्मी अनुपस्थित पाए गए। इस दौरान केवल 438 कर्मचारियों नें ही अपने अधिकारियों को सूचित किया जबकि 504 पुलिसकर्मियों ने एडवांस में छुट्टी ली थी। इसके अलावा 403 पुलिसकर्मियों को एमरजेन्सी छुट्टी दी गई।
वर्तमान में दिल्ली में अपराध् की दर बहुत ज्यादा है। आयदिन नारकोटिक और विस्पफोटक सामगि्रयों बरामद हो रही हैं। बलात्कार, हत्या, लूट आदि घटनाओं का ग्रापफ दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। ऐसी स्थिति में पुलिसकर्मियों की अनुपस्थितियां कापफी चिंताजनक मानी जा रही हैं।

बालगृह में सात बच्चे लेकिन खर्च 40 लाख

एक साल में सात बेसहारा बच्चों की देखभाल पर 40 लाख रुपए का खर्च। ऐसी किस्मत तो इस देश में अच्छे खासे खाते पीते परिवारों के बच्चों की भी नहीं होती है। लेकिन इन सात बच्चों का दुर्भाग्य है कि उनके नाम पर हे रहा यह खर्च महज़ दिल्ली सरकार के कुछ अफसरों की जेब गर्म कर रहा है। यह जानकारी खुद दिल्ली सरकार के सामाजिक कल्याण विभाग ने सूचना अधिकार आवेदन के जवाब में दी है। सामाजिक कल्याण विभाग 24 आश्रय गृह संचालित करता है। यह आश्रय गृह बेघर बच्चों, महिलाओं और भिखारियों के लिए बनाए गए हैं। इनमें से प्रत्येक में औसतन 100 से 150 व्यक्ति रहते हैं। प्रत्येक आश्रय गृह का औसतन सालाना खर्च 40 से 50 लाख रूपये के बीच है। जो प्रति व्यक्ति के हिसाब से करीब 4 हजार रूपये महीना बैठता है। एक भिखारियों के आश्रय गृह पर तो विभाग ने साल में १.5 करोड़ रूपये खर्च किए हैं। यह जानकारी प्रतिधि संस्था के राजमंगल प्रसाद ने हासिल की है।
राजमंगल ने बताया कि जिन 16 एजेन्सी से इन आश्रय गृहों की वस्तुएं खरीदी जाती थीं, उनमें 1५ फर्जी पाई गई हैं। उनका अनुमान है कि इसमें लगभग 20 करोड़ का घोटाला हुआ है और कम से कम दो दर्जन अधिकारी इसमें लिप्त हैं। राष्ट्रीय महिला आयोग की पूर्व अèयक्ष मोहिनी गिरी का इस बारे में कहना है कि इन गृहों में रहने वाले प्रति व्यक्ति पर करीब 4 हजार रूपये खर्च हो ही नहीं सकते। उन्होंने बताया कि अक्सर यहां रहने वाले बुजुर्गों और मानसिक रूप से कमजोर लोगों को ऐसी दवाईयां भी दी जाती हैं, जिससे वह दिनभर सोते रहें। उनके अनुसार ऐसा इसलिए किया जाता है, ताकि कर्मचारिओं को इनकी देखभाल से मुक्ति मिल जाए और खाने की बचत हो।

राजमंगल ने इन आश्रय गृहों में हुई मौतों की जानकारी भी आरटीआई के जरिए मांगी थी। उनका कहना है कि शुरू में विभाग ने यह जानकारी नहीं दी। लेकिन बाद में दबाव के कारण विभाग को इस बारे में जानकारी देनी पड़ी, जो काफ़ी चौंकाने वाली थी। विभाग ने बताया कि 2007 में एक माह के दौरान निर्मल छाया बाल गृह में 12 मौतें हुई हैं। जबकि 2007-08 में चार बाल गृहों में 89 बच्चों की मृत्यु हुई हैं। कुछ मामलों में बच्चों की मौत की वजह पिटाई भी रही है। इन गृहों में होने वाली हर मौत की जानकारी राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग को देना अनिवार्य है, लेकिन आयोग को यह जानकारी नहीं दी गई। आयोग ने दिल्ली सरकार को इस बारे में नोटिस भी जारी किया है, लेकिन सरकार ने इस संबंध में कोई कारवाई नहीं की।


सोमवार, 8 सितंबर 2008

फुल बेंच ने कहा- आरटीआई के दायरे में है बीआईएएल

कर्नाटक उच्च न्यायालय की सिफारिश के बाद राज्य सूचना आयोग की पूर्ण बेंच ने आयोग के पूर्ववर्ती फैसले को बरकरार रखते हुए बंगलुरू इंटरनेशनल एयरपोर्ट को सूचना कानून के दायरे में माना है। मुख्य सूचना आयुक्त के के मिश्रा, सूचना आयुक्त एच एन कृष्णा और के ए थिप्पेस्वामी की बेंच ने अपने फैसले में कहा कि एयरपोर्ट लोक प्राधिकरण है क्योंकि इसे राज्य और केन्द्र से आंशिक सहायता प्राप्त होती है।
इससे पहले बंगलुरू इंटरनेशनल एयरपोर्ट ने अपने आपको लोक प्राधिकरण ने मानते हुए बंगलुरू निवासी बेंसन ईसाक के आरटीआई आवेदन का जवाब देने से मना कर दिया था। एयरपोर्ट ने इसके पीछे तर्क दिया कि बीआईएएल एक कंपनी है जिसमें 74 प्रतिशत हिस्सेदारी प्राईवेट सेक्टर की है। बंगलुरू के ईसाक बेंसन ने सूचना न मिलने पर आयोग में इसकी शिकायत की। आयोग ने अपने फैसले में बीआईएएल को लोक प्राधिकरण माना और इसे सूचना देने के आदेश दिए। आयोग के पफैसले खिलापफ एयरपोर्ट ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी जिसे उच्च न्यायालय ने सूचना आयोग की पूर्ण बेंच को रेपफर कर दिया। बेंच ने आयोग के पूर्ववर्ती पफैसले को पूरी तरह सही ठहराया।

पूर्व स्थानीय डिप्टी कलेक्टर के खिलाफ दंडनीय कारवाई के आदेश

लंबित शिकायत को निपटाई गई बताना वर्धा के पूर्व स्थानीय डिप्टी कलेक्टर नरेन्द्र लोंकर को महंगा पड़ा है। महाराष्ट्र के सूचना आयुक्त विलास पाटिल ने ताराचंद चौबे के आवेदन का गलत जवाब देने के लिए नरेन्द्र लोंकर के खिलाफ दंडनीय कारवाई के आदेश दिए हैं।

ताराचंद ने अपने आवेदन में लोकशाही दिवस कार्यक्रम के दौरान दर्ज की गई अपनी शिकायत के स्टेटस की जानकारी मांगी थी। उन्होंने यह भी पूछा था कि कार्यक्रम के दौरान कलेक्ट्रेट कार्यालय को कुल कितनी शिकायतें प्राप्त हुई हैं, कितनों का निपटारा किया गया है और कितनी शिकायतें अभी लंबित हैं। ताराचंद को दी गई जानकारी में बताया गया कि इस दौरान कुल 31 शिकायतें मिली हैं जिनमें 29 का निपटारा कर दिया गया है और शेष दो निपटारे की प्रक्रिया में हैं। ताराचंद को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि कैसे उनकी लंबित शिकायत को निपटाई गई बता दिया गया। इसके खिलाफ उन्होंने आयोग में अपील की। अपील की सुनवाई में आयोग ने नरेन्द्र लोंकर को झूठी सूचना देने का दोषी पाया और उनके खिलाफ दंडनीय कारवाई के आदेश दिए।


शुक्रवार, 5 सितंबर 2008

मुख्य सूचना आयुक्त (राज्य) निलंबित

राज्यपाल टी वी राजेश्वर ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सूचना आयुक्त एम् ऐ खान को निलंबित करके उनके कार्यालय आने पर रोक लगा दी है. खान के विरुद्ध अनियमित भर्तियाँ करने, आयोग के पदाधिकारियों के कार्य में अनुचित हस्तक्षेप करने, सूचना अधिकार अधिनियम के प्रावधानों के विपरीत कार्य करने सहित अनेक गंभीर आरोप हैं. पहले कई बार इनकी शिकायत भी की जा चुकी थी.
अनेक शिकायतें मिलने के बाद राज्यपाल ने जांच शुरू करने के लिए सूचना अधिकार अधिनियम की धारा-17 के तहत सुप्रीम कोर्ट को रिफरेन्स भेजा. शिकायतों की जांच में निष्पक्षता के लिए खान को निलंबित कर उनके कार्यालय पर आने की रोक को उचित समझा. इसी कारण उन्हों ने खान को सूचना अधिकार अधिनियम की धारा 17(2) के तहत निलंबित कर दिया. मिलंबन के साथ ये भी आदेश दिए गए की जांच जारी रहने तक खान क्कार्यालय नहीं आयेंगे.
समाचार-पत्र अमर उजाला, कानपूर दिनांक-10-07-2008 में प्रकाशित समाचार